मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबचे हुए अमीवा पहलोसे कुछ भिन्न प्रकारके थे । इनमे भी वही सघर्ष चला । मरते-बचते परिस्थितिके अनुमार आकार-प्रकार बदलते-बदलते मछली, मेढक, सॉप, पक्षी, गाय, बैल, वंदर, वनमानुष और मनुष्यकी उत्पत्ति हुई । “सब प्राणियोका एक ही तत्त्वसे बनना, सबमें जीवन और सतति धारण करनेवाले समान अवयवोंका होना सिद्ध करता है कि सब एक ही मूलयन्त्रके उसी प्रकार सुधरे हुए रूप हैं, जिस प्रकार आरम्भकी साइकिल भद्दे ढगकी थी, उसमें सुधार होते-होते आजकी साइकिल बन गयी । अबतककी सभी साइकिलों- को एक कतारमे रखे तो पता लगेगा कि एकहीके ये सब सुधरे हुए रूप हैं । उसी प्रकार सभी प्राणी 'अमीबा'के सुधरे हुए रूप हैं । जैसे तीन पहिये और दो पहियेकी मोटर दो वस्तुएँ नहीं, वैसे ही बिना पैरका सॉप और सैकडो पैरवाला कनखजूरा कोई दो वस्तु नहीं । पहलेका सुधारा हुआ रूप ही दूसरा है । पहले सादी फिर सकीर्ण, पहले बिना हड्डीवाली फिर हड्डीवाली, पहले जोड़ोवाली फिर सपाट रचनाका क्रम यान्त्रिक ही है । जमीन खोदनेसे भी यही क्रम मिलता है । सादी रचनावाले नीचेकी तहोंमें और क्लिष्ट रचनावाले हड्डीवाले ऊपरकी तहोंमें मिलते हैं । मनुष्य गर्भ पहले अमीबाकी तरह एक कोष्ठवाला, फिर मछलीके आकारका, फिर क्रमशः मण्डूक, सर्प एव पक्षीके आकारका होता है । फिर बदर- की शकलका होकर मनुष्य होता है । इस तरहसे भूगोलके प्राणियोकी शरीर-रचना, यत्र-तत्र प्राप्त हड्डियोंकी रचना तथा विभिन्न देशोंमें स्थित प्राणियोकी शरीर-रचना- की तुलना करनेसे यही प्रतीत होता है कि सब एक ही मौलिक यन्त्रके परिशोधित एव परिवर्धित स्वरूप हैं । कई स्त्रियोंके चार या आठ स्तन होते हैं, कई मनुष्योंके पूँछ होती है । इससे मालूम होता है कि मनुष्य भी उन योनियोसे होकर आया है, जिनमें अधिक स्तन एव पूँछ होते हैं । कान न हिला सकने और आँत उतरनेकी बीमारीसे प्रतीत होता है कि मनुष्यके ये अंग शक्तिहीन हो गये । कहीं एक ही प्राणीमें इन दो प्रकारके प्राणियों-जैसे अङ्ग पाये जाते हैं । चमगादड, उडती गिलहरी, लुप्त कडियोंके उत्तम निदर्शक और विकासके प्रमाण हैं ।” इस सम्बन्धमें कहना यह है कि यन्त्रोका विकास जैसे किसी चेतनकी बुद्धिका परिणाम है, वैसे ही विश्वका विकास भी किसी चेतन ईश्वरसे ही सम्भव है । भले साइकिलें एक ही यन्त्रके विकास हो, फिर भी मोटर, रेल, वायुयान तथा कारखानोंके यन्त्र, सब साइकिलके ही विकास नहीं । इसी तरह सॉपोके अवान्तर- भेद सॉपोंके विकास भले ही हों, परन्तु कनखजूरा, बड़ी गिजाया और छोटी गिजाई आदिका स्वतन्त्र ही अस्तित्व क्यो न माना जाय ? निराकार जीव कर्मवश विभिन्न योनियोसे होता हुआ मनुष्य-योनिमे आया, इसमें कोई मतभेद नही । किन्तु अमुक जीवित देहमें ही सब प्रकारके जीवित देह बने, यह कल्पना सर्वथा