भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 162

विकासवाद १४९

निराधार है। कहा जाता है कि 'सम्पूर्ण संसार परिवर्तनका फल है।' किन्तु परिवर्तन या गति जड पदार्थका स्वाभाविक धर्म नहीं हो सकती। व्यवहारमे देखते हैं कि घडीमें गतिका परिवर्तन घडीका स्वाभाविक धर्म नही, बन्दूकद्वारा चलनेवाली गोलीकी गति स्वाभाविक नहीं है, घडी और गोली पहले गतिहीन थीं, अन्तमें भी गतिहीन होनेवाली हैं। बीचमें किसी चेतनद्वारा ही उनमें गति मिलती है। इस तरह संसारमें तेज, जल, किरण, वायु आदि सभी पदार्थोमे गति या परिवर्तन किसी चेतनमे ही मिलना चाहिये। घडी और गोलीकी गतिके तुल्य ही ससारकी गति भी न पहले थी, न अन्तमें रहेगी। उसे गति देनेवाला चेतन ईश्वर ही है। 'साइंस एण्ड रेलीजन'में प्रसिद्ध विद्वान् डॉ० जे० एम्० फ्लेमिंगका कहना है कि 'साइन्सके स्वाध्यायसे हमें इस प्राकृतिक जगत्में तरकीब, योजना, धारणा और विचार दिखलायी पड़ते हैं। ये बाते इत्तिफाकसे अचानक नहीं आ गयीं। ये विचार चैतन्यकी सूचना देते हैं। यह संसार बिना विचारवान्के कभी नहीं बन सकता। महर्षिव्यासने भी उपनिषदोंके आधारपर शारीरक सूत्रमें कहा ही है कि जड प्रकृतिमें ईक्षण नहीं बन सकता, किंतु यह संसार ईक्षणपूर्वक ही हो सकता है— "ईक्षतेर्नाशब्दम्।" (ब्रह्मसूत्र १।१।५) कुछ विकासवादियोकी कल्पना है कि 'पृथ्वीपर गिरनेवाले तारकाओंके द्वारा जीवनका बीज हमारे यहाँ पहुँचा।' परंतु इसमे शंका यह होती है कि क्या प्रोटोप्लाज्ममें इतनी शक्ति है कि तारिकाओसे पृथ्वीपर पहुँचनेतक उनमें जीवन अवशिष्ट रह सकता होगा? दूसरी कल्पना यह है कि 'असंख्य वर्षोंके पहले अनुकूल स्थिति पानेपर जीवनका एकदम प्रादुर्भाव हुआ।' परंतु इसपर विकास- वादी ही कहते हैं कि 'जीवनका आरम्भ कब हुआ, कैसे हुआ, इसपर वैज्ञानिकों- को अबतक कुछ ज्ञात नहीं। इससे स्पष्ट है कि 'चैतन्य कैसे बनता है,' यह वैज्ञानिकोको मालूम नहीं। परंतु उनका विश्वास है कि 'वह है प्राकृतिक,' क्योंकि उनके मतमें चेतन प्रोटोप्लाज्म ही है। प्रोटोप्लाज्म, जो शहदकी भाँति तरल पदार्थ है, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस आदि बारह भौतिक पदार्थोंसे बना है, जो कि जड ही हैं। ये भौतिक पदार्थ 'एलेक्ट्रोन'के न्यूनाधिक मेलसे बनते हैं। एलेक्ट्रोन खण्ड-खण्ड है, अर्थात् ये सब पदार्थ परमाणुओंसे बने है, जीव भी प्राकृतिक परमाणुओंसे ही बना है।' हक्सलेके मतानुसार 'चेतन' पदार्थ दीपज्योति अथवा पानीके भँवरके तुल्य नित्य प्रतीत होनेपर भी प्रतिक्षण बदलने वाली व्यक्तियाँ ही हैं। नये-नये परमाणु मिलते जाते हैं, पुराने अलग होते रहते हैं, यह धारा निरन्तर बहती रहती है' इसलिये ज्ञान एवं चैतन्यका सिलसिला नहीं टूटता।