भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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१५० मार्क्सवाद और रामराज्य नवीन विज्ञानके अनुसार 'प्रत्येक परमाणु कई एलेक्ट्रोनोसे बना होता है । एलेक्ट्रोन एक दूसरेसे चिपकते नहीं, प्रत्युत दूर-दूर रहते हैं। जिस प्रकार तारका- समूह दूर-दूर रहकर भी एक तारापिण्ड या सौर जगत् कहलाता है, उसी प्रकार अनेको एलेक्ट्रोनोसे बना हुआ 'एटम' भी है। इसी एटमसे उपर्युक्त बारह पदार्थ बनते हैं। इन्हीं बारह पदार्थोंसे ज्ञान, चैतन्य या आत्मा बना है। अतः वह भी परिवर्त्तनशील है।' वैज्ञानिकोके अनुसार परमाणुओंकी गति प्रति सेकेन्ड एक लाख मील है। यहाँ विचारणीय यह है कि जुदा-जुदा रहकर इतने वेगसे चलनेवाले परमाणु किस प्रकार अपना ज्ञान दूसरे परमाणुमें डालते हैं अथवा किस प्रकार ज्ञान एक परमाणुसे उड़कर दूसरे परमाणुमे जाता है और चैतन्य स्थिर रहता है ? बीसो वर्ष पढानेपर भी विद्यार्थी भूल जाता है, परंतु बिना किसी साधनके दूर-दूर स्थित परमाणु इतने वेगसे दौडते हुए अपना ज्ञान दूसरेमे फेककर चले जाते हैं और दूसरे उस ज्ञानको ले लेते हैं। यह कितनी आश्चर्यजनक और कितनी असंगत बात है ? दिसम्बर सन् १९२३ के 'चिल्ड्रेन्स न्यूज' पत्रमें प्रो० रिचर्ड की 'थर्टी इयर्स आफ साइकिकल रिसर्च' नामक पुस्तकका विज्ञापन छपा है । उसीमें पुस्तकका एक उद्धरण है कि 'पचास वर्षपूर्व भौतिक विज्ञानका यही रुख था कि जो बात भौतिक विज्ञानसे सिद्ध न हो, उसका अस्तित्व ही नहीं, वह ढोग है । किंतु आज ऐसे भी प्रमाण मिल रहे हैं कि भौतिक विज्ञानकी पहुँचके बाहर भी पदार्थोंका अस्तित्व है। ऐसे पदार्थोंको 'साइकिकल' कहते हैं। यह शब्द जीवके लिये व्यवहृत होता है। जीवात्माको अब कोई भी भौतिक नहीं कहना ।' डार्विनके सुपुत्र प्रो० जार्ज डार्विनने - १६अगस्त सन् १९०५ को दक्षिण अफ्रीकामें 'ब्रिटिश एसोसिएशन'के प्रधानकी हैसियतसे कहा है कि 'जीवनका रहस्य अब भी उतना ही गूढ है जितना कि पहले था।' प्रो० गेडिस कहते हैं कि 'कुछ प्रामाणिक विज्ञानवेत्ता, जो जीवके एक लोकसे दूसरे लोकमें आगमनकी कल्पनाको सन्तोषजनक मानते हैं, ऐसा भी मानते हैं कि जीव प्रकृतिकी भाँति अनादि है।' दूसरे एक विद्वान्का कहना है कि 'चेतनके प्रभाव बिना जड पदार्थोंमे चेतना आ ही नहीं सकती।' विज्ञानका यह नियम पृथ्वीके आकर्षण-नियमके समान अटल प्रतीत होता है। जबसे मनोविज्ञान, मस्तिष्कशास्त्र एव आत्मविद्याका अन्वेषण हुआ, तबसे जीव सम्बन्धी सभी शंकाएँ निवृत्त हो गयीं ।" मनोविज्ञानके एक विद्वान्का कहना है कि 'किसी भी जीवनकार्यकी संगति भौतिक नियमोमे स्पष्ट नहीं होती । आँसू या पसीना निकलनेके नियमोका भी स्पष्टीकरण अभीतक नहीं हो सका ।' मस्तिष्क-शास्त्रके जन्मदाता गॉलका