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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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विकासवाद १५१

कहना है कि ‘मेरी रायमें एक ही निरवयव वस्तु है, जो देखती, सुनती, स्पर्श करती है, प्रेम, विचार एव स्मरण करती है, पर अपना कार्य करनेके लिये वह मस्तिष्कमें अनेक भौतिक साधन चाहती है।’ इससे वेदान्तके द्रष्टा, स्प्रष्टा, श्रोता, घ्राता आत्माका ही वर्णन मिलता-जुलता है। आत्मविद्याके प्रसिद्ध पण्डित सर ओलिवर लॉज लिखते हैं कि ‘एक बार आप इस बातको देखे कि अन्तःकरण बडी वस्तु है। वह इस मशीन (शरीर) से बाहरकी वस्तु है। ऐसा नहीं कि जब शरीर नष्ट होता है, तब वह अपना अस्तित्व खो देती है। हम जितने दिनोंतक पृथिवीपर रहते हैं, उतने ही दिनोंके लिये हमारा अस्तित्व परिमित नहीं। हम बिना शरीरके भी रह सकते हैं। हमारा अस्तित्व बना ही रहेगा। मै ऐसा क्यों कहता हूँ ? इसलिये कि ये सब बातें विज्ञानके आधारपर स्थित हैं। बहुतोंने अभी इसका अनुभव नहीं किया, पर यदि कोई तीस-चालीस वर्षतक अपनी आयु इस विषयमे लगाये, तभी वह यह कह सकनेका अधिकारी होगा कि अब मैं किसी स्थितिमें पहुँचा हूँ।’ इन बातोमे ज्ञात होगा कि जीवका स्वतन्त्र अस्तित्व विज्ञानसम्मत है। अब ईश्वर- नियन्त्रित प्रकृतिसे विकास उसी प्रकार मान्य है, जिस प्रकार कलीसे फूलका विकास होता है। जैसे कलीसे फूल ही होगा, भ्रमर नहीं, बीजसे वृक्ष ही होगा, मूँगा नहीं, वैसे ही ईश्वरीय नियमानुसार पदार्थोंका विकास होगा । यह टी० एच् हक्सलेके ‘एनीवर्सरी ऐडेस’ के इन वाक्योमे स्पष्ट है कि ‘प्रत्येक पशु और वनस्पतिकी सभी जातियोंमें कुछ विशेष प्राणी ऐसे होते हैं, जिनको मैं ‘स्थिर आकृति’ नाम देता हूँ, उनमे सृष्टिसे लेकर अबतक कोई विकार नहीं हुआ।’ मद्रास हाईकोर्टके जज टी० एल० स्टेजका कहना है कि ‘जल-कृमियोंमें बहुत प्रकारके भिन्न-भिन्न रूपवाले जन्तु प्रतिदिन उत्पन्न होते हैं । इनके लिये यह आवश्यक नहीं कि वे एक दूसरेसे विकृत होकर उत्पन्न हो, प्रत्युत वे तो एक दूमरेसे अपेक्षारहित होकर एक ही समयमें अलग- अलग आकारके साथ उत्पन्न होते हैं । इससे क्रम-विकासका स्पष्टतया खण्डन हो जाता है। अनुभव भी यही है कि सिरमें मैल जमनेसे जुएँ साक्षात् उत्पन्न होती हैं। वे अनेक अन्य देह धारण करनेके बाद जुएँ नहीं बनतीं । खाटका खटमल मलिनतासे ज्यो-का-त्यो उत्पन्न होता है। मूत्रके कीडे समारके समस्त देशोमें एक ही आकारके उत्पन्न होते हैं।’ इन घटनाओसे सिद्ध होता है कि अमुक आकार प्राप्त करनेके लिये अनेक आकारोका चक्कर लगाना आवश्यक नहीं । जिस ईश्वरके द्वारा चन्द्र-सूर्य बनते हैं, जिससे अमीबा बनते हैं, उसीसे स्वतन्त्र अन्य शरीर भी बन सकते हैं ।

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