भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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आठ संस्थान होने ही चाहिये। क्या कोई ऐसा भी मूर्ख होगा जो समझेगा कि 'भोजन किया जाता है और मलत्याग न किया जायगा ?' नालेके पानीकी तरह रक्तका बहना, संतति उत्पन्न करना सभी दुनियाँको अवगत है । हाँ, विचारणीय यह है कि जिस प्रकार यन्त्र धीरे-धीरे सुधरता है, क्या उसी प्रकार प्राणी और-से-और हो जाता है । वस्तुतः यन्त्र मनुष्यकी परिमित बुद्धिसे बनता है; उसमें अनुभवके आधारपर कुशलता होती है, इसलिये आरम्भिक और अन्तिम रूपमें अन्तर पड जाता है, परन्तु सर्वज्ञ परमेश्वरकी बुद्धिकी रचना मनुष्य- बुद्धि-जैसी नहीं हो सकती ।

प्राणियोंके कर्मफलभोगार्थ परमेश्वर तदुचित देह बनाते हैं । जिसके जैसे कर्म, उसे वैसा ही सुख दुःख भोगना पड़ता है । उसके लिये उसी प्रकारका देह-निर्माण आवश्यक है । शरीरका बनाना यदि स्वतन्त्र प्रकृति या जीवके अधीन माना जाय तो यन्त्रका दृष्टान्त ठीक हो सकता है । पर यहाँ तो कर्मानुसार शरीर प्रदान करनेवाला ईश्वर है । अतः यन्त्रका दृष्टान्त व्यर्थ है । विकासवादीका कहना है कि 'वैज्ञानिकोंने अबतक कोई ऐसी रीति आविष्कृत नहीं की, जिससे इन परिवर्तनोंको वे परीक्षणोंद्वारा सिद्ध कर सकें; और न उनको अबतक यही ज्ञात हो सका कि इस प्रकारके परिवर्तनके नियम क्या हैं ? वैज्ञानिकोंको परिवर्तनके नियम मालूम नहीं । यह भी मालूम नहीं कि परिवर्तन कैसे होता है ? परिवर्तन होते हुए भी किसीने नहीं देखा । अमुक प्राणीका अमुक प्राणी बन गया, इसे किसीने नहीं देखा । आज किसीको भी बंदरसे मनुष्य बनते नहीं देखा जाता और मनुष्यके बाद मनुष्यसे दूसरा भी कोई प्राणी उत्पन्न होते नहीं दिखायी देता । ऐसी स्थितिमें परिवर्तन सिवा कल्पनाके और कुछ भी सिद्ध नहीं होता । विज्ञानके प्रखर पण्डित भी यही कहते हैं कि 'जीवकी श्रेणियो एवं जातियोंकी उत्पत्तिका रहस्य हमको ज्ञात नहीं ।' थॉम्पसनका कहना है कि 'हम नहीं जानते कि 'पृथ्वीपर जीवधारीकी उत्पत्ति कबसे हुई ?, दूसरा एक विद्वान् भी कहता है कि 'इस उजाड पृथ्वीपर प्राणीकी उत्पत्ति कैसे हुई, यह हम नहीं जानते ।' कुछ तीसरे लोग डार्विनके ही शब्दोंमें स्वीकार करते हैं कि 'एक जातिसे दूसरी उपजातिकी भिन्नताके नियमोंके सम्बन्धमें हमलोग कुछ नहीं जानते ।'

जातिविधान

इसी तरह विकासवादी जातिविभाग-शास्त्रके अनुसार साधर्म्य-वैधर्म्यके अनुसार प्राणिवर्गका वर्गीकरण पृष्ठवंशधारी और पृष्ठवंशविहीनोंके भेदसे करते हैं । जबसे रक्तकी परीक्षाका सिलसिला जारी हुआ, तबसे विकासवादियोंका