भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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विकासवाद १८९ 'जब जो थे, तब वही थे।' पृथिवीकी खुदाईमे भी यह बात पायी नही जाती। जिस तहमे जो हड्डियाँ पायी जाती हैं, वह तह उस सिद्धान्तानुसार उन्हीं जन्तुओमे पटी होनी चाहिये, क्योकि 'उस समय वही थे और दीर्घकाय (विशालकाय) थे।' पर ऐसा है नहीं, बहुत गहरा खोदनेपर भी एक तहमें थोड़े ही जन्तु एक प्रकारके पाये जाते हैं। उन प्राणियोका विशालकाय होना तो विकासवादके विरुद्ध ही होगा, क्योकि उसके अनुसार तो बहुत छोटे प्राणियोसे ही विकासका आरम्भ होता है। जब छोटे प्राणी ऐसे विशालकाय हुए कि एक छिपकली ही अस्सी मन वजनकी हुई और वृक्ष इतने बड़े हुए कि खदानोंमें कोयलाके पहाड बन गये तो उसी नियमानुसार आरम्भिक मनुष्योंकी लाशे ऐसी क्यो नही मिलीं ? वह भी कम-से-कम ताडके पेडके बराबर तो होनी ही चाहिये थी। छिपकली उतनी क्यो बढ़ी और आदि प्राणी अमीवा और अन्तिम प्राणी मनुष्य उतना क्यों न बढ़ा ? क्यो भैसके बराबर चीटियाँ देखनेको न मिलीं ? और जीवित प्राणियोंमे आज वैसे भीमकाय क्यों नहीं ? हो सकता है कि कुछ योनियाँ पहले भीमकाय रही हों, परन्तु उनके वंशका आज पता नहीं लगता। वे सपरिवार नष्ट हो गयी होंगी। शास्त्रीय दृष्टिसे तो विकासकी अपेक्षा ह्रास पक्ष ही संगत जँचता है। सत्ययुगके प्राणी आजके प्राणियोंकी अपेक्षा बहुत बडे थे। युग ह्राससे सबमे ह्रास हो रहा है। जो गाये पहले बड़ी होती थीं, वे भी आज छागप्राय हो रही हैं—'छागप्रायासु धेनुषु' (भागवत १२।२।१४)। किंतु विकासवादका कहना है 'भीमकाय प्राणी भी अमीबाके ही विकास थे, परिस्थिति प्रतिकूल होनेसे वे नष्ट हो गये।' यदि यह सत्य हो तो विकासवादका यान्त्रिक सिद्धान्त असत्य ठहरता हे। विशालकाय प्राणी नष्ट हो गये और अल्पकाय जी रहे हैं। जिस प्रकार दीर्घजीवी कछुआने अल्पजीवी कबूतरको उत्पन्न किया, उसी प्रकार भीमकाय छिपकलीने अल्पकाय छिपकली उत्पन्न की। यद्यपि आज अस्सी मनकी छिपकलीका कहीं पता नहीं लगता, पर क्या यह यन्त्रोका सुधार एव उन्नति हुई अथवा उनका बिगाट एव अवनति हुई ? वस्तुतः कर्मोंके अनुसार जिन प्राणियोने जितना बडा शरीर जितने दिनोके लिये पाया, उतने दिन वे उसे भोगकर चले गये। अब संसार जिन शरीरोके योग्य है, वे बचे हुए हैं और कर्मफल भोग रहे है। 'मत्स्यपुराण' के पक्षयुक्त सर्प भी विकासके साधक नहीं हो सकते। चमगादड़ पशु एव पक्षियोके बीचका क्यो माना जाता है ? पक्षी एकदम चमगादड़ बनकर स्तनधारी हो गये या धीरे-धीरे ? यदि धीरे-धीरे, तब तो इस प्रकारकी आगे-पीछे हजारो कड़ियाँ दिखलानी होगी। यह कहनेसे काम नही चलेगा कि 'आगे-पीछेकी हजारो कड़ियाँ नष्ट हो गयीं।' पहली कडियाँ तो बादवाली कडियोंसे कमजोर