मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ मार्क्सवाद और रामराज्य लिखा है कि 'नेवादा में जॉन टी० रीडको एक आदमीका पदचिह्न और एक अच्छी तरह बना हुआ जूतेका तला मिला है, जिसे वह अपने चट्टानविषयक भूगर्भ-विद्या-सम्बन्धी ज्ञानसे ५० लाख वर्ष पुराना बतलाता है। उस तलेमें ऐसी सिलाई, धागोंके मरोड़ और धागोंके माप मिलते हैं, जो आजकलके अच्छे-से-अच्छे बने हुए जूतोंके समान पक्के और सूक्ष्म हैं। इससे सिद्ध हुआ कि ५० लाख वर्षसे तो मनुष्य जूता पहनता है और वह सुई, सूत, सिलाई, नपाईका ज्ञान प्राप्त कर चुका था।' विकासके अनुसार यह ज्ञान बहुत दिनोंमें हुआ होगा। इस विचारसे मनुष्यकी उत्पत्तिका समय आजसे यदि एक करोड़ वर्ष पूर्व माने और हेकलके मतानुसार प्राणियोंकी २१ कड़ियोंके बाद मनुष्यकी उत्पत्ति माने एवं प्रत्येक कड़ीको यदि एक करोड़ वर्षका समय दे तो प्रथम प्राणीकी उत्पत्तिसे मनुष्यकी उत्पत्तितक २२ करोड़ वर्ष और आजतक २३ करोड़ वर्ष होते हैं। लोकमान्य तिलक ने 'गीता-रहस्य'में डॉ० गेडाका मत उद्धृत करते हुए लिखा है कि 'मछलीसे मनुष्य होनेमें ५३ लाख ७५ हजार पीढियाँ बीती हैं। इतनी ही पीढियाँ अमीबासे मछली बननेमें बीती होगी अर्थात् अमीबा अबतक लगभग एक करोड़ पीढियाँ बीती। कोई पीढ़ी एक दिन, तो कोई सौ वर्ष जीती है। यदि औसत प्रति पीढ़ी २५ वर्ष भी मान ले तो इस हिसाबसे भी प्राणियोंकी उत्पत्ति- का समय २५ करोड़ वर्ष होता है।' यह भी सिद्ध है कि पृथिवी उत्पन्न होनेके करोड़ों वर्ष बाद उसपर प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई होगी। यह संख्या विकास- वादियोंकी निर्धारित संख्यासे बहुत आगे जाती है। विकासवादी पृथिवीकी प्राणियोंवाली तहोंकी आयु १० करोड़ वर्ष बतलाते हैं। वे अमीबाको सादी रचनावाला कहते हैं, परन्तु यह ठीक नहीं है। वह तो क्लिष्ट रचनावाला ही प्राणी है। अपने शरीरमें हर जगह छिद्र कर लेना क्या साधारण बात है ? वनस्पतिकी ही रचना सादी है। सिद्धान्ततः भोग्य सादी रचनावाले और भोक्ता क्लिष्ट-रचनावाले हैं। पृथिवीकी नीचेवाली तहमें हड्डीवाले प्राणी नहीं मिलते, अतः कहा जाता है कि 'पहले बिना हड्डीवाले प्राणी हुए।' परंतु इसपर यह भी तो कहा जा सकता है कि 'पृथिवीके दबावसे नीचेवाली तह तथा उसके साथ हड्डियाँ भी पिघल गयी होगी।' अतः 'पहले हड्डियाँ नहीं थीं' यह कल्पना भी गलत है। फिर इससे यह सिद्ध नहीं होता कि अस्थिहीनोंसे ही अस्थिवालोंकी उत्पत्ति हुई। हड्डी अपने आप ही उत्पन्न होती है यह पीछे कहा जा चुका है। यदि यह सत्य हो कि 'जिस समय जो प्राणी थे, वही थे और वे भीमकाय थे,' तो वर्तमान प्राणियोंका उनसे उत्पन्न होना सिद्ध नहीं होता। किंतु सबसे प्रथम उत्पन्न एक कोष्ठवाला अमीबा भी अबतक मौजूद है। इतना ही नहीं, वे अन्तिम प्राणी मनुष्यसे भी अधिक हैं। अतः यह सत्य नहीं है कि