मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजगह टाप होना। कहा जाता है कि 'घोड़ेकी चार अंगुलियाँ लुप्त हो गयीं; बीचकी अँगुली टाप बन गयी । गाय-भैंसके अगल-बगलकी चार अंगुलियाँ मौजूद हैं, बीचवाली लुप्त हो गयी ।' जो अँगलियाँ विद्यमान हैं, उनमें दो तो फटे हुए खुरको बतलाया जाता है और दो उठी हुई मदनखुरी बतायी जाती है । यह कैसा उलटा-पुलटा विकास ? किसीमें चारों अंगुलियाँ लुप्त होकर बीचकी अँगुली टाप बन गयी तो किसीमें सब रहीं, केवल बीचकी ही लुप्त ! गधे, घोड़े और खच्चरके पञ्जरोंमें धोखा हो सकता है, वनबिलाव और चीतेके बच्चेके पंजरोंमें भी धोखा हो सकता है । इसी तरह सभी पंजर मिलनेवाली जातियोंको एक ही जातिके स्थिर करनेमें भी धोखा हो सकता है । मि० डे० क्वाडर फेगस अपनी 'लेस अम्यूलस डे डारविन' पुस्तकमें लिखते हैं कि 'घोड़ोंकी कड़ियाँ न तो इस प्रकारके जिंदा जानवरोंसे पूरी होती हैं और न प्रस्तरीभूत अस्थिपञ्जरोंसे ही । ऐसे प्राणियोंका अस्तित्व कल्पनामात्र है ।' इसी तरह जोन्म वोसनने नवम्बर सन् १९२२ ई० के 'न्यू एज' पत्रमें लिखा है कि 'ब्रिटिश म्यूजियमका अध्यक्ष कहता है कि “इस म्यूजियममें एक कण भी ऐसा नहीं, जो यह सिद्ध कर सके कि जातियोंमें परिवर्तन हुआ है । विकासविषयक दर्शनमें नौ बातें निःसार हैं । परीक्षणका आधार स्वच्छन्दता और निरीक्षणपर बिल्कुल अवलम्बित नहीं । संसारभरमें ऐसी कोई सामग्री नहीं, जो विकास-सिद्धान्तकी सहायक हो ।' इस तरह लुप्त-जन्तु-शास्त्रके आधारपर विकासका सिद्ध होना असम्भव हो गया है । यदि विकास होता तो बर्फीले स्थानोंमें कोई साङ्गोपाङ्ग ऐसा प्राणी मिलता, जिससे विकास सिद्ध होता । पृथ्वीकी तहोंकी आयुका भी अभी हिसाब नहीं बैठा । तहोंके प्रस्तरीभूत प्राणियोंकी आयु जाननेके लिये तहोंकी आयुका जानना आवश्यक है । जब पृथ्वीकी ही आयुका ठीक ज्ञान नहीं, तब तहकी आयुका ज्ञान कैसे होगा ? फिर एक तहके प्राणी कितने समयमें प्रस्तरीभूत हुए, यह जाननेका क्या साधन है ? आधुनिक विज्ञान यह भी नहीं बतला सकता कि मनुष्योंको पैदा हुए कितने दिन हुए । फिर समस्त कड़ियोंकी वर्ष संख्या मिलाकर पृथ्वीकी आयुके साथ मेल बैठानेका विकासवादियोंके पास कोई साधन नहीं । पृथ्वीकी अमुक बनावट किन साधनोंसे होती है, उन साधनोंका निर्माण किससे होता है, इन बातोंतक अभी विज्ञान पहुँचा ही नहीं । यदि जगत्की रचनाके कारणोंका ज्ञान, उन कारणोंकी गति, शक्ति तथा परिणामके मापका ज्ञान होता, तो पृथ्वीकी आयु निश्चित होती । परंतु इनका ठीक ज्ञान नहीं । कल्पनाके द्वारा निकाला सिद्धान्त विश्वसनीय नहीं होता । अगस्त सन् १९२३ के 'थियोसोफिकल पत्र' में हैनसनने