मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ मार्क्सवाद और रामराज्य 'घोडे किन प्राणियोसे विकसित होकर इस रूपमे आये हैं।' ऊपरकी तहमें वर्तमान घोडे-जैसा ही जन्तु मिलता है । मध्य-स्तरमें वह ३-४ अंगुलीवाला मिलता है । निचली तहोंमें उसका आकार शशकके समान और ५ अंगुलीवाले पंजोंका मिलता है । गाय, भैंसको पाँचमेंसे जिस तरह चार ही अंगुलियाँ रह गयीं, उसी तरह इस जानवरकी भी अगुलियाँ क्रमशः घटते-घटते बीचकी अँगुली टाप बन गयी । घोडेके आदिपूर्वजका अबतक पता नहीं लगा; परंतु ज्ञात होता है कि वह पाँच अंगुलीवाला था । इसी तरह हाथी और हरिणके आद्यवशंजोसे लेकर वर्तमान समयतककी विकास परम्परा ज्ञात होती है । लुप्त कड़ियोंका उदाहरण 'ओप्टेरिक्स' है । यह पखयुक्त उडनेवाला सर्प है। इसका सिर छोटा, जबडा बडा और दाँत साँप जैसे हैं; परंतु पंख एव पजे पक्षियो- सरीखे हैं । इसी तरह एक प्राणी 'टेरोडिक्टिल' है । इसके हाथोकी एक-एक अगुंली बहुत बड़ी है, जिससे पखको सहारा मिलता है । इसमें सर्प, पक्षी तथा स्तनधारियोकी थोडी-थोडी बाते मिली हुई हैं । इसी प्रकार कँगारू, ओपोसम आदि इस अन्वेषणमें सहायक हैं।" उपर्युक्त बातोपर विचार करनेपर भी विकास सिद्ध नही होता । यह सिद्ध है कि वर्तमान साधनोसे पृथ्वीकी आयुका पता नहीं लगता और सारी पृथिवीका खोजना भी सम्भव नहीं । अस्थियोका नष्ट हो जाना, पिघल जाना आदि भी सम्भव है । फिर इस लुप्त-शास्त्रके बलपर विकासवाद कैसे सिद्ध होगा ? अस्थियोके मेलका सिद्धान्त भी गलत है । यदि घोड़ा, गधा, जेब्रा एक ही जगह मिले तो विकासवादी तीनोंके पजरोको एक ही कह सकता है । फिर भी तीनो एक नहीं, अतः अस्थियोके मेल मिलाकर शृङ्खला मिलाना असगत है । 'घोडेकी कडियाँ मिल गयीं' यह बात भी गलत है । घोड़ेकी कड़ियोपर विकासवादियोका दृढ़ विश्वास है । यूरोप, अमेरिकाकी खुदाईसे मिले हुए भिन्न समयोंके विचित्र जातिके अस्थि-पंजरोको मिलाकर यह दिखलानेकी कोशिश की जाती है कि 'ये सब घोडेके पूर्वज उसके विकासकी कड़ियाँ हैं ।' हक्सले साहबने इसे महत्त्व दिया है; परंतु आधुनिक खोजसे इसका खण्डन हो गया । सर जे० डब्ल्यू० डासनने अपनी 'माडर्न आइडिया ऑफ इवोल्यूशन' (विकासकी आधुनिक भावना) नामक पुस्तकसे अच्छी तरह सिद्ध किया है कि 'अमेरिका एव यूरोपके इन जन्तुओमें जिन्हें घोड़ेका पूर्वज कहा जाता है, परस्पर कुछ भी सम्बन्ध नहीं है ।' घोड़ा बड़ा ही विचित्र जानवर है। पाँच बाते उसमें अन्य तृणाहारी पशुओंसे विलक्षण हैं- (१) नीचे-ऊपर दोनो तरफ दाँत, (२) प्रसवके समय घोडीकी जीभका गिरना, (३) घोड़ेके अगले पैरोके गाँठोंमें परोंका निशान होना, (४) नर घोड़ेके स्तन न होना और (५) खुरकी