भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

१६६ मार्क्सवाद और रामराज्य 'घोडे किन प्राणियोसे विकसित होकर इस रूपमे आये हैं।' ऊपरकी तहमें वर्तमान घोडे-जैसा ही जन्तु मिलता है । मध्य-स्तरमें वह ३-४ अंगुलीवाला मिलता है । निचली तहोंमें उसका आकार शशकके समान और ५ अंगुलीवाले पंजोंका मिलता है । गाय, भैंसको पाँचमेंसे जिस तरह चार ही अंगुलियाँ रह गयीं, उसी तरह इस जानवरकी भी अगुलियाँ क्रमशः घटते-घटते बीचकी अँगुली टाप बन गयी । घोडेके आदिपूर्वजका अबतक पता नहीं लगा; परंतु ज्ञात होता है कि वह पाँच अंगुलीवाला था । इसी तरह हाथी और हरिणके आद्यवशंजोसे लेकर वर्तमान समयतककी विकास परम्परा ज्ञात होती है । लुप्त कड़ियोंका उदाहरण 'ओप्टेरिक्स' है । यह पखयुक्त उडनेवाला सर्प है। इसका सिर छोटा, जबडा बडा और दाँत साँप जैसे हैं; परंतु पंख एव पजे पक्षियो- सरीखे हैं । इसी तरह एक प्राणी 'टेरोडिक्टिल' है । इसके हाथोकी एक-एक अगुंली बहुत बड़ी है, जिससे पखको सहारा मिलता है । इसमें सर्प, पक्षी तथा स्तनधारियोकी थोडी-थोडी बाते मिली हुई हैं । इसी प्रकार कँगारू, ओपोसम आदि इस अन्वेषणमें सहायक हैं।" उपर्युक्त बातोपर विचार करनेपर भी विकास सिद्ध नही होता । यह सिद्ध है कि वर्तमान साधनोसे पृथ्वीकी आयुका पता नहीं लगता और सारी पृथिवीका खोजना भी सम्भव नहीं । अस्थियोका नष्ट हो जाना, पिघल जाना आदि भी सम्भव है । फिर इस लुप्त-शास्त्रके बलपर विकासवाद कैसे सिद्ध होगा ? अस्थियोके मेलका सिद्धान्त भी गलत है । यदि घोड़ा, गधा, जेब्रा एक ही जगह मिले तो विकासवादी तीनोंके पजरोको एक ही कह सकता है । फिर भी तीनो एक नहीं, अतः अस्थियोके मेल मिलाकर शृङ्खला मिलाना असगत है । 'घोडेकी कडियाँ मिल गयीं' यह बात भी गलत है । घोड़ेकी कड़ियोपर विकासवादियोका दृढ़ विश्वास है । यूरोप, अमेरिकाकी खुदाईसे मिले हुए भिन्न समयोंके विचित्र जातिके अस्थि-पंजरोको मिलाकर यह दिखलानेकी कोशिश की जाती है कि 'ये सब घोडेके पूर्वज उसके विकासकी कड़ियाँ हैं ।' हक्सले साहबने इसे महत्त्व दिया है; परंतु आधुनिक खोजसे इसका खण्डन हो गया । सर जे० डब्ल्यू० डासनने अपनी 'माडर्न आइडिया ऑफ इवोल्यूशन' (विकासकी आधुनिक भावना) नामक पुस्तकसे अच्छी तरह सिद्ध किया है कि 'अमेरिका एव यूरोपके इन जन्तुओमें जिन्हें घोड़ेका पूर्वज कहा जाता है, परस्पर कुछ भी सम्बन्ध नहीं है ।' घोड़ा बड़ा ही विचित्र जानवर है। पाँच बाते उसमें अन्य तृणाहारी पशुओंसे विलक्षण हैं- (१) नीचे-ऊपर दोनो तरफ दाँत, (२) प्रसवके समय घोडीकी जीभका गिरना, (३) घोड़ेके अगले पैरोके गाँठोंमें परोंका निशान होना, (४) नर घोड़ेके स्तन न होना और (५) खुरकी

जगह टाप होना। कहा जाता है कि 'घोड़ेकी चार अंगुलियाँ लुप्त हो गयीं; बीचकी अँगुली टाप बन गयी । गाय-भैंसके अगल-बगलकी चार अंगुलियाँ मौजूद हैं, बीचवाली लुप्त हो गयी ।' जो अँगलियाँ विद्यमान हैं, उनमें दो तो फटे हुए खुरको बतलाया जाता है और दो उठी हुई मदनखुरी बतायी जाती है । यह कैसा उलटा-पुलटा विकास ? किसीमें चारों अंगुलियाँ लुप्त होकर बीचकी अँगुली टाप बन गयी तो किसीमें सब रहीं, केवल बीचकी ही लुप्त ! गधे, घोड़े और खच्चरके पञ्जरोंमें धोखा हो सकता है, वनबिलाव और चीतेके बच्चेके पंजरोंमें भी धोखा हो सकता है । इसी तरह सभी पंजर मिलनेवाली जातियोंको एक ही जातिके स्थिर करनेमें भी धोखा हो सकता है । मि० डे० क्वाडर फेगस अपनी 'लेस अम्यूलस डे डारविन' पुस्तकमें लिखते हैं कि 'घोड़ोंकी कड़ियाँ न तो इस प्रकारके जिंदा जानवरोंसे पूरी होती हैं और न प्रस्तरीभूत अस्थिपञ्जरोंसे ही । ऐसे प्राणियोंका अस्तित्व कल्पनामात्र है ।' इसी तरह जोन्म वोसनने नवम्बर सन् १९२२ ई० के 'न्यू एज' पत्रमें लिखा है कि 'ब्रिटिश म्यूजियमका अध्यक्ष कहता है कि “इस म्यूजियममें एक कण भी ऐसा नहीं, जो यह सिद्ध कर सके कि जातियोंमें परिवर्तन हुआ है । विकासविषयक दर्शनमें नौ बातें निःसार हैं । परीक्षणका आधार स्वच्छन्दता और निरीक्षणपर बिल्कुल अवलम्बित नहीं । संसारभरमें ऐसी कोई सामग्री नहीं, जो विकास-सिद्धान्तकी सहायक हो ।' इस तरह लुप्त-जन्तु-शास्त्रके आधारपर विकासका सिद्ध होना असम्भव हो गया है । यदि विकास होता तो बर्फीले स्थानोंमें कोई साङ्गोपाङ्ग ऐसा प्राणी मिलता, जिससे विकास सिद्ध होता । पृथ्वीकी तहोंकी आयुका भी अभी हिसाब नहीं बैठा । तहोंके प्रस्तरीभूत प्राणियोंकी आयु जाननेके लिये तहोंकी आयुका जानना आवश्यक है । जब पृथ्वीकी ही आयुका ठीक ज्ञान नहीं, तब तहकी आयुका ज्ञान कैसे होगा ? फिर एक तहके प्राणी कितने समयमें प्रस्तरीभूत हुए, यह जाननेका क्या साधन है ? आधुनिक विज्ञान यह भी नहीं बतला सकता कि मनुष्योंको पैदा हुए कितने दिन हुए । फिर समस्त कड़ियोंकी वर्ष संख्या मिलाकर पृथ्वीकी आयुके साथ मेल बैठानेका विकासवादियोंके पास कोई साधन नहीं । पृथ्वीकी अमुक बनावट किन साधनोंसे होती है, उन साधनोंका निर्माण किससे होता है, इन बातोंतक अभी विज्ञान पहुँचा ही नहीं । यदि जगत्की रचनाके कारणोंका ज्ञान, उन कारणोंकी गति, शक्ति तथा परिणामके मापका ज्ञान होता, तो पृथ्वीकी आयु निश्चित होती । परंतु इनका ठीक ज्ञान नहीं । कल्पनाके द्वारा निकाला सिद्धान्त विश्वसनीय नहीं होता । अगस्त सन् १९२३ के 'थियोसोफिकल पत्र' में हैनसनने

१६८ मार्क्सवाद और रामराज्य लिखा है कि 'नेवादा में जॉन टी० रीडको एक आदमीका पदचिह्न और एक अच्छी तरह बना हुआ जूतेका तला मिला है, जिसे वह अपने चट्टानविषयक भूगर्भ-विद्या-सम्बन्धी ज्ञानसे ५० लाख वर्ष पुराना बतलाता है। उस तलेमें ऐसी सिलाई, धागोंके मरोड़ और धागोंके माप मिलते हैं, जो आजकलके अच्छे-से-अच्छे बने हुए जूतोंके समान पक्के और सूक्ष्म हैं। इससे सिद्ध हुआ कि ५० लाख वर्षसे तो मनुष्य जूता पहनता है और वह सुई, सूत, सिलाई, नपाईका ज्ञान प्राप्त कर चुका था।' विकासके अनुसार यह ज्ञान बहुत दिनोंमें हुआ होगा। इस विचारसे मनुष्यकी उत्पत्तिका समय आजसे यदि एक करोड़ वर्ष पूर्व माने और हेकलके मतानुसार प्राणियोंकी २१ कड़ियोंके बाद मनुष्यकी उत्पत्ति माने एवं प्रत्येक कड़ीको यदि एक करोड़ वर्षका समय दे तो प्रथम प्राणीकी उत्पत्तिसे मनुष्यकी उत्पत्तितक २२ करोड़ वर्ष और आजतक २३ करोड़ वर्ष होते हैं। लोकमान्य तिलक ने 'गीता-रहस्य'में डॉ० गेडाका मत उद्धृत करते हुए लिखा है कि 'मछलीसे मनुष्य होनेमें ५३ लाख ७५ हजार पीढियाँ बीती हैं। इतनी ही पीढियाँ अमीबासे मछली बननेमें बीती होगी अर्थात् अमीबा अबतक लगभग एक करोड़ पीढियाँ बीती। कोई पीढ़ी एक दिन, तो कोई सौ वर्ष जीती है। यदि औसत प्रति पीढ़ी २५ वर्ष भी मान ले तो इस हिसाबसे भी प्राणियोंकी उत्पत्ति- का समय २५ करोड़ वर्ष होता है।' यह भी सिद्ध है कि पृथिवी उत्पन्न होनेके करोड़ों वर्ष बाद उसपर प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई होगी। यह संख्या विकास- वादियोंकी निर्धारित संख्यासे बहुत आगे जाती है। विकासवादी पृथिवीकी प्राणियोंवाली तहोंकी आयु १० करोड़ वर्ष बतलाते हैं। वे अमीबाको सादी रचनावाला कहते हैं, परन्तु यह ठीक नहीं है। वह तो क्लिष्ट रचनावाला ही प्राणी है। अपने शरीरमें हर जगह छिद्र कर लेना क्या साधारण बात है ? वनस्पतिकी ही रचना सादी है। सिद्धान्ततः भोग्य सादी रचनावाले और भोक्ता क्लिष्ट-रचनावाले हैं। पृथिवीकी नीचेवाली तहमें हड्डीवाले प्राणी नहीं मिलते, अतः कहा जाता है कि 'पहले बिना हड्डीवाले प्राणी हुए।' परंतु इसपर यह भी तो कहा जा सकता है कि 'पृथिवीके दबावसे नीचेवाली तह तथा उसके साथ हड्डियाँ भी पिघल गयी होगी।' अतः 'पहले हड्डियाँ नहीं थीं' यह कल्पना भी गलत है। फिर इससे यह सिद्ध नहीं होता कि अस्थिहीनोंसे ही अस्थिवालोंकी उत्पत्ति हुई। हड्डी अपने आप ही उत्पन्न होती है यह पीछे कहा जा चुका है। यदि यह सत्य हो कि 'जिस समय जो प्राणी थे, वही थे और वे भीमकाय थे,' तो वर्तमान प्राणियोंका उनसे उत्पन्न होना सिद्ध नहीं होता। किंतु सबसे प्रथम उत्पन्न एक कोष्ठवाला अमीबा भी अबतक मौजूद है। इतना ही नहीं, वे अन्तिम प्राणी मनुष्यसे भी अधिक हैं। अतः यह सत्य नहीं है कि

विकासवाद १८९ 'जब जो थे, तब वही थे।' पृथिवीकी खुदाईमे भी यह बात पायी नही जाती। जिस तहमे जो हड्डियाँ पायी जाती हैं, वह तह उस सिद्धान्तानुसार उन्हीं जन्तुओमे पटी होनी चाहिये, क्योकि 'उस समय वही थे और दीर्घकाय (विशालकाय) थे।' पर ऐसा है नहीं, बहुत गहरा खोदनेपर भी एक तहमें थोड़े ही जन्तु एक प्रकारके पाये जाते हैं। उन प्राणियोका विशालकाय होना तो विकासवादके विरुद्ध ही होगा, क्योकि उसके अनुसार तो बहुत छोटे प्राणियोसे ही विकासका आरम्भ होता है। जब छोटे प्राणी ऐसे विशालकाय हुए कि एक छिपकली ही अस्सी मन वजनकी हुई और वृक्ष इतने बड़े हुए कि खदानोंमें कोयलाके पहाड बन गये तो उसी नियमानुसार आरम्भिक मनुष्योंकी लाशे ऐसी क्यो नही मिलीं ? वह भी कम-से-कम ताडके पेडके बराबर तो होनी ही चाहिये थी। छिपकली उतनी क्यो बढ़ी और आदि प्राणी अमीवा और अन्तिम प्राणी मनुष्य उतना क्यों न बढ़ा ? क्यो भैसके बराबर चीटियाँ देखनेको न मिलीं ? और जीवित प्राणियोंमे आज वैसे भीमकाय क्यों नहीं ? हो सकता है कि कुछ योनियाँ पहले भीमकाय रही हों, परन्तु उनके वंशका आज पता नहीं लगता। वे सपरिवार नष्ट हो गयी होंगी। शास्त्रीय दृष्टिसे तो विकासकी अपेक्षा ह्रास पक्ष ही संगत जँचता है। सत्ययुगके प्राणी आजके प्राणियोंकी अपेक्षा बहुत बडे थे। युग ह्राससे सबमे ह्रास हो रहा है। जो गाये पहले बड़ी होती थीं, वे भी आज छागप्राय हो रही हैं—'छागप्रायासु धेनुषु' (भागवत १२।२।१४)। किंतु विकासवादका कहना है 'भीमकाय प्राणी भी अमीबाके ही विकास थे, परिस्थिति प्रतिकूल होनेसे वे नष्ट हो गये।' यदि यह सत्य हो तो विकासवादका यान्त्रिक सिद्धान्त असत्य ठहरता हे। विशालकाय प्राणी नष्ट हो गये और अल्पकाय जी रहे हैं। जिस प्रकार दीर्घजीवी कछुआने अल्पजीवी कबूतरको उत्पन्न किया, उसी प्रकार भीमकाय छिपकलीने अल्पकाय छिपकली उत्पन्न की। यद्यपि आज अस्सी मनकी छिपकलीका कहीं पता नहीं लगता, पर क्या यह यन्त्रोका सुधार एव उन्नति हुई अथवा उनका बिगाट एव अवनति हुई ? वस्तुतः कर्मोंके अनुसार जिन प्राणियोने जितना बडा शरीर जितने दिनोके लिये पाया, उतने दिन वे उसे भोगकर चले गये। अब संसार जिन शरीरोके योग्य है, वे बचे हुए हैं और कर्मफल भोग रहे है। 'मत्स्यपुराण' के पक्षयुक्त सर्प भी विकासके साधक नहीं हो सकते। चमगादड़ पशु एव पक्षियोके बीचका क्यो माना जाता है ? पक्षी एकदम चमगादड़ बनकर स्तनधारी हो गये या धीरे-धीरे ? यदि धीरे-धीरे, तब तो इस प्रकारकी आगे-पीछे हजारो कड़ियाँ दिखलानी होगी। यह कहनेसे काम नही चलेगा कि 'आगे-पीछेकी हजारो कड़ियाँ नष्ट हो गयीं।' पहली कडियाँ तो बादवाली कडियोंसे कमजोर

१७० मार्क्सवाद और रामराज्य थीं, वे नष्ट हो सकती थीं; परंतु बादवाली कड़ियाँ क्यों नष्ट हो गयीं ? वे तो योग्य होनेसे ही विकसित हुई थीं। वर्तमान चमगादडसे उसके बादकी कड़ियाँ, फिर आगे-पीछेकी सब कड़ियोंको हटाकर एकमात्र चमगादड ही कैसे बच रहा ? ये बातें विकासवादके साथ कैसे संगत होगी ? पुराणोंके अनुसार तो घोड़ों और पहाड़ोंके भी उड़नेकी बात पायी जाती है। क्या विकासवादी उसे भी मानेंगे ? वस्तुतः जिन्हें संधि- योनियाँ या मध्य-कड़ियाँ कहा जाता है, वे चमगादड़, उड़नेवाले सर्प आदि स्वतन्त्र योनियाँ ही हैं। अतः 'लुप्त-जन्तु शास्त्र' के आधारपर विकासवाद सिद्ध नहीं होता ।

गर्भ-शास्त्र

कहा जाता है कि "गर्भ-शास्त्र' के आधारपर विकास सिद्ध होता है । पानीमें पड़े हुए पत्तों या लकड़ियोंपर जो लसदार काले चिकने कण दिखायी पड़ते हैं, वे मेंढकोंके अंडे हैं । तीन-चार दिनमें ये कण या पिण्ड पूँछदार और चपटे सिरवाले जन्तुका आकार धारण कर लेते हैं। फिर इनके गलेके पास मछलियोंकी तरह श्वास लेनेके गलफड़े बन जाते हैं। ये सब बातें अंडेमे ही हो जाती हैं। इसके बाद बच्चे अंडोंको छोड़कर पानीपर तैरने लगते हैं। वे उस समय गलफड़ोंसे श्वास लेते हैं। उन्हें पूँछ भी होती है। वे एक प्रकारकी मछली ही-जैसे लगते हैं। शीत ऋतु आते ही वे किसी बंद जगहमें छिप जाते हैं। वर्षाका आरम्भ होते ही वे फिर बढ़ने लगते हैं। धीरे-धीरे पूँछ लुप्त हो जाती है और पैर निकल आते हैं। फेफड़े बनने लगते हैं और वे गलफड़से श्वास लेना बंद कर देते हैं । तब ये पूरे मेंढक बन जाते हैं। इस इतिहाससे मालूम पड़ता है कि प्राणीको अपनी उन्नतिके लिये विकासके पूरे चक्रमें घूमना पड़ता है। जिस-जिस जातिमे घूमता हुआ प्राणी जिस अन्तिम योनिमें पहुँचा है, गर्भसे लेकर वृद्धितकके समयमे ही उसे उन सभी चक्रोंमें घूमना पड़ता है। मुर्गोंका अंडा भी एक कोष्ठवाले अमीवासे ही प्रारम्भ होता है । इसमें भी मछलियोंकी तरह गलफड़े होते हैं। अंडेसे बाहर आनेपर भी गलेके पास इसके चिह्न रहते हैं। इससे यही अनुमान होता है कि पक्षी भी मछली और मेंढकके रूपोंमें होता हुआ ही पक्षी बना है । यद्यपि गर्भके परिवर्तन बहुत संक्षिप्त होते हैं तथापि वे अपनी पूर्व पीढ़ियोंका सब इतिहास दिखला देते हैं । सूअर, गौ, खरगोश और मनुष्यादि स्तनधारियोंके गर्भ सब एक ही प्रणालीसे विकसित होते हैं। मानवगर्भ क्रमशः मछली, मेंढक, सर्प और पक्षीके आकारका होकर तब स्तनधारियोंकी अवस्थामें आता है। इससे ज्ञात होता है कि मनुष्यका इन योनियोंसे सम्बन्ध है । चाहे लाखों वर्ष लगे हों, पर मनुष्यकी उत्पत्ति अमीवासे ही हुई है । यह प्रत्यक्ष प्रमाण है । प्रकृति इससे अधिक क्या प्रमाण दे सकती है ? कीड़ोंके प्रथम पिण्ड सब समान ही होते हैं । उस दशामें

विकासवाद १७१ नहीं पहचाना जा सकता कि यह तितली, भौंरा, ततैया अथवा कनखजूरा क्या है ? तितली और रेशमके कीड़े भी, जो अपनी वृद्धिमें अनेक रूप दिखलाते हैं, प्राथमिक दशामें एक ही समान रहते हैं। इससे यही मालूम होता है कि ये सब एक ही पूर्वजोंकी संतति ह, जो अपनी पीढ़ियोंका पूरा चक्कर लगा रहे हैं। गर्भके बढ़नेका क्रम इस प्रकार है—पहले एक कोष्ठ, फिर दो कोष्ठ, फिर दोके चार, इस तरह चारके आठ और आठके सोलह कोष्ठ हो जाते हैं । कोष्ठ सदैव दूने क्रमसे बढ़ते हैं। इसी प्रकार अंडा भी दूने क्रमसे बढ़ता है। अमीबा एक कोष्ठधारी और हाइड्रा दो कोष्ठवारी होता है। इस तरह गर्भ शास्त्रसे मालूम पड़ता है कि 'पहले प्राणी सरल रचनाके और फिर क्लिष्ट रचनावाले होते हैं।' उपर्युक्त बातोंपर विचार करनेसे भी विकास सिद्ध नहीं होता । गर्भमें जो सादी रचनाके बाद क्लिष्ट रचना दिखलायी पड़ती है, उसका कारण विकासकी उत्पत्तिका पुनर्दर्शन नहीं, प्रत्युत यन्त्र बनानेका एक साधारण सा नियम है । किसी भी यन्त्रके बनानेके लिये उसके सूक्ष्म एवं क्लिष्ट पुर्जोंको अटकानेके लिये एक सीधा सादा आधार आवश्यक होता है । चर्खेके निर्माणमें गराडीमें नलिनियोंको डालकर रखा जाता है । साधारण रूलजैसा डंडा उसका आधार है । इसके बाद दो खूँटे एक सीधी-सादी पटियामें गाड़कर रक्खे जाते हैं । यह पटिया ही चर्खेका मूल है अर्थात् एक सीधे मूल आधारपर ही सूक्ष्म, क्लिष्ट पुर्जे जमाये जाते हैं। मोटरमें भी धुरी, कमानी आदि मुख्य आधार है, वह सादा ही है। मनुष्यके शरीररूपी यन्त्रमें भी एक पीठको आधार माना जाता है। उसीको विकासवादी मछली कहने लगते हैं। उसीमें सिर, हाथ, पैर जुड़ जानेपर उसे ही मेढक कहने लगते हैं। पीठकी हड्डीके आधार बिना सिर, हाथ, पैर, हृदय, फुफ्फुस आदि शारीरयन्त्र किस प्रकार एकमें जोड़े जा सकते थे ? क्या विकासवादी कोई ऐसा यन्त्र बतला सकते हैं, जिसके क्लिष्ट पुर्जे किसी आधारपर रक्खे बिना यन्त्ररूप होकर काम दे रहे हो ? क्या पीठकी हड्डी (रीढ़) के बिना शरीरके अवयवोंसे शरीर-पंजर काम लायक बन सकता है ? छोटे-छोटे कीड़ोंमें भी जोड़का आधार आवश्यक होता है। वही आधार रीढ़की हड्डी है। अतएव गर्भकी रचना पीढ़ियोंका चक्कर नहीं, प्रत्युत यन्त्र-रचनाके नियमोंका अत्यावश्यक अनुवर्तनमात्र है। यह बतलाया जा चुका है कि अमीबा भी सादा नहीं, अपितु बड़ी क्लिष्ट रचनावाला है। जैसे वटबीजके भीतर सूक्ष्मरूपसे साङ्गोपाङ्ग समूचा वृक्ष विद्यमान रहता है, वैसे ही अमीबाके छोटे स्वरूपमें ही बारीकीके साथ सभी अवयव संनिविष्ट रहते हैं। बालोंमें रहनेवाले लीख, जूँ, खटमल या चींटीके शरीरमें

१७२ मार्क्सवाद और रामराज्य भी बड़ी ही सूक्ष्म कारीगरी होती है। उन्हें भी सादी-रचनावाले नहीं कहा जा सकता । अतएव 'मैन्युअल ऑफ़ जियालॉजी' में मि० निकलसनका कहना है कि 'अमीबा नामक क्षुद्र जन्तु अकल्य, सूक्ष्म कण ही है, परंतु उसकी पाचन-शक्ति क्लिष्ट-से-क्लिष्ट रचनावाले प्राणियोंकी पाचन-क्रियाके यन्त्रोंसे कम नहीं। वह अपने अंदर भोजन लेता है और बिना किसी पृथक् अवयवके उसे पचा जाता है। सबसे बड़ी नात तो यह है कि वह भोजनमेसे पोषकभाग रख लेता है और अनुपयोगी भाग निकाल डालता है।' हक्सलेका भी 'प्राणियोंके वर्गीकरण' की भूमिकामें कहना है कि “ग्रेगारिनीडा-वर्गके जन्तुओसे नीचे दर्जेके अन्य जन्तु नहीं हैं। परंतु 'रीजोपोडा' वर्गके सूक्ष्म जन्तु उनसे भी अधिक सादी रचनाके हैं । सूक्ष्म-वीक्षण-यन्त्रसे देखा गया है कि इनमें शरीर-जैसी कोई गठन नहीं होती । ये तो पतले किये हुए सरेसके एक परमाणु-जैसे ही हैं । परंतु इनमें भी जीवन-शक्तिके समस्त गुण रहते हैं। ये अपने ही-जैसे प्राणीसे उत्पन्न होते हैं, भोजन पचा सकते हैं और हलचल करते हैं। इतना ही नहीं, ये अपने घुसनेकी छींट, जो बिल्कुल क्लिष्ट-रचनायुक्त होती है, बना लेते हैं। जेलीका यह एक कण प्राकृतिक शक्तियोंको इस प्रकार काबूमें करके ऐसी गणितयुक्त रचना (छींट) बना सकता है, यद्यपि स्वयं रचनारहित और अवयवविहीन है । मेरे लिये यह एक असाधारण सारयुक्त वस्तु है।' इन बातोंसे कौन कह सकता है कि अमीबामें क्लिष्ट-रचना नहीं है ? अतः भोग्य और भोक्ता ही क्रमशः सादी और क्लिष्ट रचनावाले हैं । कर्म-ज्ञानहीन वृक्ष भोग्य और ज्ञानहीन कर्मयुक्त पशु भोक्ता है एव च ज्ञान-हीन पशु भोग्य और ज्ञान-कर्म-युक्त मनुष्य भोक्ता है। विकासवादी वनस्पति और पशुओंकी साथ-साथ उत्पत्ति मानते हैं । यदि प्राणियोंकी उत्पत्तिका चक्कर गर्भमें लगता है तो मनुष्य प्राणी गर्भमें सिरके बल उलटा क्यो लटकता है ? विकासवादी नहीं जानते, पर कहा जा सकता है कि वह वृक्षोंका नमूना है। ज्ञान-कर्म-रहित वृक्ष नीचे सिरवाले होते हैं। पैदा होनेके बाद शिशु हाथ-पैरके बलसे तिरछा चलता है. यह कर्म-युक्त ज्ञान-रहित पशु दशा है । ज्ञानका उदय होनेपर वह खड़ा होकर मनुष्य हो जाता है। गर्भका सिर नीचे रहनेका यही कारण है। यही वृक्षोंकी पहले उत्पत्तिका प्रमाण भी है। वस्तुतः गर्भमें पिछली योनियोंके चक्करकी बात गलत है । मुर्गीका इतिहास दिया गया है। मुर्गी पक्षी-जातिका प्राणी है। इसके पूर्व मछली, मेढक और सर्प जातिके प्राणी हो चुके हैं। मुर्गीके गलफडोंने मछलीका रूप दिखलाया और पैर, सिर निकलनेपर मान लिया जाय कि मेढकका रूप दिग्बलाया । परंतु तीसरे सर्पणशीलोका रूप

क्या है ? पक्षी सर्पोंमें बहुत नजदीक हैं, पक्षीका विकास सर्पणशील प्राणीसे हुआ है; अतः उचित था कि उन सर्पणशील प्राणियोंके गुण पक्षियोंमें हों। परन्तु पक्षियोंमें क्या सर्पणशील प्राणियों-सरीखे दाँत होते हैं ! एक चमगादड़को छोड़कर किसी अन्य पक्षीके दाँत नहीं हैं। परन्तु चमगादड़ सर्पणशीलसे पक्षी नहीं हो रहा है, उसके लिये तो पशुओंसे पक्षी होनेकी बात कहना अधिक संगत है क्योंकि उसके स्तन और कान होते हैं। जब सर्पोंमें सर्पणशीलोंके गुण नहीं तब पिछली योनियोंमें उसके चक्कर काटनेकी बात कैसे सिद्ध होगी ? केवल एक-दो बातें देखकर कल्पनाका इतना बड़ा महल खड़ा करना दुस्साहस ही है। उसी तरह मण्डूक यदि मछलीसे हुआ होता तो उसको पैर न होने चाहियें थे । वह बढ़नेके समय ही गलफड़ोंसे श्वास लेता है। उसकी यह अवस्था गर्भावस्था ही है। गर्भावस्थामें तो मनुष्यका बच्चा भी नालके द्वारा प्राण और पोषण पाता है। इतनेहीसे क्या उसे मछली कहा जा सकता है ? यदि ऐसा होता तो सभी बच्चे पहले गलफड़ेसे श्वास लेते, क्योंकि विकासवादीके अनुसार सभीका विकास [L

१७४ मार्क्सवाद और रामराज्य इस भेदका क्या कारण है ? गर्भकी विचित्रता, महत्ता भी ईश्वरी कारीगरीका एक नमूना है । एक नगण्य शुक्र-शोणित-बिन्दु क्रमेण वृद्धिगत होकर हस्त, पाद, नेत्र, श्रोत्र, बुद्धियुक्त होकर ज्ञानवान् हो जाय, यह ईश्वरकी अघटित-घटना- पटीयसी मायाशक्तिका वैचित्र्य है । गर्भके विकासवादी इतिहासपर विज्ञान-वेत्ताओ- को भी पूरा विश्वास नही है । हक्सले और हेकलका कहना है कि 'गर्भका इतिहास अति संक्षिप्त एव अधूरा है ।' प्रश्न हो सकता है कि ऐसा क्यों ? यदि गर्भ-इतिहास प्राणियोंके विकास-क्रमकी पाठमाला है तो इसमे गडबड़ी कैसे ? बीचमे गर्भ बेसिलसिले क्यो भासित होने लगे ? मण्डूकसे सर्पणशील होकर पक्षी होना, पर सर्पोंकी हालतका पता नही । बीचमें पुच्छल ताराकी शकल क्यो आ गयीं ? विकासवादी कहते हैं कि 'इस गर्भावस्थाके इतिहासमें जहाँ समानताएँ समाप्त होकर भिन्न-भिन्न मागोंका अवलम्बन करती हुई प्रतीत होती हैं, वहाँ वे स्थान बतलाते हैं कि प्राणियोने परिस्थितिके अनुसार भिन्न-भिन्न मागोंसे चलना आरम्भ किया ।' शायद इसका मतलब यह है कि जहाँसे घास खानेवाले स्तनधारियोके बाद स्तनधारियोमें मास खानेकी प्रवृत्ति हुई, वही प्रक्षेप है । परन्तु यह बहुत भद्दा समाधान है । क्या घास खानेवालेसे एकदम मास खानेवाले हो गये ? क्या गायके बछड़ोमेंसे एक भेड़िया हो गया, क्योकि मछलीसे मेढक होना जितना कठिन है, बछड़ेसे भेड़िया होना उतना कठिन नही । वस्तुतः प्रत्येक जातिके स्वतन्त्र गर्भ होते हैं । इसमे पुरानी पीढ़ियोंके चक्करकी बात सर्वथा व्यर्थ है । इसीलिये 'विकासवाद' पुस्तकमें हारकर लिखा गया है कि 'किसी' भी प्राणीकी गर्भावस्थाका इतिहास पूर्णतया हम नही जानते और न किसीकी गर्भावस्थाके सब परिवर्त्तन देखे ही गये है अथवा न उनका सार्थक कारण पूर्णतया बतलाया जा सकता है ।' विकासवादी कहते है कि 'तुलनात्मक दृष्टि, मनुष्यकी शरीर-रचना, गर्भ- परिवर्त्तन, चट्टानोंमे प्राप्त मनुष्यके अवयव आदिसे प्रतीत होता है कि यन्त्रकी भाँति मनुष्य भी उन्हीं प्राकृतिक नियमोके अधीन रहता है, जिनके अधीन अन्य प्राणी हैं । मनुष्य-देहका भी उन्हीं तत्त्वोंसे निर्माण हुआ है, जिनसे औरोका । स्तनधारी श्रेणीकी बदर कक्षावाली बनमानुष उपजातिमें ही मनुष्यका स्थान है । वानर कक्षाकी विशेषताएँ ये है—( १ ) गर्भनाल झिल्लीसे सम्बन्ध रखता है, ( २ ) हाथों, पैरोके अँगूठे चारो ओर फिर सकते हैं, अतएव वे पैरसे भी पकड़ सकते हैं, ( ३ ) वृक्षोंपर रहते हैं, ( ४ ) इनके दूधके दाँत और स्थिर अन्य दाँत होते हैं, ( ५ ) वानर-कक्षाके भिन्न वंशोंमें दाँतोकी संख्या नियत होती है, ( ६ ) हाथमें पाँच अंगुलियाँ, नाखून और पंजे होते हैं, ( ७ ) हँसुलीकी अस्थियाँ दृढ एव उन्नत होती है और ( ८ ) प्रत्येकके दो स्तन होते हैं । पूर्णतया सीधे खड़े

विकासवाद १७५ होकर चलना, मस्तिष्कका बहुत विकास, वाणी-द्वारा स्पष्ट बोलनेकी शक्ति और विचार करनेकी शक्ति यह चार मनुष्यकी विशेषताएँ हैं। पहली दोनों विशेषताएँ तात्त्विक नहीं प्रत्युत परिणामकी हैं अर्थात् छोटाई-बड़ाईका ही अन्तर है। खड़े होकर चलना भी मस्तिष्ककी उन्नतिका परिणाम है। 'वानरोंकी जातियाँ, उपजातियाँ तथा वंश अनेक हैं। लीमर अर्धबंदर है, जो हाथ-पैरसे ही बंदर प्रतीत होता है। मामोंसेट भी आकारमें लीमर-सदृश होता है, पर वह वानरोंसे अधिक मिलता है। इसके नाखून पंजेदार होते हैं। सामान्य बंदर प्रसिद्ध ही है। वनमानुष भी इसी कक्षाका वंश है। इसके पाँच प्रकार हैं—गिवन, ओरांग, औटांग, चिपाजी और गोरिल्ला। इनके दाँत मनुष्यों-जैसे होते हैं। नाक पीछेकी ओर झुकी होती है, पर अंदरकी ओर दो छिद्र नहीं होते। इनके हाथ पैरोंसे अधिक लंबे होते हैं। गालकी थैली और पूँछ बिल्कुल नहीं होती। गिवन जातिकी मादा अपने बच्चेका मुँह धोती है। चिपाजी शरीरसे बहते हुए खूनको बंद करनेकी चेष्टा करता है। वैज्ञानिकोंका कहना है कि चिपाजीकी बुद्धि नौ महीनेके बालकके समान होती है। मनुष्यकी खास विशेषताएँ दो ही

पूरे काम कर रहे हैं, जो कि मनुष्योंसे लुप्त हो रहे हैं, पर किसी-किसीमें मौजूद है । "भौंहें चढ़ाना; माथा सिकोड़ना; होंठ, गाल और नाकको मनमाना नचाना मनुष्यमें अबतक बना हुआ है । अन्न-नलिकाके अन्तमें एक थैली होती है, जो जानवरों- को तो काम देती है, पर मनुष्यके लिये निष्प्रयोजन है । कभी-कभी तो गुठली ( बीया ) आदि कठोर पदार्थ उसमें चले जानेसे वह घातक भी सिद्ध होती है । छठे महीने गर्भके बालकका शरीर बालोंसे छा जाता है, जो वानरका पूर्वरूप है । बंदरके बच्चे माँके पेटसे चिपके हुए रहते हैं, अतः जन्म होते ही बालकके हाथ- की मुट्ठी इतनी मजबूतीसे बँधी होती है कि वह रस्सी पकड़कर लटका रह सकता है । मनुष्यकी रीढ़की अन्तिम गाँठको ही पूँछका चिह्न कहा जाता है । पूँछवाले मनुष्योंमें यह गाँठ आठ-दस इचतक बढ़ी हुई पायी जाती है । यह केवल मास-स्नायुयुक्त होती है, इसमें हड्डी नहीं होती । मनुष्यकी अस्थियाँ पृथिवीकी तीसरी तहमें मिलती हैं । पहले मनुष्यकी ऐसी-ऐसी जातियाँ हो

विकासवाद १७७

अंदर एक दूसरा कोष्ठ तैयार होता है और अलग होनेके पहलेतक दोनो ही कोष्ठ एकट्ठेही रहते हैं। ऐसी स्थितिमें उसे एक कोष्ठधारी क्यों कहा जाता है। इसी तरह कई कोष्ठवाले प्राणीके प्रत्येक कोष्ठ अमीबाकी तरह आठो काम अलग- अलग नहीं करते, भिन्न-भिन्न कोष्ठोंके काम भिन्न-भिन्न हो जाते हैं। ऐसी स्थितिमें यह कैसे कहा जाता है कि ये कोष्ठ भी अमीबाके कोष्ठ-जैसे ही कोष्ठ हैं ? अनेक कोष्ठवाले प्राणियोंमें सम्हाल पाया जाता है और सबको सम्हालनेवाला एक ही कोष्ठ विदित होता है, क्योंकि यदि सभी कोष्ठ प्रबन्ध करने लग जायं तो शरीरमें अव्यवस्था हो जायगी। अतः किसी एक कोष्ठको ही चेतन मानना ठीक है। वेदान्तमतमें तो भौतिक तत्त्वोंसे भिन्न व्यापक आत्मा स्वतन्त्र मान्य है। अन्तःकरणकी उपाधिसे सब व्यवस्था उत्पन्न होती है। विकासवादमें तो कोष्ठाके अंदरका रस ही चैतन्य कहा जाता है, जो सर्वथा असंगत है। अनेक संयुक्त चैतन्योंसे देहकी व्यवस्था उत्पन्न नहीं हो सकती। मनुष्य स्तनधारियोंकी श्रेणीमें भले हों, परन्तु न उनके परस्पर संयोगसे वंश चलता है, न सबकी समान आयु है, न तो समान भोग और न समान गर्भवास ही, यह कहा जा चुका है। ऐसी दशामें मनुष्यका बदरादिके साथ मेल मिलाना उनमें पशुताके संस्कार लाने- के प्रयत्नके सिवा कुछ नहीं। बालोंसे युक्त पैदा होनेवाले मनुष्य भिन्न प्राणियोंके बालोंमें मृत्युतक कोई परिवर्तन नहीं होता। जो गाय जिस रंगकी होती है, आजीवन उसी रंगकी रहती है। यही दशा घोड़ा, गधा, बकरी, भैंस आदिकी है। बंदर और वनमनुष्य भी जिस रंगके पैदा होते हैं, मृत्युपर्यन्त उसी रंगके रहते हैं। परंतु मनुष्यके बालोंके रंग जीवनमें चार बार बदलते हैं—पैदा होनेपर सुनहरे रंगके, यौवनमें काले, वृद्धावस्थामें सफेद और अतिवृद्धतामें वे पिंगल हो जाते हैं। पशुओं और मनुष्योंमें यह भी अन्तर है कि सभी पशु पानीमें पड़ते ही तैरने लगते हैं, बदरकी भी यही हालत है, परंतु मनुष्यको तैरना सीखना पड़ता है। बिना सीखे पानीमें पड़नेपर वह डूबकर मर जाता है। दो पैरपर खड़े होना, स्पष्ट बोलना, विचार करना, हँसना-रोना, गाना आदि मनुष्योंमें ही लक्षित होते हैं, पशुओंमें नहीं। बिना शिक्षाके सब काम कर लेना पशुओमें ही है, मनुष्योंमें नहीं। इससे स्पष्ट है कि वह पशुश्रेणीका प्राणी नहीं है। इसी तरह पशुओं और वनस्पतियोंमें भी अन्तर है। पशु आड़े शरीरके हैं और वृक्ष उलटे शरीरवाले अर्थात् उनका सिर नीचेको रहता है। दूसरा अन्तर यह है कि पशुओंके देखने-सुनने आदिके लिये आँख-कान आदि इन्द्रियाँ होती हैं, वृक्षोंके नहीं। सबमे विरोधी अन्तर खुराकका है। वृक्ष जिस दूषित वायुको खाकर जीते हैं, अन्य प्राणी उसे खाकर मर जाते हैं। वृक्ष प्राणप्रद वायु देते हैं और प्राणनाशक

मा० रा० ६२—

१७८ मार्क्सवाद और रामराज्य वायुका भक्षण करते हैं। अन्य प्राणियोंका क्रम इसके विपरीत है। इसी तरह वनस्पति एव पशुओका कोई भी शरीरसम्बन्धी उत्पादक सम्बन्ध कुछ भी प्रतीत नहीं होता। अतः मनुष्य न तो पशुश्रेणीका है और न वनस्पतिश्रेणीका ही, अतः तीनोका ही कार्य-कारणभाव सर्वथा असंगत है । वानर-कक्षाकी जो आठ विशेषताएँ दिखलायी गयी हैं, वे केवल वानरोकी ही नहीं, उनमें आधीसे अधिक सब प्राणियोंमें पायी जाती हैं। जो दो-चार विशेषताएँ हैं, वे मनुष्यको पृथक् ही सिद्ध करती हैं। गर्भनाल भैसका भी लगा रहता है। अँगूठेके घूमनेसे भी बदर मनुष्यसे भिन्न जातिका सिद्ध होता है। वृक्षोंपर तो चिड़ियाँ और कीड़े भी रहते हैं। दूधके और स्थायी दाँत गाय, भैंस आदिके भी होते हैं। दाँतोकी संख्या अन्य पशुओमें भी अलग- अलग होती है। इसी तरह पाँच अँगलियाँ गिलहरीके भी होती हैं। दो स्तन बकरीके भी होते हैं। इसी तरह मस्तिष्ककी बड़ाई भी मनुष्यता नहीं है। आधुनिक वैज्ञानिक भी चींटीको बहुत बुद्धिमान् मानते हैं, उसकी-जैसी प्रबन्ध-शक्ति अन्यत्र नहीं देखी जाती। इससे 'बड़े या स्पष्ट मस्तिष्कसे ही बुद्धि और विचारोंकी उत्पत्ति होती है' यह नहीं कहा जा सकता । वस्तुतः लीमर, मार्मोसेट आदि प्राणी स्वतन्त्र योनियाँ ही हैं। विकासक्रम दिखलानेके लिये ही उन्हें वानरकोटिमे मान लिया जाता है। इनका परस्पर वंश नहीं चलता, अतः ये वानरजातिके नहीं हैं। वनमानुषोका भी बदरके साथ नाममात्रका ही मेल है, वस्तुतः इनका एक-दूसरेके साथ कुछ भी वास्ता नहीं है । यदि गिबनकी माता अपने बच्चेका मुँह धोती है तो गाय-भैस चाट-चाटकर ही अपने बच्चेको साफ़-सुथरा रखती है। चिड़िया दाना लाकर अपने बच्चोको खिलाती है। यदि चिम्पेञ्जी घाव दबाकर खून बंद करनेकी चेष्टा करता है, तो कुत्ता भी घास खाकर जुलाब लेता और चाटकर घावोको ठीक कर लेता है। हाथी भी अपना इलाज आप कर लेता है। चिम्पेञ्जी नौ महीनेके बालककी बुद्धि रखता है, परंतु चींटी सब संसारका प्रबन्ध करनेकी बुद्धि रखती है। अतः मनुष्य वनमनुष्यकी श्रेणीका भी नही। मस्तिष्कका सिद्धान्त चींटीके दृष्टान्तसे कट जाता है, चींटीको मस्तिष्क होता ही नहीं। यदि चींटीको मस्तिष्क हो तो भी चिम्पेञ्जी आदिकी अपेक्षा तो नगण्य ही होगा। जब चींटी मस्तिष्कके बिना ही सब काम करती है, तब 'मनुष्य चौड़े मस्तिष्कसे ही सब काम करता है' यह नहीं कहा जा सकता। इसी तरह दो पैरपर सीधे खड़े होनेसे आँतकी बीमारी होनेकी कहानी भी व्यर्थ है । यदि खड़े होनेसे वह बीमारी होती, तो करोडो वर्ष पहले भी यह बीमारी होना और फिर इसके डरसे मनुष्य सीधा खड़ा क्यो होता ? वस्तुतः

विकासवाद १७९ यह रोग अधिक भोजनकी लोलुपताके कारण ही होता है। पशु बिना भूखके नहीं खाता। डा० ई० टू कूनेका 'चिकित्साका नूतन विज्ञान' ( न्यू साइन्स ऑफ हीलिंग ) पुस्तकमें कहना है—'आँत उतरनेकी बीमारी पेटके भीतर विकृत द्रव्यके बोझकी खिंचावट है। आमाशयकी झिल्ली उन स्थानोंमें जहाँ जरा भी रुकावट मिल जाती है, अँतड़ियाँ आन्तरिक दबावके कारण छेद कर देती हैं और बाहर निकल आती हैं, भिन्न-भिन्न पुरुषोंकी झिल्ली फटनेके स्थान भिन्न-भिन्न होते हैं, परंतु कारण सदैव एक ही रहता है। अतः इस रोगका कारण चोटखाना, गिर पड़ना, अथवा अन्य कोई बतलाना भूल है। झिल्ली अन्य कारणोंसे भी फट सकती है, परंतु आँत उतरनेका कारण चोट आदि नहीं है। युक्त चिकित्सा रीतिसे विकृत द्रव्यको शरीरसे निकाल देनेपर इस प्रकारके छिद्रोंमें आराम हो जाता है। फिर 'चौपायेसे द्विपाद होनेके कारण आँत उतरनेका रोग होने' की कल्पना सिर्फ बालकपन ही है। वनमनुष्य भी जबतक दो पैरसे खड़ा नहीं हो जाता, तबतक वह द्विपाद नहीं चतुष्पाद ही कहा जायगा। बदरके हाथ कहनेको ही हाथ हैं, वस्तुतः वे पैर ही हैं। बदर पैरसे भी वस्तु पकड़ता है। जगली स्त्री भी पैरसे वस्तु उठा लेती है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वनमानुप बंदरजातिका है। अभ्यास करनेसे तो बाजीगर आँखसे पैसा उठा लेता है और भानुमती पानीके अन्दर मुँह डालकर जीभसे नथमें मोती पिरो देती है। क्या यह सब बंदरोंमें सम्भव है ? अच्छे पहलवान पैरसे दाँव चलाते हैं, सरकसवाले पैरसे कितने ही अद्भुत काम कर लेते हैं। क्या यह सब बदरोंके चिह्न हैं ? उसी तरह अकलदाढकी बात है। जंगली लोगोंमें यह जल्दी निकलती है, इससे भी मनुष्यके बदरसे विकसित होनेकी बात सिद्ध नहीं होती। अङ्गोंका शीघ्र स्फुटित होना खाद्य, पेय, आचार, व्यवहार एवं जलवायुपर निर्भर होता है। जंगली मनुष्योंमें अकलदाढ कच्चे अन्न, कच्चे मास खानेके कारण शीघ्र निकलती है, इसीलिये वह बड़ी भी होती है। किसी-किसीके शरीरपर बालोंकी अधिकता गर्भमें पुरुष-शक्तिकी अधिकताकी द्योतक है। पुरुष-शक्ति अधिक होनेसे कभी-कभी स्त्रियोंके भी दाढी-मूँछ निकल आते हैं। पुरुष-शक्ति कम होनेसे पुरुषोंमें भी दाढी-मूँछ कम होते हैं। रोम, बाल, हड्डी, स्नायु आदि कठिन पदार्थ पितृ-शक्तिका परिणाम है। अतः किसीमें बाल अधिक देखकर बदरोंकी संतान होनेकी कल्पना भी गलत है। बाल होना यदि वानरोंका चिह्न है, तब तो जिन पुरुषोंके दाढी-मूँछ नहीं होती या जिन स्त्रियोंको होती है, वे किसके विकास माने जायेंगे ? क्या ऐसे भी बदर दिखायी देते हैं, जिनकी दाढीपर बाल स्त्रियोंकी भाँति बिल्कुल न हों ! रहा वंश-परम्परागत बालोंका होना, सो वह तो सहज ही सिद्ध है। जब एक बार संतानके बाल निकल आये, तो वे धीरे-धीरे दस पाँच पीढ़ियोंके बाद ही जाते हैं। ऐन्यू लोगोंकी सन्तानोंमें

१८० मार्क्सवाद और रामराज्य अब बाल कम हो रहे हैं । इसलिये बालोंसे मनुष्य वानर-कक्षाका प्राणी सिद्ध नहीं होता । अङ्गोंको न हिला सकना इस बातका सबूत नहीं है कि अब वे अङ्ग निकम्मे हो गये । क्या पीठपरसे मक्खी, मच्छर आदि उड़ानेकी अब आवश्यकता नहीं रही ? यदि कहा जाय कि 'इनको उड़ानेके अब दूसरे साधन हो गये हैं, तो आँख, भौंह आदि हिलानेकी शक्ति क्यो बनी हुई है ? इनकी ताकत तो सबसे पहले ही चली जानी चाहिये, क्योकि हाथका साधन समीपमें है ही । वस्तुतः कर्मोंके अनुसार जिस प्रकारका भोग उपस्थित होता है, ईश्वर उसी प्रकारका शरीर और शक्ति देता है । गाल, भौंह, मस्तक, होठका फड़काना-नचाना यदि बंद हो जाता तो नाटक- नर्तकोंकी भाव-व्यञ्जना कैसे होती तथा दो अपरिचित भाषावालोका परस्पर परिचय और संवाद कैसे सम्पन्न होता ? सूँघकर पहचाननेकी शक्ति तो सभी मनुष्योंमें होती है । फूल-फल, इत्र, घी-तेल आदिके भेद सूँघकर सभी मनुष्य समझ सकते हैं । अभ्यासके कारण विशेषज्ञ इत्र आदिके भेद जितनी जल्दी बतला देते हैं, उतनी जल्दी व्योरेवार हर आदमी नहीं बतला सकता । संगीतज्ञ लोग रागोंके भेद अभ्याससे समझ लेते हैं, अन्य नहीं । जंगली और अनपढ़ लोग स्मृतिसे अधिक काम लेते हैं, इसलिये उनकी स्मरणशक्ति प्रबल होती है, परंतु इसका यह अर्थ नहीं कि यह उनके पूर्वजोंका चिह्न है । राजस्थानमें पदचिह्न पहचाननेवाले लोग होते हैं । वे उससे चोरोंका पता लगा लेते हैं, उनका यह अभ्यास किस पूर्व जातिकी देन है ? रोएँ खड़े करना मनुष्यके आवश्यक नही, क्योकि वह रोमवाला प्राणी नही । हर्ष, भय आदिके समय रोमाञ्च होनेपर रोएँ खड़े होते ही हैं, अतः रोमाञ्च करनेवाली नसोंको कमजोर नहीं कहा जा सकता । टूटा हुआ हाथ यदि कभी भी काम देता है तो उसे टूटा नहीं कहा जा सकता । रोमाञ्चवाली नसें न कमजोर हैं न रोज काम ही देती हैं । हाँ उनपर पुरुषकी स्वाधीनता नहीं है कि जब चाहे तब रोएँ खडे कर दिये जायें । परंतु हृदय आदि यन्त्र भी तो स्वेच्छानुसार नहीं चलाये जाते, फिर भी वे सब अपना-अपना काम करते ही रहते हैं । फिर क्या हृदयको कमजोर कहा जायगा ? इसी तरह रोमाञ्चवाली नसे भी कमजोर नहीं कही जा सकतीं । रोमाञ्च मनुष्यका ही गुण है, अन्य पशुओका नहीं, इसलिये इसकी औरोंसे तुलना नहीं की जा सकती । गलेकी थैली गुठली न खानेकी चेतावनीके लिये है । मनुष्य फल खाता है, उसे गुठली नहीं खानी चाहिये अन्यथा पाचन-शक्ति कमजोर हो जाती है । गर्भमें शरीरपर बाल छा जानेका यह अर्थ नहीं कि मनुष्य पहले बन्दर था । यदि गर्भमें पुराने रूपोंका दिखलाना आवश्यक हो, तो फिर यह भी बतलाना पड़ेगा कि सबसे प्रथम प्राणी अमीबा अपनी उत्पत्तिमे किसका रूप दिखला रहा है । गर्भमें छः महीने बाद बच्चेकी खाल

बाहर आने योग्य होती है। कई बच्चे सात महीनेमें भी उत्पन्न होते हैं और पूर्ण आयुतक जीते हैं। इसलिये उस खालकी जरायुमें भरे गंदे पानीसे रक्षा करनेके लिये ही गर्भमें बालोंका आयोजन होता है, क्योंकि बालोंके कारण बच्चेपर पानीका असर नहीं पड़ता। मनुष्यके बालोंके साथ वानरके बालोंकी तुलना भी नहीं हो सकती, क्योंकि किसी भी बंदरके सिरपर चार फीट लंबे बाल नहीं होते। किस बंदरकी दाढ़ी लंबी होती है। परंतु अनेकों मनुष्योंके सिर एवं दाढ़ीके बाल पर्याप्त लंबे होते हैं। संसारमें मनुष्यके अतिरिक्त किसी प्राणीके ऐसे बाल नहीं होते। 'मनुष्यका बच्चा रस्सी पकड़कर लटक सकता है', इसका भी यह तात्पर्य नहीं कि 'बंदरके बच्चेसे उसने पेटमें चिपके रहना सीखा है, इसलिये मनुष्यके बच्चेमें यह शक्ति है', किंतु पेटमें मुट्ठी बँधी रहनेके अभ्यासके कारण यह शक्ति होती है। पेटमें मुट्ठी इसलिये बँधी होती है कि यदि वह खुली रहे तो यह भय रहता है कि वह पेट- की किसी वस्तुको पकड़ सकती है और पैदा होते समय इसमें कठिनाई पड़ सकती है, अतः ईश्वरके प्रबन्धकी यह दक्षता ही है। मनुष्यकी पूँछ पूँछ नहीं, वह तो बढ़ा हुआ मास ही है, इसीलिये उसमें मास और नसे ही होती हैं, हड्डी नहीं होती। जिस प्रकार अमेरिकाकी आमेजन नदीके किनारे रहनेवाले मनुष्योंके ओष्ठ एक फुट लंबे होते हैं (सरस्वती वर्ष १०, अङ्क ४)। इसी प्रकार मनुष्योंके उस स्थानकी खाल भी बढ़ी होती है। फिर भी जैसे उक्त अमेरिकन, हाथीका विकास नहीं माना जाता, वैसे ही मनुष्योंको भी बंदरका विकास नहीं कहा जा सकता। इसके अतिरिक्त मनुष्यको वनमानुषका विकास कहा जाता है। पर जब वनमानुषको पूँछ नहीं, तब वह मनुष्यको कैसे हो सकती थी। फिर यहाँ तो मनुष्य और वनमानुषके बीचमें एक और नरवानर भी माना जाता है। कई जगह फीलपाँव होता है, कहीं अंडकोष-वृद्धि, कहीं गले और कहीं पेटकी वृद्धि होती है। इसी तरह अफ्रीकामें ओष्ठ मोटा होता है। पर 'यह सब नये अङ्ग फूट रहे हैं', यह नहीं कहा जा सकता। इसी तरह स्थानविशेषकी किंचिन्मांसवृद्धिको पूँछ नहीं कहा जा सकता। जावामें मिली पुरानी खोपड़ी या तो बालककी हो सकती है अथवा फ्रीनालोजीके अनुसार किसी मूर्खकी। उसी तरह मनुष्य, बंदर आदि सभी पञ्चतत्त्वरचित हैं। अतः सबमें जू-लीख, नींद-नशा आदि समान हों, इसमें आश्चर्यकी क्या बात है ? शास्त्र भी कहते हैं कि 'आहार-निद्रा, भय- मैथुनादि मनुष्य-पशु सभीमें समान ही होते हैं। मनुष्यमें धर्मकी ही विशेषता होती है— आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥ (चा०नी०) मनुष्योंके बालोंके रंग बदलने और पशुओंके तैरने आदिकी विशेषताओंके भेद भी पहले बतलाये ही जा चुके हैं। स्त्रियोंके अनेक स्तनोंके आधारपर भी विकासवादी कहते हैं कि 'मनुष्य पहले स्याही, चूही

१८२ मार्क्सवाद और रामराज्य (चुहिया), कुत्ती, गिलहरी, बिल्ली एवं भल्लुकी होकर मनुष्य बना है।' परंतु अमेरिकाके मनुष्य लंबे ओष्ठवाले होनेसे भी हाथीका विकास सिद्ध नहीं होता । अफ्रीकाके 'बुशमैन' अँधेरेमें देखते हैं, शिकार पकड़ते हैं, फिर भी वे गीध, उल्लू, सर्पसे उत्पन्न सिद्ध नहीं होते । यों तो कुछ-न-कुछ लक्षण मनुष्यमें सभी प्राणियोंके पाये जा सकते हैं, इससे क्या यह भी कहा जाय कि 'मनुष्य सभी जातियोंमें होकर आया है ?' ऐसा माननेपर हेकल, हक्सले आदिकी इक्कीस श्रेणीवाली बात भी असत्य ठहरेगी । हिंदू-शास्त्र तो यह मानते हैं कि 'प्राणी चौरासी लाख योनियोंमें भटकनेके बाद ही मनुष्य बना है। इसीलिये वह पैदा होते ही दूध पीनेमें प्रवृत्त होता है । हर्ष, शोक, भयका संचार भी पिछली अनेक योनियोंमें उसके जन्म होनेकी सूचना है । उत्पन्न होते ही बालकमे पूर्वजन्मके सस्कार उपलब्ध होते हैं, तब गर्भमें भी अनेक संस्कारोंका होना उचित ही है । उन संस्कारोंके अनुसार शरीरकी बनावटमें भी कुछ अन्तर पड़ता है । सगर्भा माताके भावविशेषसे प्रभावित होनेपर भी गर्भपर उसका असर पड़ता है । इस तरह गर्भस्थके संस्कार, माताके विचार, व्यवहार, देश, काल, परिस्थितिकी विशेषतासे गर्भस्थ बालकमें भी विचित्रता आ जाती है । विकासवादके विरुद्ध सृष्टिमें कितनी ही बाते हैं, जिनसे विकासका सिद्धान्त खण्डित होता है । नरोंके स्तन, बकरीके गलेके स्तन, घोड़ेमे स्तनोंका अभाव, भेड़े- की सींग, मनुष्यकी छठी अँगुली आदि विकासवादके विशिष्टाविशिष्ट अङ्गोंकी कल्पनाको मिथ्या सिद्ध करते हैं । भैंसा, बैल, बकरा, हाथी, ऊँट, सिंह, कुत्ता, वानर और पुरुषोंके स्तन कब, क्यो और कैसे होते हैं, इनका उत्तर विकासवादमें नहीं है । अमीबामें नर-मादाका भेद नहीं था, आगे चलकर वह कैसे हो गया ? पहलेके प्राणियोंमें स्तन नहीं थे, चमगादड़से स्तन भी उत्पन्न होने लगे । जब पहले बिना स्तनके भी प्राणियोंका पोषण होता ही था, तब फिर स्तनकी क्या आवश्यकता आ पड़ी ? फिर नरोके स्तनोंका क्या प्रयोजन और घोड़ेमें स्तन क्यों नहीं ? मेढोमे सींग परम्परासे नहीं होते । किसीको हो जाते हैं, किसीको नहीं । विकासवादी इनका क्या कारण कहेंगे ? वस्तुतस्तु गर्भस्थके संस्कारों, माता-पिताके विचारो एव व्यवहारोसे ही ये सब विकृत अङ्ग होते हैं । जिस तरह मनुष्योंमें आठ-दस स्तन और पूँछ आदिके चिह्न देखे जाते हैं, उसी तरह पशुओंमें किसी अन्य पशुके चिह्न नहीं दिखायी पड़ते । वानरोंमें न कभी आठ-दस स्तन होते हैं और न एक साथ एकसे अधिक बच्चे ही होते हैं । परंतु मनुष्यके अनेक स्तन एव एक साथ अनेक बच्चे भी पैदा होते हैं, अतः न वानर ही अन्य पशुओंका विकास है और न मनुष्य वानरका ही विकास है । पशुओंको पुराने जन्मकी स्मृति नहीं होती, मनुष्योको पिछली स्मृतियाँ

विकासवाद १८३ होती हैं, इसीलिये मनुष्योंमें ८४ लाख योनियोंमेंसे किसीके सस्कार गर्भमें उद्भूत होनेसे वैसी रचना हो जाती है, पशुओंमें नहीं। यह भी मत है कि पुरुषका वीर्य अनेक कणोंका बना होता है, प्रत्येक कणमें एक-एक बालक उत्पन्न करनेकी शक्ति होती है। प्रायः एक कणहीसे बालक उत्पन्न होता है, अन्य घिसकर नष्ट हो जाते हैं। कभी कभी कई कण रह जानेपर कई बालक उत्पन्न होते हैं। कभी कोई कण दूसरे कणसे जुड़ जानेपर वही कहीं छठी अँगुली, कभी पूँछके समान अङ्ग और कभी अनेक स्तन उत्पन्न कर देते हैं। एक ही भेड़में बकरा और भेडा दोनोंका सयोग होनेसे सींगवाला भेडा पैदा होता है। दैवात् सगर्भा गायसे साँड़‌का सयोग होनेपर पाँच पैर दो पूँछवाला बच्चा पैदा हो जाता है। कभी पाँच पैरोंकी गाय दिखायी देती हैं, उनमें दूसरी गायका पैर काटकर जोड दिया जाता है। विदेशोमें ऐसे जोड-तोड़की पद्धति चलती है। संधियोनियाँ ' इसी तरह संधियोनियोंके आधारपर भी विकाससिद्धिका प्रयत्न किया जाता है। 'जो प्राणी बिल्कुल दो श्रेणियों जैसा आकार रखते हैं, वे संधियोनिके हैं—जैसे चमगादड़, डकबिल, आर्किओप्टेरक्स, ओपोसम और कँगारू। जिनके कुछ अङ्ग निकम्मे हो गये हैं, जैसे ह्वेल, मयूर, शुतुर्मुर्ग और पेग्विन एव जिनके कई अधिक अङ्ग स्फुटित हो गये हैं, जैसे कई स्तनोंकी स्त्रियाँ, पुच्छवाले मनुष्य।' पर सिद्धान्तानुसार इनमेसे किसीसे भी विकासवाद सिद्ध नहीं होता। यह पुनर्जन्मका सिद्धान्त माननेसे ही सिद्ध होता है। उड़नी गिलहरी और चमगादड़, वानर और वनमानुष—इन दोनोंमें एक उन्नत और दूसरा अनुन्नत है। इनमेंसे कोई निम्नश्रेणीसे उच्चश्रेणीमे जा रहा है और कोई उच्चश्रेणीसे निम्नश्रेणीमें उतर रहा है। विकासवादीका कहना है कि 'आदिका प्राणी वनस्पति और रेंगनेवाले प्राणियोंके बीचका था।' परतु यह भी सत्य नही। वस्तुतः पहले वनस्पति हुए, फिर जन्तु। वनस्पति कटकर दो हो जानेपर भी जीवित रहते हैं, पर जन्तु कटनेपर जीवित नही रहते। कहा जाता है कि 'मानेर कृमि और केचुए कटकर भी जीवित रहते हैं।' मानेर तो बहुत सूक्ष्म हैं, उन्हे कृमि कहना भी कठिन है, अतः वे वनस्पति ही हैं। केचुए बडे होते हैं, वे सर्पकी तरह हड्डीवाले नहीं होते। ये वृक्षोंमें लिपटी हुई पीले रगकी नागवेलके ढंगके होते हैं। इनमें और नागवेलमें चैतन्यका बहुत थोड़ा ही अन्तर है। वे भी वृक्षोंपर रेंगकर फैलते हैं। टुकड़े हो जानेपर दोनो ही जीवित रहते हैं। किंतु नागवेल अकुर स्थानसे कटनेपर ही जीवित रहती है, हर जगहसे कटनेपर जीवित

१८४ मार्क्सवाद और रामराज्य (चुहिया), कुत्ती, गिलहरी, बिल्ली एवं भल्लुकी होकर मनुष्य बना है।' परंतु अमेरिकाके मनुष्य लम्बे ओष्ठवाले होनेसे भी हाथीका विकास सिद्ध नहीं होता। अफ्रीकाके 'बुशमैन' अँधेरेमें देखते हैं, शिकार पकड़ते हैं, फिर भी वे गृध्र, उल्लू, सर्पसे उत्पन्न सिद्ध नहीं होते। यों तो कुछ-न-कुछ लक्षण मनुष्यमें सभी प्राणियोंके पाये जा सकते हैं, इससे क्या यह भी कहा जाय कि 'मनुष्य सभी जातियोंमें होकर आया है?' ऐसा माननेपर हेकल, हक्सले आदिकी इक्कीस श्रेणीवाली बात भी असत्य ठहरेगी। हिंदू-शास्त्र तो यह मानते हैं कि 'प्राणी चौरासी लाख योनियोंमें भटकनेके बाद ही मनुष्य बना है। इसीलिये वह पैदा होते ही दूध पीनेमें प्रवृत्त होता है। हर्ष, शोक, भयका संचार भी पिछली अनेक योनियोंमें उसके जन्म होनेकी सूचना है। उत्पन्न होते ही बालकमे पूर्वजन्मके संस्कार उपलब्ध होते हैं, तब गर्भमें भी अनेक संस्कारोंका होना उचित ही है। उन संस्कारोंके अनुसार शरीरकी बनावटमें भी कुछ अन्तर पड़ता है। सगर्भा माताके भावविशेषसे प्रभावित होनेपर भी गर्भपर उसका असर पड़ता है। इस तरह गर्भस्थके संस्कार, माताके विचार, व्यवहार, देश, काल, परिस्थितिकी विशेषतासे गर्भस्थ बालकमें भी विचित्रता आ जाती है। विकासवादके विरुद्ध सृष्टिमें कितनी ही बाते हैं, जिनसे विकासका सिद्धान्त खण्डित होता है। नरोंके स्तन, बकरीके गलेके स्तन, घोड़ेमे स्तनोंका अभाव, भेड़े- की सींग, मनुष्यकी छठी अँगुली आदि विकासवादके विशिष्टाविशिष्ट अङ्गोंकी कल्पनाको मिथ्या सिद्ध करते हैं। भैंसा, बैल, बकरा, हाथी, ऊँट, सिंह, कुत्ता, वानर और पुरुषोंके स्तन कब, क्यो और कैसे होते हैं, इनका उत्तर विकासवादमें नहीं है। अमीबामें नर-मादाका भेद नहीं था, आगे चलकर वह कैसे हो गया ? पहलेके प्राणियोंमें स्तन नहीं थे, चमगादड़से स्तन भी उत्पन्न होने लगे। जब पहले बिना स्तनके भी प्राणियोका पोषण होता ही था, तब फिर स्तनकी क्या आवश्यकता आ पड़ी ? फिर नरोके स्तनोंका क्या प्रयोजन और घोड़ेमें स्तन क्यों नहीं ? मेढोंमें सींग परम्परासे नहीं होते। किसीको हो जाते हैं, किसीको नहीं। विकासवादी इनका क्या कारण कहेंगे ? वस्तुतस्तु गर्भस्थके संस्कारों, माता-पिताके विचारो एव व्यवहारोसे ही ये सब विकृत अङ्ग होते हैं। जिस तरह मनुष्योंमें आठ-दस स्तन और पूँछ आदिके चिह्न देखे जाते हैं, उसी तरह पशुओंमें किमी अन्य पशुके चिह्न नहीं दिखायी पड़ते। वानरोंमें न कभी आठ-दस स्तन होते हैं और न एक साथ एकसे अधिक बच्चे ही होते हैं। परंतु मनुष्यके अनेक स्तन एवं एक साथ अनेक बच्चे भी पैदा होते हैं, अतः न वानर ही अन्य पशुओंका विकास है और न मनुष्य वानरका ही विकास है। पशुओको पुराने जन्मकी स्मृति नहीं होती, मनुष्योंको पिछली स्मृतियाँ

विकासवाद १८३ होती है; इसीलिये मनुष्योंमें ८४ लाख योनियोंमेंसे किसीके सत्कार गर्भमें उद्भूत होनेमे वैसी रचना हो जाती है, पशुओंमें नहीं। यह भी मत है कि पुरुषका वीर्य अनेक कणोंका बना होता है, प्रत्येक कणमें एक-एक बालक उत्पन्न करनेकी शक्ति होती है। प्रायः एक कणहीसे बालक उत्पन्न होता है, अन्य विसकर नष्ट हो जाते हैं। कभी-कभी कई कण रह जानेपर कई बालक उत्पन्न होते हैं। कभी कोई कण दूसरे कणसे जुड़ जानेपर वही कहीं छठी अँगुली, कभी पूँछके समान अङ्ग और कभी अनेक स्तन उत्पन्न कर देते हैं। एक ही भेड़में बकरा और भेड़ा दोनोंका संयोग होनेसे सींगवाला भेड़ा पैदा होता है। दैवात् सगर्भा गायमें माँड़का संयोग होनेपर पाँच पैर दो पूँछवाला बच्चा पैदा हो जाता है। कभी पाँच पैरोंकी गाय दिखायी देती हैं, उनमें दूसरी गायका पैर काटकर जोड़ दिया जाता है। विदेशोंमें ऐसे जोड़-तोड़की पद्धति चलती है। संधियोनियाँ इसी तरह संवियोनियोंके आधारपर भी विकाससिद्धिका प्रयत्न किया जाता है। 'जो प्राणी बिल्कुल दो श्रेणियों जैसा आकार रखते हैं, वे संधियोनिके हैं—जैसे चमगादड़, डकबिल, आर्किओप्टेरक्स, ओपोसम और कँगारू। जिनके कुछ अङ्ग निकम्मे हो गये हैं, जैसे व्हेल, मयूर, शुतुर्मुर्ग और पेग्विन एवं जिनके कई अधिक अङ्ग स्फुटित हो गये हैं, जैसे कई स्तनोंकी स्त्रियाँ, पुच्छवाले मनुष्य।' पर सिद्धान्तानुसार इनमेंसे किसीसे भी विकासवाद सिद्ध नहीं होता। यह पुनर्जन्मका सिद्धान्त माननेमे ही सिद्ध होता है। उड़नी गिलहरी और चमगादड, वानर और वनमानुष—इन दोनोंमें एक उन्नत और दूसरा अनुन्नत है। इनमेंसे कोई निम्नश्रेणीसे उच्चश्रेणीमें जा रहा है और कोई उच्चश्रेणीसे निम्नश्रेणीमें उतर रहा है। विकासवादीका कहना है कि 'आदिका प्राणी वनस्पति और रेंगनेवाले प्राणियोंके बीचका था।' परन्तु यह भी सत्य नहीं। वस्तुतः पहले वनस्पति हुए, फिर जन्तु। वनस्पति कटकर दो हो जानेपर भी जीवित रहते हैं, पर जन्तु कटनेपर जीवित नहीं रहते। कहा जाता है कि 'मानेर कृमि और केचुए कटकर भी जीवित रहते हैं।' मानेर तो बहुत सूक्ष्म हैं, उन्हे कृमि कहना भी कठिन है, अतः वे वनस्पति ही हैं। केचुए बड़े होते हैं, वे सर्पकी तरह हड्डीवाले नहीं होते। ये वृक्षोंमें लिपटी हुई पीले रंगकी नागवेलके ढगके होते हैं। इनमें और नागवेलमें चैतन्यका बहुत थोड़ा ही अन्तर है। वे भी वृक्षोंपर रेंगकर फैलते हैं। टुकड़े हो जानेपर दोनो ही जीवित रहते हैं। किंतु नागवेल अङ्कुर स्थानसे कटनेपर ही जीवित रहती है, हर जगहसे कटनेपर जीवित