मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 189, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूरे काम कर रहे हैं, जो कि मनुष्योंसे लुप्त हो रहे हैं, पर किसी-किसीमें मौजूद है । "भौंहें चढ़ाना; माथा सिकोड़ना; होंठ, गाल और नाकको मनमाना नचाना मनुष्यमें अबतक बना हुआ है । अन्न-नलिकाके अन्तमें एक थैली होती है, जो जानवरों- को तो काम देती है, पर मनुष्यके लिये निष्प्रयोजन है । कभी-कभी तो गुठली ( बीया ) आदि कठोर पदार्थ उसमें चले जानेसे वह घातक भी सिद्ध होती है । छठे महीने गर्भके बालकका शरीर बालोंसे छा जाता है, जो वानरका पूर्वरूप है । बंदरके बच्चे माँके पेटसे चिपके हुए रहते हैं, अतः जन्म होते ही बालकके हाथ- की मुट्ठी इतनी मजबूतीसे बँधी होती है कि वह रस्सी पकड़कर लटका रह सकता है । मनुष्यकी रीढ़की अन्तिम गाँठको ही पूँछका चिह्न कहा जाता है । पूँछवाले मनुष्योंमें यह गाँठ आठ-दस इचतक बढ़ी हुई पायी जाती है । यह केवल मास-स्नायुयुक्त होती है, इसमें हड्डी नहीं होती । मनुष्यकी अस्थियाँ पृथिवीकी तीसरी तहमें मिलती हैं । पहले मनुष्यकी ऐसी-ऐसी जातियाँ हो