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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 193, कुल 866 में से

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पृष्ठ 193

१८० मार्क्सवाद और रामराज्य अब बाल कम हो रहे हैं । इसलिये बालोंसे मनुष्य वानर-कक्षाका प्राणी सिद्ध नहीं होता । अङ्गोंको न हिला सकना इस बातका सबूत नहीं है कि अब वे अङ्ग निकम्मे हो गये । क्या पीठपरसे मक्खी, मच्छर आदि उड़ानेकी अब आवश्यकता नहीं रही ? यदि कहा जाय कि 'इनको उड़ानेके अब दूसरे साधन हो गये हैं, तो आँख, भौंह आदि हिलानेकी शक्ति क्यो बनी हुई है ? इनकी ताकत तो सबसे पहले ही चली जानी चाहिये, क्योकि हाथका साधन समीपमें है ही । वस्तुतः कर्मोंके अनुसार जिस प्रकारका भोग उपस्थित होता है, ईश्वर उसी प्रकारका शरीर और शक्ति देता है । गाल, भौंह, मस्तक, होठका फड़काना-नचाना यदि बंद हो जाता तो नाटक- नर्तकोंकी भाव-व्यञ्जना कैसे होती तथा दो अपरिचित भाषावालोका परस्पर परिचय और संवाद कैसे सम्पन्न होता ? सूँघकर पहचाननेकी शक्ति तो सभी मनुष्योंमें होती है । फूल-फल, इत्र, घी-तेल आदिके भेद सूँघकर सभी मनुष्य समझ सकते हैं । अभ्यासके कारण विशेषज्ञ इत्र आदिके भेद जितनी जल्दी बतला देते हैं, उतनी जल्दी व्योरेवार हर आदमी नहीं बतला सकता । संगीतज्ञ लोग रागोंके भेद अभ्याससे समझ लेते हैं, अन्य नहीं । जंगली और अनपढ़ लोग स्मृतिसे अधिक काम लेते हैं, इसलिये उनकी स्मरणशक्ति प्रबल होती है, परंतु इसका यह अर्थ नहीं कि यह उनके पूर्वजोंका चिह्न है । राजस्थानमें पदचिह्न पहचाननेवाले लोग होते हैं । वे उससे चोरोंका पता लगा लेते हैं, उनका यह अभ्यास किस पूर्व जातिकी देन है ? रोएँ खड़े करना मनुष्यके आवश्यक नही, क्योकि वह रोमवाला प्राणी नही । हर्ष, भय आदिके समय रोमाञ्च होनेपर रोएँ खड़े होते ही हैं, अतः रोमाञ्च करनेवाली नसोंको कमजोर नहीं कहा जा सकता । टूटा हुआ हाथ यदि कभी भी काम देता है तो उसे टूटा नहीं कहा जा सकता । रोमाञ्चवाली नसें न कमजोर हैं न रोज काम ही देती हैं । हाँ उनपर पुरुषकी स्वाधीनता नहीं है कि जब चाहे तब रोएँ खडे कर दिये जायें । परंतु हृदय आदि यन्त्र भी तो स्वेच्छानुसार नहीं चलाये जाते, फिर भी वे सब अपना-अपना काम करते ही रहते हैं । फिर क्या हृदयको कमजोर कहा जायगा ? इसी तरह रोमाञ्चवाली नसे भी कमजोर नहीं कही जा सकतीं । रोमाञ्च मनुष्यका ही गुण है, अन्य पशुओका नहीं, इसलिये इसकी औरोंसे तुलना नहीं की जा सकती । गलेकी थैली गुठली न खानेकी चेतावनीके लिये है । मनुष्य फल खाता है, उसे गुठली नहीं खानी चाहिये अन्यथा पाचन-शक्ति कमजोर हो जाती है । गर्भमें शरीरपर बाल छा जानेका यह अर्थ नहीं कि मनुष्य पहले बन्दर था । यदि गर्भमें पुराने रूपोंका दिखलाना आवश्यक हो, तो फिर यह भी बतलाना पड़ेगा कि सबसे प्रथम प्राणी अमीबा अपनी उत्पत्तिमे किसका रूप दिखला रहा है । गर्भमें छः महीने बाद बच्चेकी खाल

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