मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाहर आने योग्य होती है। कई बच्चे सात महीनेमें भी उत्पन्न होते हैं और पूर्ण आयुतक जीते हैं। इसलिये उस खालकी जरायुमें भरे गंदे पानीसे रक्षा करनेके लिये ही गर्भमें बालोंका आयोजन होता है, क्योंकि बालोंके कारण बच्चेपर पानीका असर नहीं पड़ता। मनुष्यके बालोंके साथ वानरके बालोंकी तुलना भी नहीं हो सकती, क्योंकि किसी भी बंदरके सिरपर चार फीट लंबे बाल नहीं होते। किस बंदरकी दाढ़ी लंबी होती है। परंतु अनेकों मनुष्योंके सिर एवं दाढ़ीके बाल पर्याप्त लंबे होते हैं। संसारमें मनुष्यके अतिरिक्त किसी प्राणीके ऐसे बाल नहीं होते। 'मनुष्यका बच्चा रस्सी पकड़कर लटक सकता है', इसका भी यह तात्पर्य नहीं कि 'बंदरके बच्चेसे उसने पेटमें चिपके रहना सीखा है, इसलिये मनुष्यके बच्चेमें यह शक्ति है', किंतु पेटमें मुट्ठी बँधी रहनेके अभ्यासके कारण यह शक्ति होती है। पेटमें मुट्ठी इसलिये बँधी होती है कि यदि वह खुली रहे तो यह भय रहता है कि वह पेट- की किसी वस्तुको पकड़ सकती है और पैदा होते समय इसमें कठिनाई पड़ सकती है, अतः ईश्वरके प्रबन्धकी यह दक्षता ही है। मनुष्यकी पूँछ पूँछ नहीं, वह तो बढ़ा हुआ मास ही है, इसीलिये उसमें मास और नसे ही होती हैं, हड्डी नहीं होती। जिस प्रकार अमेरिकाकी आमेजन नदीके किनारे रहनेवाले मनुष्योंके ओष्ठ एक फुट लंबे होते हैं (सरस्वती वर्ष १०, अङ्क ४)। इसी प्रकार मनुष्योंके उस स्थानकी खाल भी बढ़ी होती है। फिर भी जैसे उक्त अमेरिकन, हाथीका विकास नहीं माना जाता, वैसे ही मनुष्योंको भी बंदरका विकास नहीं कहा जा सकता। इसके अतिरिक्त मनुष्यको वनमानुषका विकास कहा जाता है। पर जब वनमानुषको पूँछ नहीं, तब वह मनुष्यको कैसे हो सकती थी। फिर यहाँ तो मनुष्य और वनमानुषके बीचमें एक और नरवानर भी माना जाता है। कई जगह फीलपाँव होता है, कहीं अंडकोष-वृद्धि, कहीं गले और कहीं पेटकी वृद्धि होती है। इसी तरह अफ्रीकामें ओष्ठ मोटा होता है। पर 'यह सब नये अङ्ग फूट रहे हैं', यह नहीं कहा जा सकता। इसी तरह स्थानविशेषकी किंचिन्मांसवृद्धिको पूँछ नहीं कहा जा सकता। जावामें मिली पुरानी खोपड़ी या तो बालककी हो सकती है अथवा फ्रीनालोजीके अनुसार किसी मूर्खकी। उसी तरह मनुष्य, बंदर आदि सभी पञ्चतत्त्वरचित हैं। अतः सबमें जू-लीख, नींद-नशा आदि समान हों, इसमें आश्चर्यकी क्या बात है ? शास्त्र भी कहते हैं कि 'आहार-निद्रा, भय- मैथुनादि मनुष्य-पशु सभीमें समान ही होते हैं। मनुष्यमें धर्मकी ही विशेषता होती है— आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥ (चा०नी०) मनुष्योंके बालोंके रंग बदलने और पशुओंके तैरने आदिकी विशेषताओंके भेद भी पहले बतलाये ही जा चुके हैं। स्त्रियोंके अनेक स्तनोंके आधारपर भी विकासवादी कहते हैं कि 'मनुष्य पहले स्याही, चूही