मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविकासवाद १८३ होती है; इसीलिये मनुष्योंमें ८४ लाख योनियोंमेंसे किसीके सत्कार गर्भमें उद्भूत होनेमे वैसी रचना हो जाती है, पशुओंमें नहीं। यह भी मत है कि पुरुषका वीर्य अनेक कणोंका बना होता है, प्रत्येक कणमें एक-एक बालक उत्पन्न करनेकी शक्ति होती है। प्रायः एक कणहीसे बालक उत्पन्न होता है, अन्य विसकर नष्ट हो जाते हैं। कभी-कभी कई कण रह जानेपर कई बालक उत्पन्न होते हैं। कभी कोई कण दूसरे कणसे जुड़ जानेपर वही कहीं छठी अँगुली, कभी पूँछके समान अङ्ग और कभी अनेक स्तन उत्पन्न कर देते हैं। एक ही भेड़में बकरा और भेड़ा दोनोंका संयोग होनेसे सींगवाला भेड़ा पैदा होता है। दैवात् सगर्भा गायमें माँड़का संयोग होनेपर पाँच पैर दो पूँछवाला बच्चा पैदा हो जाता है। कभी पाँच पैरोंकी गाय दिखायी देती हैं, उनमें दूसरी गायका पैर काटकर जोड़ दिया जाता है। विदेशोंमें ऐसे जोड़-तोड़की पद्धति चलती है। संधियोनियाँ इसी तरह संवियोनियोंके आधारपर भी विकाससिद्धिका प्रयत्न किया जाता है। 'जो प्राणी बिल्कुल दो श्रेणियों जैसा आकार रखते हैं, वे संधियोनिके हैं—जैसे चमगादड़, डकबिल, आर्किओप्टेरक्स, ओपोसम और कँगारू। जिनके कुछ अङ्ग निकम्मे हो गये हैं, जैसे व्हेल, मयूर, शुतुर्मुर्ग और पेग्विन एवं जिनके कई अधिक अङ्ग स्फुटित हो गये हैं, जैसे कई स्तनोंकी स्त्रियाँ, पुच्छवाले मनुष्य।' पर सिद्धान्तानुसार इनमेंसे किसीसे भी विकासवाद सिद्ध नहीं होता। यह पुनर्जन्मका सिद्धान्त माननेमे ही सिद्ध होता है। उड़नी गिलहरी और चमगादड, वानर और वनमानुष—इन दोनोंमें एक उन्नत और दूसरा अनुन्नत है। इनमेंसे कोई निम्नश्रेणीसे उच्चश्रेणीमें जा रहा है और कोई उच्चश्रेणीसे निम्नश्रेणीमें उतर रहा है। विकासवादीका कहना है कि 'आदिका प्राणी वनस्पति और रेंगनेवाले प्राणियोंके बीचका था।' परन्तु यह भी सत्य नहीं। वस्तुतः पहले वनस्पति हुए, फिर जन्तु। वनस्पति कटकर दो हो जानेपर भी जीवित रहते हैं, पर जन्तु कटनेपर जीवित नहीं रहते। कहा जाता है कि 'मानेर कृमि और केचुए कटकर भी जीवित रहते हैं।' मानेर तो बहुत सूक्ष्म हैं, उन्हे कृमि कहना भी कठिन है, अतः वे वनस्पति ही हैं। केचुए बड़े होते हैं, वे सर्पकी तरह हड्डीवाले नहीं होते। ये वृक्षोंमें लिपटी हुई पीले रंगकी नागवेलके ढगके होते हैं। इनमें और नागवेलमें चैतन्यका बहुत थोड़ा ही अन्तर है। वे भी वृक्षोंपर रेंगकर फैलते हैं। टुकड़े हो जानेपर दोनो ही जीवित रहते हैं। किंतु नागवेल अङ्कुर स्थानसे कटनेपर ही जीवित रहती है, हर जगहसे कटनेपर जीवित