भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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१८४ मार्क्सवाद और रामराज्य नहीं रहती । यही स्थिति केचुएकी भी है । वह भी जगह-जगहसे कटनेपर जीवित नहीं रहता, खास जोड़परसे कटनेपर ही जीवित रहता है । केंचुएके बीचमे एक स्थानपर छोटे छोटे छिद्र होते हैं । उन्हीं छिद्रोंमें दूसरा प्राणी उत्पन्न करनेका बीज रहता है । इनमें नर मादाका भेद नहीं रहता । वे परस्पर लिपटकर उन्हीं बीज छिद्रोंमे बीजकी बदली और पुष्टि-वृद्धि करते हैं । इनको बीचसे काटनेपर यदि बीज-छिद्र पूँछकी ओर रह गया, तो वह भाग भी जानदार हो जाता है । पर यदि बीज-छिद्र पूँछकी ओर न रहा तो वह जीवित नहीं रहता । जैसे मनुष्यके कटे हुए हाथ-पैर जिंदा नहीं रहते, परंतु सिर एव धडका अश जिंदा रहता है। वैसे ही केचुएके सिरकी ओरका अश स्वतः जीवित रहता है, किंतु पूँछकी ओरका अश कट जानेपर जीवन बीज-छिद्रोके कारण जीवित हो जाता है । केचुओंकी वनस्पतिके साथ अधिक तुलना है । वृक्षोंमें कोई फलोंके द्वारा, कोई डालोके द्वारा और कोई जड़ोके द्वारा वंश-विस्तार करते हैं । गुलाब आदिके डंठलसे वृक्ष बन जाता है, उसीसे केंचुएका मेल मिलता है । जैसे अंकुरहीन गुलाबका डंठल सूख जाता है, वैसे जीवन-बीज-छिद्र-हीन केंचुआ भी सूख जाता है। जैसे मनुष्यों और पशुओके बीचमें बंदर वनमानुष हैं, जैसे—पशुओं और पक्षियोके बीचमे उड़नेवाली गिलहरी और चमगादड़ होते हैं; वैसे ही कीड़ों और वनस्पतियोंके बीचमे नागवेल और केंचुआ है । केंचुआमें कीड़ापन और नागवेलमें वृक्षपन अधिक है । केंचुआ नागबेलसे होकर आया है और कृमि बनने जा रहा है । नागवेल केचुआसे होकर आयी है और वनस्पति बनने जा रही है । इस तरह समस्त संघियोनियां भिन्न-भिन्न योनियोंमें भटकनेके लिये पुलका काम दे रही हैं । इस तरह किसी प्राणीमें दो जातियोका चिह्न देखकर विकास मानना भ्रम ही है । इसी तरह अङ्गोके ह्रासकी कल्पना भी व्यर्थ है । ह्वेलके पैर और मोरके पख अब भी काम दे ही रहे हैं, यह पीछे कहा जा चुका है । अङ्गोके स्फुटित होनेकी बातोसे भी विकास सिद्ध नही होता, यह भी बतलाया जा चुका है । ‘नवलकिशोर प्रेस’ लखनऊसे प्रकाशित, ‘विश्वकी विचित्रता’ नामक पुस्तकमें लिखा है कि 'प्रयागकी प्रदर्शनीमे एक मत्स्य स्त्री आयी थी और एक चुकदरकी जडमें मनुष्यकी सूरत तथा एक दूसरे वृक्षमें मनुष्यके हाथकी शकल देखी गयी ।’ क्या वृक्षो और मछलियोके पूर्व भी मनुष्य था ? वृक्षो और मछलियोके पूर्व तो विकासवादी मनुष्यका विकास नहीं मानते । विकासकी विधि और प्रकारके सम्बन्धमे विकासवादी कहते है कि ‘आदिसे ही भिन्न-भिन्न प्राणियोंके जोड़े उत्पन्न हुए ।’ पर यह युक्ति शून्य है । प्राणियोंकी भिन्नताका कारण परिस्थिति और स्वाभाविक परिवर्त्तन ही है यन्त्र निर्माताके अनुकूल बनता है । अन्तिम अवस्थातक पहुँचनेके पूर्व यन्त्रकी