भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 187

१७४ मार्क्सवाद और रामराज्य इस भेदका क्या कारण है ? गर्भकी विचित्रता, महत्ता भी ईश्वरी कारीगरीका एक नमूना है । एक नगण्य शुक्र-शोणित-बिन्दु क्रमेण वृद्धिगत होकर हस्त, पाद, नेत्र, श्रोत्र, बुद्धियुक्त होकर ज्ञानवान् हो जाय, यह ईश्वरकी अघटित-घटना- पटीयसी मायाशक्तिका वैचित्र्य है । गर्भके विकासवादी इतिहासपर विज्ञान-वेत्ताओ- को भी पूरा विश्वास नही है । हक्सले और हेकलका कहना है कि 'गर्भका इतिहास अति संक्षिप्त एव अधूरा है ।' प्रश्न हो सकता है कि ऐसा क्यों ? यदि गर्भ-इतिहास प्राणियोंके विकास-क्रमकी पाठमाला है तो इसमे गडबड़ी कैसे ? बीचमे गर्भ बेसिलसिले क्यो भासित होने लगे ? मण्डूकसे सर्पणशील होकर पक्षी होना, पर सर्पोंकी हालतका पता नही । बीचमें पुच्छल ताराकी शकल क्यो आ गयीं ? विकासवादी कहते हैं कि 'इस गर्भावस्थाके इतिहासमें जहाँ समानताएँ समाप्त होकर भिन्न-भिन्न मागोंका अवलम्बन करती हुई प्रतीत होती हैं, वहाँ वे स्थान बतलाते हैं कि प्राणियोने परिस्थितिके अनुसार भिन्न-भिन्न मागोंसे चलना आरम्भ किया ।' शायद इसका मतलब यह है कि जहाँसे घास खानेवाले स्तनधारियोके बाद स्तनधारियोमें मास खानेकी प्रवृत्ति हुई, वही प्रक्षेप है । परन्तु यह बहुत भद्दा समाधान है । क्या घास खानेवालेसे एकदम मास खानेवाले हो गये ? क्या गायके बछड़ोमेंसे एक भेड़िया हो गया, क्योकि मछलीसे मेढक होना जितना कठिन है, बछड़ेसे भेड़िया होना उतना कठिन नही । वस्तुतः प्रत्येक जातिके स्वतन्त्र गर्भ होते हैं । इसमे पुरानी पीढ़ियोंके चक्करकी बात सर्वथा व्यर्थ है । इसीलिये 'विकासवाद' पुस्तकमें हारकर लिखा गया है कि 'किसी' भी प्राणीकी गर्भावस्थाका इतिहास पूर्णतया हम नही जानते और न किसीकी गर्भावस्थाके सब परिवर्त्तन देखे ही गये है अथवा न उनका सार्थक कारण पूर्णतया बतलाया जा सकता है ।' विकासवादी कहते है कि 'तुलनात्मक दृष्टि, मनुष्यकी शरीर-रचना, गर्भ- परिवर्त्तन, चट्टानोंमे प्राप्त मनुष्यके अवयव आदिसे प्रतीत होता है कि यन्त्रकी भाँति मनुष्य भी उन्हीं प्राकृतिक नियमोके अधीन रहता है, जिनके अधीन अन्य प्राणी हैं । मनुष्य-देहका भी उन्हीं तत्त्वोंसे निर्माण हुआ है, जिनसे औरोका । स्तनधारी श्रेणीकी बदर कक्षावाली बनमानुष उपजातिमें ही मनुष्यका स्थान है । वानर कक्षाकी विशेषताएँ ये है—( १ ) गर्भनाल झिल्लीसे सम्बन्ध रखता है, ( २ ) हाथों, पैरोके अँगूठे चारो ओर फिर सकते हैं, अतएव वे पैरसे भी पकड़ सकते हैं, ( ३ ) वृक्षोंपर रहते हैं, ( ४ ) इनके दूधके दाँत और स्थिर अन्य दाँत होते हैं, ( ५ ) वानर-कक्षाके भिन्न वंशोंमें दाँतोकी संख्या नियत होती है, ( ६ ) हाथमें पाँच अंगुलियाँ, नाखून और पंजे होते हैं, ( ७ ) हँसुलीकी अस्थियाँ दृढ एव उन्नत होती है और ( ८ ) प्रत्येकके दो स्तन होते हैं । पूर्णतया सीधे खड़े