भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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१७२ मार्क्सवाद और रामराज्य भी बड़ी ही सूक्ष्म कारीगरी होती है। उन्हें भी सादी-रचनावाले नहीं कहा जा सकता । अतएव 'मैन्युअल ऑफ़ जियालॉजी' में मि० निकलसनका कहना है कि 'अमीबा नामक क्षुद्र जन्तु अकल्य, सूक्ष्म कण ही है, परंतु उसकी पाचन-शक्ति क्लिष्ट-से-क्लिष्ट रचनावाले प्राणियोंकी पाचन-क्रियाके यन्त्रोंसे कम नहीं। वह अपने अंदर भोजन लेता है और बिना किसी पृथक् अवयवके उसे पचा जाता है। सबसे बड़ी नात तो यह है कि वह भोजनमेसे पोषकभाग रख लेता है और अनुपयोगी भाग निकाल डालता है।' हक्सलेका भी 'प्राणियोंके वर्गीकरण' की भूमिकामें कहना है कि “ग्रेगारिनीडा-वर्गके जन्तुओसे नीचे दर्जेके अन्य जन्तु नहीं हैं। परंतु 'रीजोपोडा' वर्गके सूक्ष्म जन्तु उनसे भी अधिक सादी रचनाके हैं । सूक्ष्म-वीक्षण-यन्त्रसे देखा गया है कि इनमें शरीर-जैसी कोई गठन नहीं होती । ये तो पतले किये हुए सरेसके एक परमाणु-जैसे ही हैं । परंतु इनमें भी जीवन-शक्तिके समस्त गुण रहते हैं। ये अपने ही-जैसे प्राणीसे उत्पन्न होते हैं, भोजन पचा सकते हैं और हलचल करते हैं। इतना ही नहीं, ये अपने घुसनेकी छींट, जो बिल्कुल क्लिष्ट-रचनायुक्त होती है, बना लेते हैं। जेलीका यह एक कण प्राकृतिक शक्तियोंको इस प्रकार काबूमें करके ऐसी गणितयुक्त रचना (छींट) बना सकता है, यद्यपि स्वयं रचनारहित और अवयवविहीन है । मेरे लिये यह एक असाधारण सारयुक्त वस्तु है।' इन बातोंसे कौन कह सकता है कि अमीबामें क्लिष्ट-रचना नहीं है ? अतः भोग्य और भोक्ता ही क्रमशः सादी और क्लिष्ट रचनावाले हैं । कर्म-ज्ञानहीन वृक्ष भोग्य और ज्ञानहीन कर्मयुक्त पशु भोक्ता है एव च ज्ञान-हीन पशु भोग्य और ज्ञान-कर्म-युक्त मनुष्य भोक्ता है। विकासवादी वनस्पति और पशुओंकी साथ-साथ उत्पत्ति मानते हैं । यदि प्राणियोंकी उत्पत्तिका चक्कर गर्भमें लगता है तो मनुष्य प्राणी गर्भमें सिरके बल उलटा क्यो लटकता है ? विकासवादी नहीं जानते, पर कहा जा सकता है कि वह वृक्षोंका नमूना है। ज्ञान-कर्म-रहित वृक्ष नीचे सिरवाले होते हैं। पैदा होनेके बाद शिशु हाथ-पैरके बलसे तिरछा चलता है. यह कर्म-युक्त ज्ञान-रहित पशु दशा है । ज्ञानका उदय होनेपर वह खड़ा होकर मनुष्य हो जाता है। गर्भका सिर नीचे रहनेका यही कारण है। यही वृक्षोंकी पहले उत्पत्तिका प्रमाण भी है। वस्तुतः गर्भमें पिछली योनियोंके चक्करकी बात गलत है । मुर्गीका इतिहास दिया गया है। मुर्गी पक्षी-जातिका प्राणी है। इसके पूर्व मछली, मेढक और सर्प जातिके प्राणी हो चुके हैं। मुर्गीके गलफडोंने मछलीका रूप दिखलाया और पैर, सिर निकलनेपर मान लिया जाय कि मेढकका रूप दिग्बलाया । परंतु तीसरे सर्पणशीलोका रूप

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