मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९० मार्क्सवाद और रामराज्य प्राणी बालकसे युवा हो रहे हैं और अनेको युवा वृद्ध हो रहे हैं। इसे ही ह्रास-वृद्धि भी कहा जा सकता है । परंतु आस्तिकवादी ऐसा परिवर्तन नहीं मानते कि पृथ्वी धीरे धीरे रेत बन रही है और समुद्र धीरे-धीरे पुच्छल तारा हो रहा है। इसी तरह कबूतर भालू नहीं बन रहा है, घोड़ा, साँप और गधा बिच्छू नहीं बन रहे हैं। जल, वायु, माता-पिता और पूर्व संस्कारोंके कारण जो परस्पर भिन्नता दिखायी पड़ती है, उतना ही परिवर्तन है । यह समझना कि 'आगे चलकर किसी देशके आदमी हरे रंगके हो जायेंगे, किसी देशके ऊँटोके सिरपर सींग निकल आयेंगे, ठीक नहीं है। जो प्रदेश आज समुद्रमें हैं, यद्यपि अभी उनके जलवायुका पता नहीं, यदि वहाँ भूमि निकल आये और उसपर मनुष्य बस जायें, तो लाखो वर्षोंमे वे किस प्रकारके हो जायेंगे, यह कहना भले कठिन हो, पर इतना तो निश्चय है कि जो रूप, रंग और आकार इस समय संसारमें प्रस्तुत है, इन्हींमें थोड़े बहुत हेर-फेरके साथ वहाँ भी रूप रंग और आकार- प्रकार होगा। यह नहीं कहा जा सकता कि अटलांटिक समुद्र सूख जानेपर वहाँके निवासी ८५ हजार वर्षोंमे बैगनी रंगके हो जायेंगे और उनके कान बढकर पैरतक आ जायेंगे, जिनसे कि वे लोग पक्षीके पंखोंका काम ले सकेंगे। परिवर्तनका एक नमूना अमेरिकामें तैयार हो रहा है। यूरोपसे जो लोग अमेरिकामें जाकर बसे हैं, उनका आकार-प्रकार अमेरिकाके मूल निवासी लाल भारतीयों ( रेड इंडियन ) जैसा हो रहा है । अंग्रेजोको इङ्गलैंडसे अमेरिका गये हुए अभी ४०० वर्ष ही हो रहे हैं, परंतु इतने ही थोड़े समयमें इङ्गलैंडवाले रेड इंडियनोंके रूपके होते जा रहे हैं। इससे मालूम पड़ता है कि रेडइंडियनोंका परिवर्तन बंद है अन्यथा अंग्रेज यदि रेडइंडियनोंके समान हो गये तो रेडइंडियन अबतक कुछ और ही तरहके हो गये होते । किंतु वहाँके जलवायुने जितना कुछ परिवर्तन उनमें करना था, उतना लाखों वर्ष पूर्व ही कर डाला । इस बातसे भी विकासवादकी निरन्तर परिवर्तनवाली बात कमजोर हो जाती है। पूर्वोक्त टेराडेलिफगो और अमेरिकाके उदाहरणोंसे यह सिद्ध होता है कि परिवर्तन सीमित ही होता है, निःसीम नहीं । अतः इस मर्यादित परिवर्तनसे डार्विनका अमर्यादित परिवर्तन सिद्ध नहीं होता । दूसरी बात अत्युत्पादनकी है । अत्युत्पादन और उत्पादनमें बहुत अन्तर है । उत्पादन ईश्वरीय एवं प्राकृतिक तथा अत्युत्पादन अस्वाभाविक होता है। ईश्वरीय, शास्त्रीय नियमोंके पालनसे नियमित उत्पादन होता है। अशास्त्रीय, अस्वाभाविक, अनाचारों, पापोंके बढनेपर अत्युत्पादनका क्रम चलता है । जन्म, मरण तथा विविध सुख-दुःखोंका अनुभव पाप-पुण्यादि कर्मोंका ही फल है। जन्म-मरण आदिमें भी दुःख ही होता है, यह अधिकांश पापोंका फल है। तत्त्वज्ञानसे