मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमोक्ष होता है। कर्म एव उपासनाके समुच्चयसे ब्रह्मान्त देवलोकोंकी ओर केवल कर्मकाण्डसे पितृलोककी प्राप्ति होनी है। जो लोग कर्म एव उपासना दोनोंसे ही भ्रष्ट हैं, पाशविक काम, कर्म, ज्ञानमें निरत हैं, उन्हींके लिये कीट-पतगादि योनियोंमें जन्म कहा गया है—'जायस्व म्रियस्व इत्येतत् तृतीयंस्थानम्।' इनमें जन्म-मरणादि कष्ट ही अधिकांश भोगना पड़ता है। इनके जन्ममें पञ्चाग्नि, द्युलोक, पर्जन्य, भूमि, पिता, माता आदि अपेक्षित नहीं होते । कई ढंगके प्राणी वृष्टिसे, कई सड़ी लकड़ियोंसे, कई गोबरसे, कई गीले वालोसे, कई विविध मलोंसे और कई तो मक्षिकाओ- के विष्ठारूप ( एक मक्षिका जो क्षण-क्षणमें विष्ठारूपसे सैकड़ों सूक्ष्म कीड़े उत्पन्न करती है ) उत्पन्न होते हैं। ये सभी कर्मोंके ही फल हैं। मनुष्ययोनिके अतिरिक्त प्रायः अन्य सब भोगयोनियाँ हैं, भले ही हनुमान्, अगद, वालि, सुग्रीव, जाम्बवान्, जटायु, सपाति, गरुड़, अरुण आदि कुछ विशिष्ट जातिके विशिष्ट प्राणी विशिष्ट ज्ञानोपासनादिसम्पन्न हो। इसी तरह राक्षस, दानव और शेष, वासुकि आदि विशिष्ट नागोंमें भले ही विशिष्ट ज्ञान-उपासनादिकी बाते हो, परतु व्यापकरूपसे मनुष्य ही कर्मयोनि है, अन्य सब भोगयोनियाँ हैं। सृष्टिकी विचित्रता कमोंकी विचित्रतासे होती है। इसी आधारपर सर्वज्ञ महर्षियोंको अनुभूत कुछ विचित्र ढग, विशिष्ट परिमाणके भी मनुष्य, पशु, पक्षी, नाग आदिका वर्णन वाल्मीकि-रामायण, महाभारत आदिमें मिलता है। कृत, त्रेतादि युगोंमें सत्त्वगुणकी अधिकता होती है, इसलिये सदाचार, सद्विचार एव नियमित धार्मिक प्रवृत्तिका ही बाहुल्य होता है, अतः प्राणियोंको क्षुद्र जन्तुओंकी योनियोंमें जानेकी नौवत कम ही आती है। द्वापर, कलियुगोमे रजोगुण, तमोगुणके विस्तार, पाप-प्रवृत्तिकी बहुलता आदिसे क्षुद्र जन्तुओंकी बहुतायत होती है। हिंसा, भूख, युद्ध एव प्राकृतिक विप्लवोंसे अकालमृत्यु भी बढती है। अन्तिम लक्ष्य सभीका यही है कि सदाचारी, भक्त, ज्ञानी बनकर, मुक्त होकर भगवत्पदको प्राप्त करना। स्वाभाविक, प्राकृतिक नियमोका उल्लङ्घन करने, जगल काट डालने, विविध प्रकारके कल कारखाने तैयार करने और यथेष्ट चेष्टादिसे सृष्टिमें बहुत उथल-पुथल हुए हैं, मेघ विद्युत् एवं भूगर्भमें इन कारणोसे अनेक अस्वाभाविक परिवर्तन हुए हैं, अतः प्राणियोंमें अल्पायु, अल्पशक्ति आदि अनेक कृत्रिम परिवर्तन हुए हैं। ईश्वरीय, शास्त्रीय प्रवृत्तिके अनुसार मनुष्य बहुत कुछ अनुकूल परिवर्तन कर सकता है। डार्विनके मतानुसार 'जीवन-सग्राममें प्रकृति योग्योका ही चुनाव करती है' यह बात सत्य नहीं है। इंग्लैण्डके मनुष्योंकी ऊँचाईका जो नियम पीछे कहा गया है, तदनुसार अधिक सख्या मध्यमें लबाईवाले मनुष्योंकी ही है, बहुत नाटे और बहुत लवे लोगोंकी सख्या कम ही है। 'योग्योके चुनाव' का सिद्धान्त यदि ठीक हो तो लवे लोगोंकी ही सख्या अधिक होनी चाहिये । अथवा सबसे छोटा और निर्बल