भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

१९२ मार्क्सवाद और रामराज्य जन्तु है, पर उसकी सङ्ख्या सबसे अधिक पायी जाती है। अन्य कीट-पतंगोंकी भी संख्या सर्वाधिक ही है। सबसे योग्य मनुष्योंकी सङ्ख्या तो कीट-पतङ्गादिकी अपेक्षा नगण्य ही है। मनुष्यको बलमे हाथी, सिंह, घोडा, ऊँट आदि पराजित कर देते हैं। दीर्घ जीवनमें साँप और कछुआ मनुष्यसे बढे हुए हैं। बुद्धिमें चींटी; परिश्रम, संचय, प्रबन्ध, कारीगरीमें मधुमक्खी सर्वश्रेष्ठ है। ये सब अपनेसे उत्तरवर्त्तियोंकी अपेक्षा कहीं श्रेष्ठ हैं। 'फिर योग्योंका चुनाव होता है', यह कैसे कहा जा सकता है ? पक्षियोंके पख, चींटियोंकी बुद्धि, कछुओंकी आयु कुछ कम योग्यताकी बात नहीं है। चींटीसे कनखजूरेके विकासमें कौन-सी योग्यता बढ़ी ? उड़ना, दीर्घजीवी होना, बुद्धिमान् होना उत्तरोत्तर महत्त्वकी बाते है। चींटीकी बुद्धि, कछुएकी आयु और पक्षीकी उड़नेकी शक्तिको छोडकर स्तनधारी प्राणियोंमें क्या योग्यता हुई ? मनुष्यमे अवश्य योग्यता है, परंतु अन्य स्तनधारियोंमें पूर्वोक्त जन्तुओसे कोई योग्यता नहीं दिखलायी पड़ती, अतः योग्यताका संततिमें सङ्क्रमणका सिद्धान्त' भी असंगत ही है। संसारमे अयोग्योंकी ही सख्या अधिक है। निर्वल, निर्धन और निर्बुद्धियोंकी बहुतायत स्पष्ट ही है। यदि मनुष्य अपनी संतानोंको योग्य बनानेका यत्न न करे तो संतानोंमें ज्ञानका संक्रमण अपने आप नहीं होता। 'अयोग्योंके मरनेका सिद्धान्त भी ठीक नहीं है। क्या युद्धो, बीमारियोंमें अयोग्य ही मरते हैं ? देखा तो यह जाता है कि संसारमें योग्योंकी अपेक्षा अयोग्यों- की ही संख्या अधिक है। वस्तुतः विकासवादियोंको अबतक भी इस सम्बन्धका कार्य-कारण निश्चित नहीं है। इसलिये उनका कहना है कि 'नयी उपजातियोंकी उत्पत्ति करनेमे परिस्थिति, कार्य या पैतृक-सस्कार, इनमेंसे कौन अधिक कार्यकर है और कौन कम, इसका अबतक पूर्णतया निश्चय नही हुआ।' आस्ट्रेलियाके शशकोमे वृक्षोपर चढ़ने लायक नाखून निकल रहे हैं।' यदि यह सत्य भी हो तो भी इतने मात्रसे वह नयी जाति नहीं है। जैसे मनुष्य होनेपर भी हब्शी, चीनीमें कुछ भेद 'होता है, वैसा ही सामान्य भेद यहाँ भी समझ लेना चाहिये और यदि किसी नये अङ्गविशेषका अकस्मात् नया विकास दिखलायी पड़ता है तो सृष्टिमें उसका भी उदाहरण है ही। जैसे, दीमकोंमें पख लग जाते हैं, किंतु पर लगते ही उड़-उडकर वे प्रायः मर ही जाते हैं। उनकी इस नयी जातिकी पीढ़ी नहीं चलती। कभी देश कालके अनुसार यदि कुछ हेर-फेर होता है तो वह भी शीघ्र ही स्थिर हो जाता है, जैसे कि अमेरिकाके रेड इण्डियनोंका। कृत्रिम चुनाव कृत्रिम चुनावके भी तीन नियम हैं—( १ ) अमुक मर्यादातक कृत्रिम होनेपर संतति होती है, ( २ ) अमुक मर्यादाके बाद अपनी पहली पीढ़ियोंके रूपकी ही हो जानी है और ( ३ ) अमुक मर्यादाके बाद वंश बन्द हो जाता है।