मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
१९२ मार्क्सवाद और रामराज्य जन्तु है, पर उसकी सङ्ख्या सबसे अधिक पायी जाती है। अन्य कीट-पतंगोंकी भी संख्या सर्वाधिक ही है। सबसे योग्य मनुष्योंकी सङ्ख्या तो कीट-पतङ्गादिकी अपेक्षा नगण्य ही है। मनुष्यको बलमे हाथी, सिंह, घोडा, ऊँट आदि पराजित कर देते हैं। दीर्घ जीवनमें साँप और कछुआ मनुष्यसे बढे हुए हैं। बुद्धिमें चींटी; परिश्रम, संचय, प्रबन्ध, कारीगरीमें मधुमक्खी सर्वश्रेष्ठ है। ये सब अपनेसे उत्तरवर्त्तियोंकी अपेक्षा कहीं श्रेष्ठ हैं। 'फिर योग्योंका चुनाव होता है', यह कैसे कहा जा सकता है ? पक्षियोंके पख, चींटियोंकी बुद्धि, कछुओंकी आयु कुछ कम योग्यताकी बात नहीं है। चींटीसे कनखजूरेके विकासमें कौन-सी योग्यता बढ़ी ? उड़ना, दीर्घजीवी होना, बुद्धिमान् होना उत्तरोत्तर महत्त्वकी बाते है। चींटीकी बुद्धि, कछुएकी आयु और पक्षीकी उड़नेकी शक्तिको छोडकर स्तनधारी प्राणियोंमें क्या योग्यता हुई ? मनुष्यमे अवश्य योग्यता है, परंतु अन्य स्तनधारियोंमें पूर्वोक्त जन्तुओसे कोई योग्यता नहीं दिखलायी पड़ती, अतः योग्यताका संततिमें सङ्क्रमणका सिद्धान्त' भी असंगत ही है। संसारमे अयोग्योंकी ही सख्या अधिक है। निर्वल, निर्धन और निर्बुद्धियोंकी बहुतायत स्पष्ट ही है। यदि मनुष्य अपनी संतानोंको योग्य बनानेका यत्न न करे तो संतानोंमें ज्ञानका संक्रमण अपने आप नहीं होता। 'अयोग्योंके मरनेका सिद्धान्त भी ठीक नहीं है। क्या युद्धो, बीमारियोंमें अयोग्य ही मरते हैं ? देखा तो यह जाता है कि संसारमें योग्योंकी अपेक्षा अयोग्यों- की ही संख्या अधिक है। वस्तुतः विकासवादियोंको अबतक भी इस सम्बन्धका कार्य-कारण निश्चित नहीं है। इसलिये उनका कहना है कि 'नयी उपजातियोंकी उत्पत्ति करनेमे परिस्थिति, कार्य या पैतृक-सस्कार, इनमेंसे कौन अधिक कार्यकर है और कौन कम, इसका अबतक पूर्णतया निश्चय नही हुआ।' आस्ट्रेलियाके शशकोमे वृक्षोपर चढ़ने लायक नाखून निकल रहे हैं।' यदि यह सत्य भी हो तो भी इतने मात्रसे वह नयी जाति नहीं है। जैसे मनुष्य होनेपर भी हब्शी, चीनीमें कुछ भेद 'होता है, वैसा ही सामान्य भेद यहाँ भी समझ लेना चाहिये और यदि किसी नये अङ्गविशेषका अकस्मात् नया विकास दिखलायी पड़ता है तो सृष्टिमें उसका भी उदाहरण है ही। जैसे, दीमकोंमें पख लग जाते हैं, किंतु पर लगते ही उड़-उडकर वे प्रायः मर ही जाते हैं। उनकी इस नयी जातिकी पीढ़ी नहीं चलती। कभी देश कालके अनुसार यदि कुछ हेर-फेर होता है तो वह भी शीघ्र ही स्थिर हो जाता है, जैसे कि अमेरिकाके रेड इण्डियनोंका। कृत्रिम चुनाव कृत्रिम चुनावके भी तीन नियम हैं—( १ ) अमुक मर्यादातक कृत्रिम होनेपर संतति होती है, ( २ ) अमुक मर्यादाके बाद अपनी पहली पीढ़ियोंके रूपकी ही हो जानी है और ( ३ ) अमुक मर्यादाके बाद वंश बन्द हो जाता है।
विकासवाद १९३ पहला नियम प्रायः सर्वत्र प्रसिद्ध है। इसीके अनुसार मनुष्य पशुओं एवं वृक्षोंके अच्छे बीज पैदा करते हैं। नीरोग, बलवान् माता-पितासे अच्छी संतति पैदा होती है। इनमें माताका अंश अधिक होनेपर संततिमें माताके अंश अधिक व्यक्त होते हैं और पिताका अधिक होनेसे संततिमें उसके अंश अधिक व्यक्त होते हैं। साँड़का अंश अधिक होनेसे बछड़ेमें सींग आदि बड़े होते हैं और गायका अंश अधिक होनेसे छोटे सींगवाले या मुण्डे बच्चे होते हैं। फिर भी सींगका असर रहता है। इसीसे मुण्डेकी संतानमें भी सींग होते हैं। इसी नियमानुसार काँटेदार नागफनी और सिंघाड़ेसे बिना काँटेवाली नागफनी और सिंघाड़े बना लिये जाते हैं। यहाँ कृत्रिम उपायोंसे पितृ-शक्ति कम कर दी जाती है। इसीलिये कभी-कभी उनसे फिर काँटेदार नागफनी आदि उत्पन्न हो जाते हैं। इन्हीं सिद्धान्तोंसे कबूतरोंकी विचित्रता बनती है। दूसरे नियमका उदाहरण कलमी आम है। कलमी आम बोनेसे दो पीढ़ियों- में वह साधारण आम हो जाता है। भेड़िये-कुत्ते और चीते सिंहके संयोगसे यदि संतान होती है, तो भी कुछ ही पीढ़ियोंके बाद वह कुत्ते और चीतेकी-सी हो जाती है। यही सिद्धान्त सन् १९२२ के 'न्यू एज'में प्रकाशित है। हेनरी डमडसका भी यही मत है। मेन्डलके 'कभी-कभी बच्चोंका पिताकी अपेक्षा पितामहके साथ बहुत मेल दिखलायी पड़ता है', इस कथनका भी यही अभिप्राय है। यदि कोई व्यक्ति अपनेमें कुछ अमर्यादित हेर-फेर कर डाले तो भी उसकी संतानमें वे चिह्न प्रकट नहीं होते, किंतु वह पितामहके गुणोंकी ही होती है। इससे पता लगता है कि प्रकृति पुरानी जातियोंकी ही रक्षा चाहती है। तीसरे नियमके अनुसार बेहिसाब (अमर्यादित) परिवर्तन होते ही वंश रुक जाता है जैसे घोड़े-गधेके संयोगसे खच्चर उत्पन्न होते हैं, परंतु उनका वंश नहीं चलता है। जापानके मुर्गोंका भी वंश बंद हो जाता है। पाँच पैरकी गाय, पेवन्दी बेर आदिका वंश भी बंद हो जाता है। लामार्कने चूहोंकी दुम काटकर बिना दुमके चूहे पैदा करना चाहा था। अनेकों पीढ़ियोंतक वह प्रयत्न करता रहा, परंतु बिना पूँछके चूहे नहीं हुए। लेसिस्टर शायरके कुछ भेड़ चरानेवाले अपनी कुछ भेड़ोंको घोड़ेके बराबर और कुछ भेड़ोंको चूहोंके बराबर बनाना चाहते थे, परंतु दोनों प्रयत्न विफल हुए, उनका घटना-बढ़ना सीमित ही रहा। प्राकृतिक चुनावके नमूने तो प्रायः सभी हैं, सामान्य भेद इन सबमें होता है। समान जातिमें समान उमरकी स्त्रियों, पुरुषों तथा पशुओं आदि सबमें भेद पहचाना जाता है। भेदके बिना तो पहचान और व्यवहार ही नहीं चल सकता। विकासवादी कहते हैं कि 'हममें और आपमे जो भेद है, यही आगे चलकर गिलहरीको रीछ बना देता है।' परंतु यह असत्य है। सामान्य भेद तो व्यवहारमें अत्यन्त मा० रा० १३-
६९४ मार्क्सवाद और रामराज्य उपयोगी और ईश्वरदत्त ही है। हिंदू लाखों वर्षोंसे कान छिदवाते हैं; मुसलमान सैकड़ों वर्षोंसे खतना कराते हैं; चीनकी स्त्रियाँ हजारों वर्षोंसे अपने पैर छोटे बनानेका प्रयत्न करती हैं; परंतु उनसे वैसी संताने कभी नहीं हुईं। अतः कहना होगा कि कृत्रिम विकास अमर्यादित नहीं होता। विलायतकी विधवाओसे गायोंकी वृद्धिसे भी नवीन जातिकी उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती। डार्विनका सिद्धान्त है कि 'माता-पिताके प्रत्येक अङ्गसे सार एकत्रित होकर संततिका जन्म होता है।' वाइजमैनका कहना है कि 'इस सारके एकत्रित होनेमें यदि बीचमें कोई परिवर्त्तन उद्भूत हो तो वह संततिमें संक्रमित न होगा।' मेण्डलका मत है कि 'कभी लड़का पिताकी अपेक्षा पितामहके गुणका संग्रह करता है।' हाइजकी राय है कि 'कभी कभी नयी नयी जातियाँ अकस्मात् उत्पन्न हो जाती हैं।' ये सिद्धान्त तथा हेतुवाद और अज्ञात-ज्ञेय आदि सिद्धान्त मिलकर विकासके विरुद्ध ही ठहरते हैं। इनमेंसे पहली बात 'अङ्गादङ्गात्सम्भवसि' इत्यादि वेदोंकी ही है। पुत्रमें कोई नया परिवर्तन नहीं आता। ऐसे स्थलमें पुत्र पितामहके ही गुणोंको ग्रहण करता है। इससे जातिकी स्थिरता ही सिद्ध होती है। नवीन जलकृमियोंकी उत्पत्ति भी किसी शरीर बननेके लिये विकास आवश्यक नहीं। हेतुवाद और अज्ञात ज्ञेयशक्तिसे तो यही निश्चय किया जा सकता है कि ईश्वर ही कर्मानुसार प्राणियोंकी रचना करता है, क्रम-विकास आवश्यक नहीं है। 'विकासवाद' पुस्तकमें भी लिखा है कि 'प्राणियोंकी उत्पत्ति विकासद्वारा हुई या नहीं, एक प्रकारके प्राणीसे भिन्न-भिन्न प्रकारके प्राणी बनते हैं या नहीं, इस प्रकार निरीक्षण करनेवाला मनुष्य भी विकास-क्रियाके किसी अत्यन्त सूक्ष्म भागको भी प्रत्यक्ष होते हुए पूर्णतया नहीं देख सकता। कई प्रश्नोंके सम्पूर्ण उत्तर प्राप्त करनेकी आशा भी नहीं करनी चाहिये।' अतः विकासवाद एक कल्पना ही है, सिद्धान्त नहीं। 'समाजमें निर्बलोंको जीनेका हक नहीं है', यह कल्पना कितनी भीषण है। मनुष्य और रीछ अथवा भैंसकी तुलना करे तो यह स्पष्ट ही है कि शरीर, बलमें रीछ और भैंस दोनों अधिक ठहरेंगे। मनुष्य इनसे शरीर, बलमें अवश्य हार जायगा। तथापि मनुष्य बुद्धिके कारण अधिक बलवान् सिद्ध होता है। मनुष्योंमें भी अधिक बुद्धिमान् ही प्रबल ठहरता है। नीतिबल, बुद्धि और शरीर-बलसे भी अधिक महत्त्वका है। सोडम और गमोरा निवासी अनीतिके कारण ही नष्ट हो गये। नीतिमान्, शान्त, निर्व्यसन अधिक दीर्घजीवी होते हैं। जो जाति परमार्थ-बुद्धिकी अपेक्षा अधिक स्वार्थ-बुद्धि रखती है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाती है। जानवरोंमें भी परमार्थ-बुद्धि पायी जाती है। शेर, व्याघ्र-जैसे खूँखार प्राणी भी अपने बच्चोंको दूध पिलाते हैं, प्यार करते हैं। मनुष्यका स्वार्थ- त्यागी होना ही महत्त्व है। अतः 'जीवन-संग्राममें बलवानोंकी ही विजय होती
है, यह कहना सत्य नहीं। कई लोग पुराणोंकी चौरासी लक्ष योनियोंके वर्णन और मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह आदि अवतारोंके द्वारा भी विकासवाद सिद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं। इसी तरह कई लोग कुछ वेद-मन्त्रोंको भी विकास-सिद्धिके लिये उद्धृत करते हैं, परन्तु वेदों और पुराणोंसे डार्विनका विकास कथमपि सिद्ध नहीं हो सकता। पुराणोंके अनुसार एक प्राणीसे दूसरे प्राणीका विकास सिद्ध नहीं होता। किंतु सभी योनियाँ स्वतन्त्र मानी गयी हैं। अवतारोंमें भी मत्स्य- कच्छपादि स्वतन्त्र अवतार हैं। 'मत्स्यसे कच्छपका विकास हुआ है' यह पुराणोंसे नहीं सिद्ध होता। 'क्रिश्चियन हेरल्ड' में छपे अनुसार 'ब्रिटिश साइन्स सोसाइटी' के आस्ट्रेलिया अधिवेशनमें सभापति-पदसे प्रो० विलियम बेटसनने कहा था कि 'डार्विनका विकासवाद बिल्कुल असत्य और विज्ञानके विरुद्ध है।' अमेरिकाकी कई रियासतोंने स्कूलोंमें डार्विन सिद्धान्तकी शिक्षाको कानूनके विरुद्ध ठहराया। वहाँके एक जजने अपने एक फैसलेमें लिखा था कि 'ऊँचे दरजेके विद्वान् अब विकासवादपर विश्वास नहीं करते।' प्रो० पेट्रिक गेडिसका कहना है कि 'मनुष्यके विकासके प्रमाण संदिग्ध हैं। साइन्समें उनके लिये कोई स्थान नहीं।' सर जे० डब्लयू० डासनका कहना है कि 'विज्ञानको बंदर और मनुष्यके बीचकी आकृतिका कुछ भी पता नहीं है। मनुष्यकी प्राचीनतम अस्थियाँ भी वर्तमान-जैसी ही हैं।' प्रसिद्ध विद्वान् वुड जोन्सका कहना है कि 'डार्विनसे गलती हुई है। मनुष्य बंदरसे उत्पन्न नहीं हुआ, किंतु बंदर मनुष्यसे उत्पन्न हुए हैं।' सिडनी कालेटका कहना है कि 'साइन्स स्पष्ट साक्षी है कि मनुष्य अवनत दशासे उन्नत दशाकी ओर चलनेके स्थानमें उलटा अवनतिकी ओर जा रहा है। उसकी आरम्भिक दशा उत्तम थी।' प्रागुत्तर अश्मकालकी एक खोपड़ी मिली है। यह खोपड़ी जिस सिरकी है, वह यूरोपमें सबसे बड़ा समझा जाता है। यह खोपड़ी एक सौ चौदह क्यूबिक (घन) इंच है। यूरोपमें छोटे-से-छोटे सिर ५० क्यूबिक इंच और बड़े से-बड़ा ७५ क्यूबिक इंचका पाया गया है। इससे स्पष्ट है कि वर्तमान यूरोपनिवासियोकी दिमागी ताकत बढ़ नहीं रही है। सन् १८८३ में एक सिर हालैडमें निकला, जो यूरोपनिवासियोंके औसत घेरेसे बड़ा है। इसका घेरा १५० क्यूबिक इंच है। भूगर्भ-शास्त्रियों और पुरातत्त्वज्ञोंने 'हार्लींग सेक्सान' को २५ हजार वर्ष पुराना बतलाया है। इसका घेरा भी १५० क्यूबिक इंच है। इन सब बातोंसे सिद्ध होता है कि प्राचीन मनुष्योंका विकासहीन मस्तिष्क बंदरोंसे नहीं हुआ, किंतु वे परमात्माकी विशिष्ट रचना थे। आजके उत्तम-से उत्तम मनुष्योंकी अपेक्षा वे अधिक उन्नत थे। विकासवादी शंका करते हैं कि 'यदि क्रमोन्नतिका सिद्धान्त न माना जाय तो फिर दीर्घकाय प्राणियोंकी उत्पत्ति कैसे सम्भव हो सकती है? इतना बड़ा मनुष्य एकाएक आदि कालमें कैसे पैदा हो गया?' परन्तु वे एक कोष्ठके
१९६ मार्क्सवाद और रामराज्य अमीबाकी एकाएक उत्पत्ति मान लेते हैं; परंतु अनेक कोष्ठसंयुक्त मनुष्य-प्राणीका आप-से-आप उत्पन्न होना नहीं मानते। परंतु बात सरल है, जिस महाशक्तिके प्रभावसे एक कोष्ठवाला अमीबा उत्पन्न हो सकता है, उस शक्तिको अनेक कोष्ठवाले मनुष्यके उत्पादनमें क्या कठिनाई है ? जो बड़े-बड़े सूर्य, चन्द्र और छोटे-छोटे अमीबाको बना सकती है, वही शक्ति गाय, बैल, हाथी, बंदर, मनुष्य सबको बना सकती है। आरम्भिक सृष्टिको नये-पुराने सभी विद्वान् 'अमैथुनी सृष्टि' नामसे कहते हैं। प्रो० मैक्समूलर लिखता है—'कहा जाता है कि आदिमें एक ही मनुष्य नहीं था, किंतु हम हर प्रकारसे यह ख्याल कर सकते हैं कि आदिमे कुछ पुरुष और स्त्रियाँ उत्पन्न हुई थीं।' मद्रास हाईकोर्टके जज टी० एल० स्ट्रेन्ज अपनी 'दि डेव्हलप्मेंट ऑफ क्रियेशन् ऑन दी अर्थ ( पृथ्वीपर सृष्टिका विकास )' पुस्तकमें लिखते हैं कि 'आदि सृष्टि अमैथुनी होती है। इस अमैथुनी सृष्टिमें उत्तम और सुडौल शरीर बनते हैं।' 'वैशेषिक दर्शन' का भी कहना है कि 'शरीर दो प्रकारका होता है— योनिज और अयोनिज'—'तत्र शरीरं द्विविधं योनिजमयोनिजं च।' इसपर 'प्रशस्तपादीय भाष्य' है। 'तत्रायोनिजमनपेक्षितशुक्रशोणितं देवर्षीणां शरीरं धर्मविशेषसहिते- भ्योऽणुभ्यो जायते।' अर्थात् देवता और ऋषियोंके शरीर शुक्र-शोणितके बिना ही धर्मविशेष- सहित अणुओंसे उत्पन्न होते हैं। इन सब बातोंसे सिद्ध होता है कि विकासवाद अत्यन्त भ्रान्तिपूर्ण वाद है। मनुष्य-जाति 'मनुष्य-जातिका विकास वनमनुष्योंसे हुआ है,' 'जावाद्वीपके कलिंग नामक मनुष्य अधिकतर वनमनुष्योंसे मिलते हैं, अतः वे ही मनुष्य-जातिके पूर्वपितामह हैं', यह सब कथन भ्रान्तिपूर्ण हैं। अतएव जो कहा जाता है कि 'यही मनुष्य- समुदायकी समस्त शाखाओंका जन्मदाता है' यह सब भी भ्रान्तिपूर्ण है, क्योंकि जब विकासवादका सिद्धान्त ही खण्डित हो गया, तब उसके आधारपर शास्त्र- विरुद्ध कोई कल्पना निराधार ही है। आजकलका सिद्धान्त है कि मनुष्य-जाति- के चार विभाग हैं, उसीके भीतर हजारों विभाग आ जाते हैं—( १ ) श्वेत रंग, लम्बी आकृतिवाला काकेशस, ( २ ) पीले रंग, चौड़ी आकृतिवाला मंगोलिक, ( ३ ) काले रंग, मोटी आकृतिवाला ईथियोपिक ( निग्रो ) और ( ४ ) लाल रंग और पतली आकृतिवाला रेडइण्डियन। आधुनिक वैज्ञानिकोंका कहना है कि मनुष्य-जातिके चारों विभागोंमें काकेशस विभाग सर्वश्रेष्ठ है। इस विभागके लोग गौरांग हैं। इसी विभागसे सब रंगवालोंकी उत्पत्ति हुई है ! विद्वानोंकी
खोज है कि हेमाइट लोग काकेशस वंशके हैं और सफेदसे भूरे और काले रगके हो गये हैं । उनके बाल सीधे और नीग्रो जातिके-से घुँघराले होते हैं । "हेमिटिक शाखाके लोग मिस्रमें रहते हैं । विद्वानोंने यह भी स्वीकार किया है कि अमेरिकाके लाल रंगवाले मूल निवासियोका मिलान मिस्रनिवासी हेमिटिकोंसे ही होता है । इन्हीकी एक हिमेगाडत जाति लाल मनुष्य भी कहलाती है । यह जाति जिस समुद्रके किनारे रहती है, उसे भी लाल सागर कहा जाता है । श्वेतांग यूरोपियन भी अपनेको काकेशिक विभागके ही कहते हैं । इस तरह लाल, पीले, काले और सफेद रंगके चारो समुदाय काकेशिक विभागसे ही उत्पन्न हुए देखे जाते हैं । दूसरी खोज यह है कि संसारके जितने मनुष्य हैं, सब हेमिटिक और सेमिटिक शाखाओंमें अन्तर्भूत हो जाते हैं । मिस्रनिवासी हेमिटिक हैं । इनके यहाँ मुदोंमें मसाला भरकर रखनेका रिवाज था । मिस्रके पिरामिड इन्हीं मुदोंको रखनेके लिये बनाये जाते थे । अब पता चलता है कि अमेरिकाके लाल रंगवाले मूल- निवासियोंमें भी यही रिवाज था । अन्वेषकोंको यहाँ भी पिरामिड मिले हैं । इससे इन दोनोंकी एकता ही प्रतीत होती है । "काकेशस विभागकी दूसरी शाखा सेमिटिक है । इसमें अरब, बेबिलोन, सीरिया और जुडियाके यहूदी आदि सम्मिलित हैं । इसीकी एक शाखा अब हिट्टाइट है, जो पहले कभी मेसोपोटामियोंमें रहा करती थी । मेसोपोटामियोंमें अन्वेषकोंको ३४ सौ वर्षकी ईंटे मिली हैं, जिनमें इनके सुलहनामे लिखे हुए हैं । इन्ही लोगोंका एक दल भारतवर्षमें रहता है, जिसे 'द्रविड़' कहते हैं । भारतके द्रविड़ोंकी भाषा मंगोलिक और निग्रो विभागोंको जोड़ती है । भाषा ही : नहीं, उनका रूप, रग और शारीरिक गठन भी एक ही है । विद्वानोंने पता लगाया है कि भारतके द्रविड़ोंकी भाषा आस्ट्रेलियाकी भाषाकी भाँति है और वह भाषा मंगोलिक विभागसे भी मिलती है । आस्ट्रेलियानिवासी शुद्ध निग्रो जातिके हैं, जो द्रविड़ जातिसे भी सम्बन्ध रखते हैं । इसी तरह मगालिक-विभागसे भी द्रविड़ लोग सम्बन्ध रखते हैं । इन सब बातोसे द्रविड़ जाति निग्रो और मंगोलिक विभागोको जोड़कर अपना मूल स्रोत सेमिटिक शाखासे स्थापित करती है । इसी तरह हेमिटिक शाखा अमेरिकाके मूल निवासियोंको जोड़ती है । इस तरह काकेशिक विभागके हेमिटिक और सेमिटिक शाखाओसे ही मंगोलियन्, अमेरिकन और निग्रो विभागोका सम्बन्ध सूचित होता है । इस तरह ससारके काले, पीले, लाल और सफेद रगवाले चारो विभाग काकेशिक विभागकी हेमिटिक और सेमिटिक शाखाओसे ही उत्पन्न हुए हैं ।" वस्तुतः नूहका तूफान, वैवस्वत मनुकी मछलीवाली कथाका अनुवाद है । नूहके पुत्र हेमकी संतति, जो मिस्रमें रहती है, अपना सम्बन्ध राजा मनुसे बतलात
१९८ मार्क्सवाद और रामराज्य है और अपनेको सूर्यवंशी कहती है और मनु वैवस्वतके मूल विवस्वान् सूर्यको अपना इष्ट समझती है । इन मिस्रवालोंकी ही संतति अमेरिकाके मूल निवासी बतलाये जाते हैं । वे भी सूर्यवंशी राजा रामचन्द्रका 'राम-सीतव' उत्सव मनाते हैं । अन्वेषकोंको वहाँ सूर्यका मन्दिर भी मिला है । मनुकी मछली एव नूहके प्लावनकी कथा मिस्र, बेबिलोन, सीरिया, चाल्डिया, जूडिया, फारस, अरब, ग्रीस, भारत, चीन, अमेरिका आदि संसारके सभी देशों एव सभी जातियोंमें पायी जाती है । इससे भी सिद्ध होता है कि मनुसे ही समस्त मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है। बाइबिलमें बतलायी हुई नूहकी पीढ़ियाँ काल्पनिक हैं। आदमसे नूहतक ११ पीढ़ियाँ होती हैं और वर्ष-संख्या २२६२ है। नूहके पुत्र सेमसे इब्राहीमतक ११ पीढ़ियोंके तेरह सौ दस वर्ष कहे गये हैं । यह गणना विश्वास योग्य नहीं । जब मनु और नूह एक ही हैं तब उन्हें हुए लाखो वर्ष हो गये । कहा जाता है कि मिस्रकी भाषामें 'नून' शब्दका 'मछली' अर्थ होता है । 'नून' अक्षर फिनीशियामें 'ईल' नामक मछलीकी शकलका होता है । अंग्रेजी तथा अरबीमें भी यह अक्षर मछलीकी तरह ही होता है । मछलीके ही ढगकी नाव होती है। हजरत नूहको 'नौवा' भी कहा जाता था । इस नौवाका सम्बन्ध मनुके जलप्लावनसे ही है । यह नाव और मनुकी मछली एक ही है । मनुको वैवस्वत कहा जाता है । विवस्वान् सूर्य है । हजरत नूहके दो पुत्र हेम, सेम—सूर्यवंश और चन्द्रवंश ही हैं । हेमगर्भ, हिरण्यगर्भ, सूर्यवंशका ही बोधक है और सेम=सोम चन्द्रवंशका बोधक है । सूर्यवंशियोंकी पुत्री इलासे ही सोमवशकी उत्पत्ति हुई है । इस दृष्टिसे दोनों मनुके पुत्र कहे जा सकते हैं । मनुस्मृतिके अनुसार क्षत्रियोंसे ही संसारके मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है— शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥ पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविडाः काम्बोजा यवनाः शकाः । पारदाः पह्लवाश्चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥ ( मनुस्मृति १० । ४३-४४ ) इतिहासकार मैनिंग कहता है कि "यह बात विद्वानोंने मान ली है कि 'मनुष्य जातिके पूर्वपितामह 'मनु' या 'मनम्' उसी तरह हैं जिस तरह जर्मनोंके 'मनस्' हैं, जो ट्यूटनोंके मूल पुरुष माने जाते हैं । अंग्रेजीका 'मैन' तथा जर्मनका 'मन्न' शब्द 'मनु' से उसी तरह मिलता है, जैसे जर्मनका 'मेनष्' और संस्कृतका 'मनुष्य' शब्द मिलता है । अतः मनुसे ही मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है।" वह मनु मूल पुरुष हिरण्यगर्भसे अभिन्न समझा जाता है और उसी
विकासवाद १९९ हिरण्यगर्भके मुख, बाहु, ऊरु एवं पादसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रकी उत्पत्ति हुई— एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् । इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ( मनु० श्लो० १२ । १२३ ) ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽजायत ॥ ( ऋग्वेद, १० । ९० । १२; यजु० ३१ । ११ ) मानवसृष्टिका मूलस्थान 'इसी तरह जब समस्त मनुष्य बंदरोंसे उत्पन्न हुए हैं, तब जहाँ-जहाँ बंदरोंका निवास है वहीं मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई और जब मनुष्योंकी उत्पत्ति वनमानुषोंसे हुई, तब वनमानुष जहाँ-जहाँ मिलते हैं वहाँ मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई । वनमानुष अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, मेडागास्कर, जावा आदिमें होते हैं । वहाँका निग्रोदल सभ्यतामें अबतक भी मनुष्य-समुदायसे पीछे है । उनमें कई जातियाँ और दल ऐसे हैं जो वनमानुषोंसे कुछ थोड़े उन्नत हैं।' वैसे विकासवादके खण्डनसे सब मत खण्डित हो ही जाते हैं । इसके अति- रिक्त एक ही स्थानमें सृष्टि होनेपर भी देश, काल, सम्पर्कसे उनमें भेद प्रतीत होने लगता है । बीजके बिना कोई भी पौधा तैयार नहीं हो सकता । समुद्रके टापुओंमें भी जबतक बीज नहीं पहुँचता, मिट्टीमें रस नहीं आता तबतक किसी तरहके पौधे उत्पन्न नहीं होते । कोई भी माली बीजोंसे पौधोंको ऐसी ही जगह तैयार करता है, जहाँ उसकी सुरक्षाके योग्य स्थान हो । आँधी, तूफान, जलप्लावन, अग्नि, भूकम्प आदिका उपद्रव जहाँ न रहा होगा, वहीं ईश्वरने मनुष्यादि सभी प्राणियोंको उत्पन्न किया होगा । कई लोग कहते हैं कि 'अमेरिकामें बंदर नहीं थे, अतः वहाँ मनुष्योंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती थी।' पहले यूरोपका भी जलवायु मनुष्यकी उत्पत्तिके अनुकूल नहीं था । विद्वान् अन्वेषकोंका कहना है कि 'स्तनधारी प्राणी एशियासे ही यूरोपमें आया है।' वार्न साहब तथा उनकी पुस्तकसे प्रभावित होकर लोकमान्य तिलकने उत्तरीध्रुवमें ही प्राणियोंकी सृष्टि मानी है । किंतु विद्वानोंका मत है कि 'उत्तरी ध्रुवमें प्रति साढ़े दस हजार वर्षमें भीषण हिमपात होता रहा है, अतः वहाँ सृष्टिका होना सर्वथा असम्भव है।' इंगलैंडके डा० एलेन्मनका कहना है कि 'मनुष्यकी खालपर ध्रुव-प्रदेशनिवासी पशुओंके समान लम्बे बाल नहीं हैं, इसलिये मनुष्य वहाँका प्राणी नहीं है । मनुष्यके शरीरपर पसीना निकलनेके लिये छोटे-छोटे रोम-छिद्र होते हैं, अतः यह अतिशीत प्रदेशका प्राणी नहीं है।' भूगोल- विशेषज्ञोंका यह भी कहना है कि 'उत्तरी ध्रुवमें वनस्पतियाँ नहीं होतीं, वहाँ मनुष्योंका
जी सकना ही मुश्किल था।' अनेक विद्वान् एशियामें भी मनुष्योंकी उत्पत्ति मानते हैं। उनका कहना है कि 'पश्चिमोत्तर एशियामें ही मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई, वहाँ से भिन्न भिन्न श्रेणीके रूपमें लोग विभिन्न देशोंमें गये हैं।' मैक्समूलरने मध्य एशियामें और स्वामी दयानन्दजीने तिब्बतमें मनुष्योंकी उत्पत्ति मानी है। उमेशचन्द्र दत्तके मतानुसार मंगोलियामें मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है। अन्यान्य विद्वान् विभिन्न स्थान मानते हैं। संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, जेन्द आदि भाषाओंकी तुलना करनेपर भी अधिकांश विद्वान् इस निष्कर्षपर पहुँचे हैं कि इन भाषाओंके भाषी लोग कभी एक भाषा- भाषी रहे होंगे। जैसे-जैसे वे एक दूसरेसे दूर होते गये, वैसे-वैसे उनकी भाषामें कुछ भेद पडता गया। यद्यपि वे लोग इन भाषाओंको परस्पर भगिनी ही मानते हैं। उनकी जननी कोई अन्य भाषा रही होगी—ऐसी कल्पना करते हैं, तथापि संस्कृत भाषा ही सब भाषाओंकी जननी है—यह अधिक प्रमाणसिद्ध है। आज भी संसारमें सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद माना जाता है। मोहेनजोदड़ो, हड़प्पाकी खुदाईसे मिलनेवाली वस्तुओंसे भी वैदिक सभ्यताकी अतिप्राचीनता विदित होती है। 'वाचा विरूपनित्यया'—विरूप नित्य वेद लक्षण वाणीद्वारा आप सृष्टि करते हैं। इस वेद-वाक्यसे वेद अनादि सिद्ध होते हैं। मनु भी 'अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा'—स्वायम्भुवने अनादि-निधन-उत्पत्ति-नाशविवर्जित वेद लक्षण वाणीका उत्सर्ग किया; सम्प्रदायप्रवर्तन किया—इस वचनसे वेदको अनादि बतलाते हैं। अतः सर्व प्राचीन भाषा संस्कृत भाषा ही सिद्ध होती है। उससे ही अन्य भाषाओंका उद्गम हुआ है। उन अनादि अपौरुषेय वेदों, मनुस्मृति, चरक आदि ग्रन्थोंसे मालूम पडता है कि सप्तद्वीपा मेदिनीमे जम्बूद्वीप श्रेष्ठ है और जम्बूद्वीपमे भी भारतवर्ष ही सर्वोत्कृष्ट है। चतुर्दश भुवनोंमे पृथ्वी और पृथ्वीमे भारतवर्ष विराट् पुरुषका हृदय-स्वरूप है। इसीमे आर्यावर्त्त, ब्रह्मावर्त्त एव हिमालय हैं। इसीमें साङ्गोपाङ्ग सभी ऋतुओंका विकास होता है। इसीमें सभी रंगके मनुष्य भी मिलते हैं, अतः यहीं मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है— तेषां कुरुक्षेत्रं देवयजनमास। तस्मादाहुः कुरुक्षेत्रं वै देवानां देवयजनम्। ( शतपथ ) यदनु कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनम्। ( रामोत्तरतापि० १ । १, तारसार० २ ) डॉक्टर ई० आ० एलंसका 'मेडिकल' पुस्तकमें कहना है कि 'हिमालयमें वनस्पति, घास खूब होते हैं, अतः गाय, भैंस, बकरी, हाथी, कुत्ता आदि जानवर और मनुष्यका भी वहाँ होना सङ्गत है। हिमालयमें प्राणियोंके बहुत पुराने शेषांश मिलते हैं।' भाषाशास्त्री टेलर स्वर्गतुल्य काश्मीरको मनुष्य-जातिकी जन्मभूमि
विकासवाद २०१ कहते हैं । पुरातत्त्वके विद्वान् अविनाशचन्द्र दासकी ‘ऋग्वेदिक इंडिया’में कहा गया है कि 'आर्योंका आदिदेश काश्मीर ही है ।' उत्तरप्रदेशके मुख्य मन्त्री श्रीसम्पूर्णानन्दने अपनी 'आर्योंका आदिदेश भारत' पुस्तकमें भारतको ही आर्योंकी जन्मभूमि माना है । पाश्चात्त्य लोग गोरे, लम्बे, बड़े सिरवाले भारत, ईरान, योरोपवासियोंको आर्य कहते हैं । परंतु भारतीय कहते हैं कि 'जो रूप-रंग, आकृति- प्रकृति, धर्म-कर्म, ज्ञान-विज्ञान, आचार-विचार तथा शीलमें सर्वश्रेष्ठ है, वही आर्य है— कर्तव्यमाचरन् काममकर्तव्यमनाचरन् । तिष्ठति प्रकृताचारे यः स आर्य इति स्मृतः ॥ ( वशिष्ठ-स्मृति ) न वैरमुद्दीपयति प्रशान्तं न दर्पमारोहति नास्तमेति । न दुर्गतोऽस्मीति करोत्यकार्यं तमार्यशीलं परमाहुरार्याः ॥ न स्वे सुखे वै कुरुते प्रहर्षं नान्यस्य दुःखे भवति प्र
२०२ मार्क्सवाद और रामराज्य इन वचनोंसे भी हिमालयपर ब्राह्मणादि आर्योंकी उत्पत्ति सिद्ध की जाती है । ‘शतपथ’के ‘तदप्येतदुत्तरस्य गिरेः मनोरपसर्पणम्’ ( १ । २ । १ । ६ ) इससे हिमालयपर ही मनुका जलप्लावन सिद्ध किया जाता है। महाभारतके— ‘अस्मिन् हिमवतः शृङ्गे नावं बध्नीत माचिरम् ।’ ( महा० वनपर्व १८७ । ४९ ) इस वचनसे हिमालयके शृङ्गमें जलप्लावनके समय नावका बाँधना सिद्ध होता है । कहा जाता है कि हिमालयके मानस स्थानपर मानसी सृष्टि हुई है, इसीलिये उसका नाम मानस पड़ा है । कुछ भी हो, हर दृष्टिसे एशिया एवं तदन्तर्गत भारतमें ही मनुष्यकी सृष्टि सिद्ध होती है । वैवस्वतमनुको हुए अबतक ( संवत् २०१३ में ) १२ करोड़ ५ लाख ३३ हजार तीस वर्ष होते हैं, परंतु सृष्टि उनसे भी पहलेकी है, अतएव सृष्टिको हुए १ अरब ९५ करोड़ ५८ लाख ८५ हजार ५७ वर्ष माने जाते हैं । ब्रह्माके एक दिनमें १४ मनु बीतते हैं, जिसमें कि ४ अरब ३२ करोड वर्ष होते हैं। १५ खरब ५५ अरब २० करोड़ मानव-वर्षका उनका एक वर्ष होता है । अबतक ब्रह्माके ५० वर्ष बीत चुके हैं, जिसमें ७ नील ७७ खर्ब ६० अरब वर्ष बीत गये । इस तरहके १०० वर्षोंकी ब्रह्माकी आयु होती है । विष्णु एवं शिवका कालमान इससे भी बड़ा है । विकासवादी प्रायः प्राचीन वस्तुओंकी खोजसे अनुमान करते हैं कि 'मनुष्य पहले बहुत जंगली हालतमें था, क्योंकि भूमिकी सबसे नीचेकी तहोंमें मनुष्योंके बनाये जो पदार्थ मिले हैं, वे पाषाण-सींग आदिके ही बने हुए हैं। इससे मालूम होता है कि तत्कालीन मनुष्योंको धातुओंका ज्ञान नहीं था । ऊपरी तहोंमें धातु- निर्मित शस्त्र मिलते हैं। इससे मालूम होता है कि उस समयके लोग पिछले लोगोंसे कुछ उन्नत तथा सभ्य थे । परंतु यह बात असत्य है, क्योंकि अबतक जहाँ-जहाँ खुदाई हुई है, वहाँ-वहाँ एक ही गहराईपर दोनो ही प्रकारके तथा- कथित उन्नत एवं अवनत शस्त्र मिलते हैं । इससे यह सिद्ध होता है कि एक ही समयमें दोनों ही प्रकारकी अवस्थाएँ थीं। आज भी भिन्न-भिन्न ढगकी अवस्थाएँ होती हैं । लोकमान्य तिलकने 'आर्योंका उत्तरी-ध्रुव-निवास'में लिखा है कि 'यूरोपमें अनेक जगह प्राचीन छावनियों, किलोंकी दीवालो, स्मशानों, देवालयों, जलाशयोंके खोदनेसे पत्थर तथा धातुके हजारों शस्त्र मिलते हैं। इनमेंसे कितने ही स्वच्छ किये हुए, घुटे हुए और कितने ही अस्वच्छ एवं भद्दे हैं। पुरातत्त्व- वेत्ताओंने इनके तीन विभाग किये हैं। पहले 'पाषाणशस्त्र, जिनमें सींग, काष्ठ एवं हड्डियोंके शस्त्रोंका भी समावेश है। दूसरेमें काँसेके शस्त्र और तीसरेमें लोहेके शस्त्र माने गये हैं।' परंतु इससे यह समझना भूल है कि एककी समाप्तिपर
विकासवाद २०३ दूसरेका आरम्भ हुआ है। इस तरह तो ताँवे और राँगेसे काँसा बनता है, अतः एक ताम्रयुग भी मानना पड़ेगा; किंतु ताम्र-युगका पता नहीं चलता। वस्तुस्थिति तो यह है कि जिस समय यूरोपके लोग पाषाणयुगकी भूमिका- में थे, उसी समय ईसवी सन्से ६ हजार वर्ष पूर्व मिस्रवासी उच्चतम सभ्यता प्राप्त कर चुके थे। इसी तरह जिस समय यूनानी लोग 'लौह-युग' में थे, उस समयतक इटालियन 'काँस्य युग'में ही थे। यूरोपके पश्चिमी भागके लोग तो उस समय पाषाणयुगमें ही थे। इससे पाषाणादि युगोंकी कल्पना ही निराधार है। जैसे आज बैलगाड़ी और वायुयान दोनों ही हैं, वैसे ही उन्नत-अवनत सभी प्रकारके साधन सदा ही मिलते हैं। किसीने एक ही जगह एक आधुनिक घड़ी और जंगली मनुष्योंकी चकमक पथरी पायी। घड़ी जंगलके अफसरकी थी और चकमक जंगलीका था। यदि यही चीजें दब जातीं और कालान्तरमें मिलतीं तो इनसे यही अनुमान करना पड़ता कि सभ्यता और जंगलीपन दोनों साथ थे। फिर 'ज्ञानका धीरे धीरे विकास हुआ' यह कथन कैसे सत्य माना जा सकता है ? पत्थरोंसे लोहा-ताँबा निकालना भी तो सामान्य बात नहीं। जिसको धातु विश्लेषणकी शिक्षा मिलती है वही यह कार्य कर सकता है। अतः जिसे लोह युग, जंगली युग नहीं कहा जा सकता ऐसे हरप्पा और मोहनजोदड़ोके खँडहरोंमें जहाँ सभ्यताके चिह्न मिलते हैं, वहीं पत्थरके शस्त्र—जंगलीपनके चिह्न भी मिलते हैं। इस तरह भूगर्भकी जाँचसे यह नहीं सिद्ध होता कि ज्ञानकी क्रमसे उन्नति हुई है। पीछे कहा जा चुका है कि एक जगहके धरातलमें जिस कालके पाषाण- शस्त्र मिलते हैं, उसी कालके दूसरे देशके धरातलमें पूर्ण सभ्यताके पदार्थ मिलते हैं। आज भी जो पढ़ता-लिखता है, सभ्य होता है, उसके पड़ोसमें बिना पढ़े- लिखे जंगली-जैसे लोग भी रहते हैं। बड़े बड़े विद्वानोंके पुत्र-पौत्र मूर्ख निकलते हे। अतः ज्ञानके क्रमिक विकासका पक्ष गलत है ? जान्स वोसनने १९२३ के 'न्यू एज' में लिखा है कि 'यदि मनुष्य-जातिका इतिहास उत्तरोत्तर विकासकी ओर है तो क्यों चानो लोग ईसवी संवत्के पूर्व बारूद और कपास काममें लेते थे, परंतु पीछे चलकर वे उसे भूल गये ? इसी तरह मिस्रमें पिरामिड बननेके समय वहाँके लोग रेखागणितकी चरम सीमापर पहुँचे थे, पर पीछे उन्हें वह विद्या भूल गयी।' दिल्लीकी लोहेकी लाट भारतमें ही बनी, पर क्या आज यूरोप भी वैसा बना सकता है ? इसलिये कहना पड़ता है कि संसारमें हास, विकास दोनों चलते रहते हैं। दीपकके पास पतंग आता है, आँच लगती है, भागता है, फिर आता है, बादमें कूदकर दीपकपर जल जाता है। यदि ज्ञानका विकास होता तो अनुभवसे
२०४ मार्क्सवाद और रामराज्य पतंगोंको सबक सीखना था और दीपकके पास जाना बन्द करना था । परन्तु ऐसा नहीं देखा जाता, अतः यही कहना पड़ेगा कि जहाँ ज्ञान-शिक्षाकी परम्परा कायम रहती है, वहाँ ज्ञान रहता है और जहाँ परम्परा टूट जाती है वहाँ नष्ट हो जाता है । इसीलिये बिना सीखे ज्ञान नहीं होता । सृष्टिके आदिमें परमेश्वरसे ज्ञान प्राप्त होता है और अब भी पूर्वजों, अध्यापकों, आचार्योंसे ही ज्ञान सीखा जाता है । डिस्कार्टेका कहना है कि 'ईश्वरसम्बन्धी ज्ञान मनुष्यके हृदयमें स्वतः उत्पन्न नहीं होता; क्योकि वह अनन्त है। 'मैडम ब्लवेट्स्कीने 'सिक्रेट डॉक्ट्रिन'में लिखा है कि "कोई नवीन धर्मका प्रवर्तक नहीं हुआ। 'आर्यों, सेमिटिको, तुरानियो- ने नया धर्म, नयी सभ्यताका आविष्कार किया था,' इसका मतलब यही है कि वे धर्मके पुनरुद्धारक थे, मूल शिक्षक नहीं।"
भाषा-विज्ञान
ज्ञानके लिये भाषा भी अपेक्षित होती है; क्योंकि ऐसा कोई भी ज्ञान नहीं होता, जिसमें सूक्ष्म शब्दका अनुवेध न हो । भाषा भी सीखकर ही बोली जाती है । माता तथा कुटुम्बियोंकी बोलचाल सुनकर ही प्राणी बोलता है । स्वतन्त्रतासे कोई नयी भाषा बना भी नहीं सकता है । कहते हैं कि गूँगे बहरे भी होते हैं । वे सुन नहीं सकते, इसीलिये बोल भी नहीं सकते । परन्तु उनके मुँहमें बोलनेके साधन होते हैं । इसीलिये यन्त्रोंद्वारा उनसे बुलवाया जाता है । बिना सिखलाये कोई बोल नहीं सकता । गूँगा दूसरोंको मुँह फैलाकर बोलते देखकर वैसी नकल करता है। कहा जाता है कि भेड़ियेकी माँदसे निकले हुए मनुष्योंके बच्चे भेड़ियो- जैसा ही बोलते हैं। गूँगे और इन बच्चोंसे अ, इ, उ, ए, ओ के अतिरिक्त ककारादि वर्णमालाके अक्षर उच्चरित नहीं होते । यदि गूँगा अधा भी हो तो अ, इ आदिका भी उच्चारण नहीं कर सकता । प्रो० मैक्समूलरने 'भाषा-विज्ञान' (साइन्स ऑफ दि लैग्वेज) में लिखा है कि 'मिस्रके बादशाह सामिटकरने सद्यःप्रसूत दो बालकोंको गडरियोंके सुपुर्द करके यह प्रबन्ध किया कि उन्हें पशुओंके अतिरिक्त किसीकी भाषा सुननेको न मिले । उन लड़कोंके बड़े होनेपर देखा गया कि वे अ, इ, उ के सिवा कुछ भी बोल नही सकते थे।' इसी प्रकार द्वितीय फ्रेडरिक, चतुर्थ जेम्स, अकबर आदिने भी परीक्षा की थी । निष्कर्ष यही निकला कि मनुष्य बिना सिखाये भाषा सीख नहीं सकता । भाषा-विज्ञानके आधुनिक विद्वान् मनुष्य सृष्टिके साथ ईश्वरद्वारा भाषाका प्रादुर्भाव नहीं मानते । उनके अनुसार पहले हस्तसंकेत आदिद्वारा ही व्यवहार होता था। बादमें व्यवहारके लिये बुद्धिपूर्वक मनुष्योंने भाषा बनायी । विचारों और भाषाओंका अटूट सम्बन्ध होता है ।
, above it is a repha (curve open to the right) and a dot (anusvara). There is no diagonal stroke to the left. Wait, look at line 18: Wait, in line 18, above the bar there is also a repha and a dot, no diagonal stroke! Wait, look at line 31: "अन्यत्रसे वर्णांका उच्चारण" - also repha and dot! Wait! Why would all three have no diagonal stroke, but line 30 "वर्णोंकी" has it? Because in "वर्णोंकी", it's an 'ी' matra? No, "वर्णों" has 'ो' and then 'की'! Wait, in line 30: "वर्णोंकी" has 'ो' clearly! Why do lines 18, 22, 31 look like that? Wait, could it be that the font has a ligature where the diagonal stroke of 'ो' and the repha overlap, or the diagonal stroke was completely missing from the font's [र् + ो + ं + ा] sort? Yes, in old Hindi printing, the sort for "र् + ो + ं" sometimes just had the repha and bindu, or it's a known defect of that typecase. Wait, let's look at "वर्णांका" vs "वर्णोंका": Wait, is it "वर्णांका" or "वर्णोंका"? Wait, look at line 22 again:
२०६ मार्क्सवाद और रामराज्य टन्'का अनुकरण भी नहीं करते। यह विभिन्न वर्णोंके उच्चारण सीखे बिना कभी आ ही नहीं सकता। बाह्य अव्यक्त शब्दोंमें वर्ण नहीं होते, इसीलिये मुर्गेकी बोलीमें हम 'कुकड़ूकूँ' की कल्पना करते हैं। अंग्रेज लोग इसीको 'कॉक ए डू डिल् डू' कहते हैं। इसी प्रकार हर्ष, शोक आदिसे 'हाय, हा-हा' आदि शब्द भी उन्हींके मुखसे निकल सकते हैं, जिन्होंने वर्णोंका उच्चारण सीख रखा है। पशुओ और गूँगोके मुखसे 'हा-हा' 'हाय-हाय' आदिका उच्चारण नहीं बनता है। बोलनेवालेका सम्पर्क हुए बिना किसी दुधमुँहे बच्चेके मुँहसे क, ख, ग, घ आदि वर्णमालाका उच्चारण नहीं हो सकता। आधुनिक लोग भी जब यह मानते हैं कि मनुष्यमें ही स्पष्ट शब्द उच्चारणकी शक्ति है, अन्यमें नहीं, तब यह गुण जब इसके पूर्वजोमें नहीं था, तब इसमें क्यों और कैसे आ गया ? कुछ लोग कहते है कि 'ईश्वरने ही मनुष्यके मुखमें वर्णोंके उच्चारणकी शक्ति दी है।' तब फिर यह भी क्यो नहीं माना जाता कि ईश्वरने ही मनुष्यको भाषा सिखायी ? जब पशु मनुष्यकी बोली नहीं बोलता, तब मनुष्य ही पशुकी बोलीकी नकल करके भाषा बोलना कैसे सीख गया ? मैक्समूलरका कहना है कि 'मनुष्यकी भाषा ध्वनि अथवा पशुओकी बोलीसे नहीं बनी।' लॉक एडम, स्मिथ एवं डयूगल्ड स्टुवर्ट आदि कहते हैं कि 'मनुष्य बहुत कालतक गूँगा रहा, संकेतोंसे, भ्रूक्षेपसे वह काम चलाता रहा। जब काम न चला, तब परस्पर संवाद करके शब्दोंके अर्थ नियत करके भाषा बना ली।' इसके उत्तरमें मैक्समूलरने लिखा है कि “मैं नहीं समझता कि भाषाके बिना उनमें सवाद कैसे जारी रह सका ? क्या अर्थ नियत करनेके पूर्व संवाद निरर्थक ही चला आता था ? जबतक उनके पास कोई सार्थक ध्वनि नहीं थी, तबतक 'अमुक शब्दका अमुक अर्थ है' यह नियत करना कैसे सम्भव था ? एकने दूसरेसे कैसे कहा कि रोटीको चूँ-चूँ कहना और समझना चाहिये' और कैसे दूसरोने ये सब बाते समझ ली ? अतः ज्ञानके बिना भाषा नहीं बन सकती और भाषाके बिना ज्ञान नहीं बन सकता ।” नाम-नामीका घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। ऐसी दशामें यही तथ्य उपलब्ध होता है कि आदिम मनुष्य ज्ञान और भाषाके सहित उत्पन्न हुआ है। इसपर भी विचार करनेसे मालूम पड़ता है कि जब ज्ञान और भाषा दोनों- हीके लिये शिक्षा अपेक्षित है, तब बिना शिक्षाके ज्ञान और भाषा कैसे उत्पन्न हुई ? अतः अन्तिम सिद्धान्त यह मानना ही पडता है कि परमेश्वरने ही मनुष्यको निर्मित करके उसे ज्ञान और भाषा प्रदान की। वेदोंसे भी यही स्पष्ट मालूम पड़ता है कि परमेश्वरने ब्रह्माको उत्पन्न करके उन्हे वेद प्रदान किया—
विकासवाद २०७ यो वै ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । ( श्वेताश्वतर ० ६ । १८ ) ब्रह्मा ने अपने पुत्रों को और उन्होंने इसी तरह अपने पुत्रों और शिष्यों को आदिम भाषा और ज्ञान का उपदेश किया । आगे चलकर ज्ञान और भाषा में अपभ्रंश भी होता गया । यह पीछे कहा जा चुका है कि कोई भी बोध या ज्ञान ऐसा नहीं होता, जिसमें सूक्ष्म शब्द का सम्बन्ध न हो । फिर इस दृष्टि से अनादि ईश्वर के अनादि ज्ञान में जो शब्द अनुविद्ध थे, वही अनादि भाषा थी । कोई भी कार्य ज्ञान, चिकीर्षा एवं कृतिपूर्वक ही सम्पन्न होता है । इस तरह सृष्टि कार्य में भी ईश्वर की मति, चिकीर्षा और कृति अपेक्षित ही है । उस अनादि ज्ञान में अनुविद्ध अनादि शब्द- समूह का होना अनिवार्य है । जब संस्कृत भाषा एवं वेद से पुरानी पुस्तक संसार में उपलब्ध नहीं है, इसकी अतिप्राचीनता तर्कों से भी सिद्ध होती है, तब मनु आदिके अनुसार उसे ही अनादि भाषा मानना युक्त है । उसके व्यापक धातुओं से संसार की सभी भाषाएँ निष्पन्न भी हो ही जाती हैं । अतः 'ईश्वर ने आदिम प्राणियों को भाषा एवं विज्ञान सिखलाया' यही पक्ष ठीक है। जैसे आजकल हिप्नोटिज्म करनेवाला अपने माध्यम (सब्जेक्ट) के मुँह से मानसिक प्रेरणा द्वारा ऐसी भाषाओं के शब्द उच्चारण करा देता है, जिसको माध्यम ने कभी सुना भी नहीं, वैसे ही सर्वशक्तिमान् परमेश्वर भी मनुष्यों को अपनी शक्ति द्वारा शब्दोच्चारण करा सकता है । इसीलिये आदिम मनुष्य परम ज्ञानवान् थे—यही पक्ष श्रेष्ठ है। सुकरात के मतानुसार भी कोई किसी को नया ज्ञान नहीं सिखलाता, अपितु भूले हुए ज्ञान को याद दिलाता है । जिसमें ज्ञान-शक्ति नहीं, उसे ज्ञान कराया नहीं जा सकता, जैसे—पाषाणों को ज्ञान कराना असम्भव है । अतएव कोलब्रुक के मता- नुसार भी भाषा मनुष्य का एक आत्मिक साधन है । आर० सी ट्रेनिचने 'शब्दों का अध्ययन' (स्टडी ऑफ वर्डस्) में कहा है कि 'ईश्वर ने मनुष्य को वाणी उसी प्रकार दी, जिस प्रकार बुद्धि दी, क्योंकि मनुष्य का विचार ही शब्द है, जो बाहर प्रकाशित होता है ।' मैक्समूलर का कहना है कि 'भिन्न-भिन्न भाषा परिवारों में जो चार-पाँच सौ धातु मूल तत्त्वरूप शेष रह जाते हैं, वे न तो मनोराग-व्यंजक ध्वनियाँ ही हैं और न अनुकरणात्मक शब्द ही । हम उनको वर्णात्मक शब्दों का साँचा कह सकते हैं ।' प्लेटो के साथ हम कह सकते हैं कि 'वे स्वभाव से ही विद्यमान हैं ।' वैदिकों का तो स्पष्ट कहना है कि अनादि-निधन, सच्चिदानन्द ब्रह्म ही शब्द ब्रह्म है, उसी से विश्व की प्रक्रिया चलती है । अनन्त सदानन्द का ही प्रकाशविशेष अर्थ है । अनन्त चित् या अखण्ड बोध की ही अभिव्यक्ति-विशेष शब्द है । दोनों एक सच्चिदानन्द के प्रकाश हैं, अतएव दोनों में विषय-विषयी भाव होते हुए भी अभेद है । इसीलिये कोई बोध बिना सूक्ष्म शब्द के नहीं होता । शब्द और अर्थका मीमांसकों के मतसे
औत्पत्तिक (स्वाभाविक) सम्बन्ध है। घटत्वादि जाति शब्दका शक्य होता है, अतः शब्दके समान ही अर्थ भी नित्य ही है- 'औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः' (पू० मी०) नैयायिक लोग शब्द और अर्थके सम्बन्धरूप संकेतको औत्पत्तिक, अकृत्रिम नही मानते, किंतु संकेतको पौरुषेय मानते हैं। परंतु जीव पुरुषके द्वारा नही, अपितु ईश्वरसे संकेतका होना मानते हैं। 'अमुक शब्दसे अमुक अर्थको समझना चाहिये,' इस प्रकार ईश्वर ही आदिम ऋषियोंको उपदेश करता है। इसपर मीमांसकोंकी आपत्ति यह है कि "ईश्वर जिन शब्दोंसे ऋषियोंको शब्दार्थ-सम्बन्ध बतलाता है, उन शब्दो और अर्थोंका सम्बन्ध यदि उससे पहले ऋषियोंको ज्ञात नहीं है, तो वे समझ कैसे सकते ? यदि कहा जाय कि 'हस्त, मुख, भ्रूक्षेप आदि इशारोसे ईश्वर संकेत ग्रहण करायेगा' तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि पहले तो ईश्वर निराकार है, उसका हस्त, भ्रूक्षेप आदि संकेत कैसे सम्भव होगा ? यदि लीला- शक्तिसे उसे साकार भी माने, तो भी अल्पज्ञ प्राणियोंको सब संकेतों, इशारोका बोध भी कितना कठिन है ? इसके अतिरिक्त, जितने असंख्यात शब्द और अर्थ हैं, उतने संकेत इशारोसे हो सकना भी सम्भव नहीं। हस्त, मुख, भ्रू आदिके विक्षेप सीमित हैं। परंतु शब्द और अर्थ अपार समुद्रतुल्य हैं - इन्द्रादयोऽपि यस्यान्तं न ययुः शब्दवारिधेः । यदि ईश्वर शब्दोंके द्वारा संकेत (शब्दार्थ-सम्बन्ध) को बोधित करे कि अमुक शब्दसे अमुक अर्थको समझना चाहिये, तो यह मानना ही पड़ेगा कि जिन शब्दोंके द्वारा वह बोध कराता है, उनका स्वार्थ सम्बन्धरूप संकेत प्रतिपादयिता और प्रतिपत्ता दोनोंको ही विदित होना चाहिये। इस दृष्टिसे नव- नवोत्पन्न अर्थों और अपभ्रंश शब्दोंका सम्बन्ध भले ही मनुष्यकृत हो, परंतु जिन गो आदि शब्दों एव सास्नादिमत् व्यक्ति आदि अर्थोंके सम्बन्ध अनादि वृद्ध व्यवहारमे प्रचलित है, उनका संकेत अकृत्रिम एवं औत्पत्तिक ही मानना उचित है। सुस्पष्ट है कि घटादि कार्य सशरीर व्यक्तियोंसे निर्मित होते हैं, परंतु अंकुरादि कार्य अशरीरसे निर्मित मान्य होते हैं। सर्वसाधारण मनुष्य शरीर माता पितासे उत्पन्न होते हैं, परंतु सृष्टिके प्रारम्भके शरीरको अशरीरसे निर्मित ही मानना पडता है। प्रथम साकार वस्तुको निराकारद्वारा निर्मित मानना पडता है। जैसे गन्धवती पृथिवी निर्गन्ध जलका, सरस जल नीरस तेजका, स्पर्शवान् वायु निःस्पर्श आकाशका कार्य है, वैसे ही कुछ शब्दार्थ सम्बन्ध कृत्रिम होनेपर भी आदिम शब्दार्थ अकृत्रिम ही हैं। सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके द्वारा ब्रह्माको और ब्रह्माद्वारा, वशिष्ठादि ऋषियोको उपदेश किया जाता है। बीज अंकुर, दिन-रात, निद्रा-प्रबोध और जन्म मरणके समान ही सृष्टि एव संहारकी भी अनादि परम्परा है। तथा च जैसे प्रबुद्ध व्यक्तिको निद्राके पूर्वकी बातोंका स्मरण रहता है, वैसे ही सुप्त-प्रतिबुद्ध न्यायसे विशिष्ट ऋषियोंको प्रथमकल्पीय कुछ शब्दार्थ सम्बन्धो एवं कुछ मन्त्रोंका भी स्मरण होता है।
ऐसे ही आर्ष मन्त्रद्रष्टा होते हैं । आवट्य महर्षिको पिछले दस महाकल्पोंका स्मरण था— दशसु महासर्गेषु पुनःपुनरुत्पद्यमानेन मया यत्किंचिदनुभूतं तत्सर्वं दुःखमेव (योगभाष्य ३।१८) पूर्वमीमांसक तो खण्ड प्रलय ही मानते हैं, महाप्रलय नहीं, अतः कहीं-न कहीं सृष्टिका क्रम जारी रहता है । यह जगत् सदा ऐसा ही रहता है (न कदाचिदनीदृशं जगत्) । अतः हम जैसे अपने गुरुसे ही वेदाध्ययन करते हैं, वैसे ही पूर्वके गुरुओंने भी अपने-अपने गुरुओंसे वेदाध्ययन किया है । यह परम्परा बीजाङ्कुर परम्पराके तुल्य अनादि है— वेदस्याध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम् । वेदाध्ययनसामान्यादधुनाध्ययनं यथा ॥ जिन उत्तरमीमांसकोंके मतमें महाप्रलय होता है, उनके यहाँ भी प्रलयकालमें मूल गुरु परमेश्वरमें वेद विद्यमान रहते हैं । सृष्टिके आरम्भमें ईश्वर, वेद या शब्दार्थ सम्बन्धका निर्माण नहीं करते, किंतु नित्य सिद्धका उपदेश करके सम्प्रदाय प्रवर्तन करते हैं । यह भी कहा जाता है कि प्रथम एकाक्षरात्मक वर्ण नहीं थे, वाक्योद्वारा ही चिन्तन या विचार चलता है, अतः प्रारम्भमें वाक्यात्मक ही शब्द थे । जिससे पूर्ण- भावकी व्यक्ति हो वही वाक्य है, भले वह ‘चल’ ‘ॐ’ आदिकी तरह अनेकाक्षर हों चाहे अनेक शब्दाके हों । विकासवादी भाषाके सम्बन्धमें भी विकासका सिद्धान्त मानते हैं। अयोगात्मक भाषा चीनियोंकी मानी जाती है, उसमें प्रकृति-प्रत्ययका भेद नहीं होता । योगात्मक भाषा तुर्की है, जिसमें प्रकृति-प्रत्यय स्पष्ट रहते हैं । विभक्तियुक्त भाषा संस्कृत है । इनमें भी विकासवादी क्रमिक विकास मानते हैं । आधुनिक अनुसंधानोंसे पता लगा है कि चीनी भाषा सदा ही ऐसी नहीं थी । उसमें पहले अनेकाक्षरके शब्द होते थे । ह्रासके कारण एकाक्षरके शब्द हो गये । जैसे मुखका ‘मुंह’, कभी ‘मूं’ भी कह दिया जाता है, वैसे ही चीनमें हुआ होगा । रेड इडियनोंकी एवं इथियोपिक भाषाओंको बहुसंश्लेषणात्मक या बहुमिश्रात्मक कहा जा सकता है । अफ्रीकी भाषाओंको भी अनेकाक्षरात्मक ही कहा जा सकता है । इससे पता लगता है कि पहलकी भाषाएँ विभक्तियुक्त अनेकाक्षरात्मक थीं, बादमें एकाक्षरात्मक हुईं । अतः प्रतीत होता है कि संस्कृत भाषा ही आदिम भाषा है और उसका अपभ्रंश अन्यान्य भाषाएँ हैं। संश्लेषणात्मक एवं विभक्तियुक्त भाषाएँ प्राचीन हैं और विश्लेषणात्मक या एकाक्षरात्मक भाषाएँ नवीन हैं। आर्य, सेमिटिक और पुरानी भाषाएँ एक ही परिवारकी हैं । इनमें भेद भी है और वह भेद बहुत पुराना भी हो सकता है । जब सबके मूल पुरुष एक थे, तब आदि ज्ञान एवं आदि भाषाका भी रूप एक ही होना चाहिये । मा० स० १४-
२१० मार्क्सवाद और रामराज्य डेविसका 'हार्मोनिया' में कहना है कि 'भाषाके मुख्य उद्देश्यमें विकास होना सम्भव नहीं है, क्योकि उद्देश्य सर्वदेशी एवं पूर्ण होता है। उसमें किसी प्रकारका परिवर्तन सम्भव नहीं है।' मैक्समूलरके मतानुसार 'सभी भाषाएँ मूलमें एक ही थीं। मनुष्यकी असावधानीसे ही उनमें बिगाड हुआ।' इससे विकासके विपरीत ह्रास प्रतीत होता है। डा० पाटके अनुसार 'भाषाके मूल स्वरूपमे परिवर्तन नही हो सकता, केवल कुछ बाह्य परिवर्तन ही होते हैं। पिछली जातिने एक भी नया धातु नहीं बनाया। ज्ञान, अज्ञानका ज्वारभाटा सदासे ही आता रहता है। जो जातियों कभी जंगली थी, वही कभी ज्ञान-विज्ञानयुक्त हो जाती हैं और ज्ञान-विज्ञानयुक्त जातियाँ कभी अज्ञानसे जगली बन जाती है।' पीछे यह भी कहा गया है कि 'द्रविड़ भाषाका आस्ट्रेलियान आदि अनेक भाषाओंसे सम्बन्ध प्रतीत होता है और केम्बल्स् द्रविड़, तेलगू आदि भाषाओंका वैदिक भाषासे ही निकलना मानता है। इनके सैकड़ों शब्द अबतक एक ही समान पाये जाते हैं। इन भाषाओकी तुल्यता मिलती है। संस्कृतमें अम्ब, सीरियनमें आमो, द्रविड़में अम्मा, सामोपे डिकमें अम्म, सीथियनमें अम्माल, अरबीमे उम्म, मलयालीमें अम, तुलूमें अप्पा और चीनीमें मॉ इत्यादि । जैसे सस्कृत, जेन्द और लैटिन भाषाओंमें लिङ्ग एवं वचन तीन तीन होते हैं, वैसे ही सेमेटिक, अरबी और हिब्रू भाषामें भी लिङ्ग, वचन तीन-तीन होते हैं। पुँल्लिङ्गसे स्त्रीलिङ्ग बनानेका ढग वही है। जैसे रामका रामा, वैसे ही साहबको साहिबा और मलकको मलिका बनाकर पुँल्लिङ्गसे स्त्रीलिङ्ग किया जाता है। पुराने भेदके अन्तर्गत यूरल, अल्ताइक, तुंगसिक, मंगोलिक, तुर्की और तिलगू आदि भाषाएँ आती हैं। इनमें एक शाखा सामोपेडिक है, जो चीनकी पैतिसी तथा साइबेरियाकी ओवि नदीके किनारे विस्तृत रूपसे बोली जाती है। इस भाषामे सस्कृतकी भाँति तीन वचन और आठ विभक्तियाँ होती हैं। अनादिसिद्ध शुद्ध शब्दोंके उच्चारणमें शिक्षाकी कमीके कारण गड़बड़ी होती है। उच्चारणमें व्यत्यास हो जानेसे शुद्ध शब्द अपभ्रष्ट हो जाते हैं। जैसे असुर लोग 'हे आर्य !' के स्थानमें 'हेलय' उच्चारण करने लगे। आज भी इसी कारण सूक्ष्मको 'छुच्छम' और 'टिकिट'को 'टिकस' उच्चारण करते हैं। लिपिके अक्षरोंमें कमीके कारण अरबीमे 'चरक'को 'सरक', 'कोटपाल'को 'कोतवाल' कहा जाता है। तीन वचन- वाली संस्कृत भाषासे उत्पन्न हिंदी, मराठी, गुजराती, बगाली आदि भाषाओंमें दो ही वचन होते हैं, तीन नही । इसी प्रकार जेन्द भाषामें तीन वचन हैं, उससे उत्पन्न फारसी, पश्तो, उर्दू आदि भाषाओंमे दो ही वचन हैं। लैटिनमे तीन वचन होते हैं, उससे उत्पन्न भाषाओंमें दो ही वचन होते हैं। इसी तरह हिंदीमे नपुंसक लिङ्गका प्रयोग लुप्त हो गया । गुप्त कामोके लिये इसी तरह अपभ्रष्ट करके कुछ संकेतमयी भाषाएँ बना ली जाती हैं। क्लिष्ट और विस्तृत संस्कृत भाषासे ही
सरल और संकुचित करके उच्चारणकी दृष्टिसे अन्य भाषाएँ बनी हैं । जैसे 'ऋत' को 'राइट', 'उष्ट्र' को 'ऊन्तर', 'स्थान' को 'स्तान,' 'घनी' को 'गनी,' 'विधवा' को 'विडो,' 'गृभ' को 'ग्रिफ्ट,' 'भ्रातर' का 'ब्रदर,' 'मातर' का 'मदर', 'पितर' का 'फादर', संस्कृत एवं जेन्दमें 'असुर'को 'अहुर,' 'सोम' को 'होम,' 'सप्त' को 'हफ्त,' 'आहुति' को 'आज़ुति,' 'वाहू' को 'वाजू,' 'पशु' को 'पसू,' 'उक्षन्' को 'आक्स' तथा संस्कृत एवं फ़ारसीमें 'तनु' को 'तन', 'जानु' को 'जानु,' 'बाहु' को 'बाज़ू,' 'अंगुष्ठ' को 'अंगुस्त,' 'हस्त' को 'हस्त,' 'पाद' को 'पा', 'शिर'को 'सर' कहते हैं । संस्कृत और यूनानीमें 'गते' को 'केटन,' 'दश' को 'डेक,' 'अश्मन' को 'अकमन्' कहते हैं । संस्कृत और मिस्रीमें 'अथ' वो 'अख,' 'आप' को 'आप' कहते हैं । संस्कृत और अरबीमें 'हर्म्य' को 'हरम्' 'सुर' को 'हुर' कहते हैं । संस्कृत और अफ्रीकीमें 'ध्यान' को 'बानी', 'कर्त्त' को 'काटा' कहते हैं । संस्कृत और चीनीमें 'स्थान' को 'तान,' 'जन'को 'जिन', 'अम्बा' को 'माँ,' 'होम' को 'ह्योम' कहते हैं । संस्कृत एवं जापानीमें 'का' को 'का,' 'बहुत्व' को 'मोत्तो' आदि कहते हैं । संस्कृत और द्रविड़में 'तालु' को 'तला', 'मजु' को 'मछी,' 'मेष' को 'मेक,' 'राजा' को 'राजू' कहते हैं । इस तरह इन उदाहरणोंसे यह सिद्ध होता है कि उच्चारणमें असावधानीसे ही अनेक भाषाएँ बनी हैं । संस्कृतमें, विशेषतः वेदमें उच्चारणकी सावधानी बहुत ही आवश्यक होती है । स्वर एवं वर्णसे हीन मन्त्रका प्रयोग मिथ्या प्रयोग कहा जाता है । वह जिस अर्थके लिये प्रयुक्त हुआ है, उसका बोध नहीं कराता । इतना ही नहीं, वह वाग्वज्र बनकर यजमानका नाश कर देता है । जैसा कि—'इन्द्रशत्रो विवर्द्धस्व' में स्वरके दोषसे अर्थात् अन्तोदात्तके स्थानमें आद्युदात्तका प्रयोग करनेसे तत्पुरुष समासके अनुसार इन्द्रका शत्रु अर्थात् घातक अर्थ नही हुआ, अपितु बहुव्रीहि समासके अनुसार 'इन्द्र है घातक जिसका' ऐसा अर्थ हुआ । इस स्वरापराधसे यजमान वृत्र मारा गया । वैदिक- लौकिक दोनों ही प्रकारके व्याकरण वैदिक-लौकिक संस्कृत भाषाको बिगड़ने नहीं देते । वैदिक भाषाकी लिपि भी प्राचीन ही है और उसी आधारपर लिपि भी यन्त्र आदिके काम आती है । अब बहुत-से प्राचीन लेख मिल रहे हैं । ब्राह्मी लिपिके पहलेके कहे जानेवाले लेखोंमें कोई स्पष्ट लिपि नहीं । कितने ही शिलालेख तो काल्पनिक ही हैं । धातुपाठ, प्रत्यय, नियम, तीन वचन, आठ विभक्तियाँ, दस लकार, सन्धि-कौशल तथा स्वर-विज्ञानमें संस्कृत व्याकरणसे तुलना संसारका कोई भी व्याकरण नहीं कर सकता । इन सब प्रक्रियाओंका प्रयोग करनेसे शब्दोंके