भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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२०२ मार्क्सवाद और रामराज्य इन वचनोंसे भी हिमालयपर ब्राह्मणादि आर्योंकी उत्पत्ति सिद्ध की जाती है । ‘शतपथ’के ‘तदप्येतदुत्तरस्य गिरेः मनोरपसर्पणम्’ ( १ । २ । १ । ६ ) इससे हिमालयपर ही मनुका जलप्लावन सिद्ध किया जाता है। महाभारतके— ‘अस्मिन् हिमवतः शृङ्गे नावं बध्नीत माचिरम् ।’ ( महा० वनपर्व १८७ । ४९ ) इस वचनसे हिमालयके शृङ्गमें जलप्लावनके समय नावका बाँधना सिद्ध होता है । कहा जाता है कि हिमालयके मानस स्थानपर मानसी सृष्टि हुई है, इसीलिये उसका नाम मानस पड़ा है । कुछ भी हो, हर दृष्टिसे एशिया एवं तदन्तर्गत भारतमें ही मनुष्यकी सृष्टि सिद्ध होती है । वैवस्वतमनुको हुए अबतक ( संवत् २०१३ में ) १२ करोड़ ५ लाख ३३ हजार तीस वर्ष होते हैं, परंतु सृष्टि उनसे भी पहलेकी है, अतएव सृष्टिको हुए १ अरब ९५ करोड़ ५८ लाख ८५ हजार ५७ वर्ष माने जाते हैं । ब्रह्माके एक दिनमें १४ मनु बीतते हैं, जिसमें कि ४ अरब ३२ करोड वर्ष होते हैं। १५ खरब ५५ अरब २० करोड़ मानव-वर्षका उनका एक वर्ष होता है । अबतक ब्रह्माके ५० वर्ष बीत चुके हैं, जिसमें ७ नील ७७ खर्ब ६० अरब वर्ष बीत गये । इस तरहके १०० वर्षोंकी ब्रह्माकी आयु होती है । विष्णु एवं शिवका कालमान इससे भी बड़ा है । विकासवादी प्रायः प्राचीन वस्तुओंकी खोजसे अनुमान करते हैं कि 'मनुष्य पहले बहुत जंगली हालतमें था, क्योंकि भूमिकी सबसे नीचेकी तहोंमें मनुष्योंके बनाये जो पदार्थ मिले हैं, वे पाषाण-सींग आदिके ही बने हुए हैं। इससे मालूम होता है कि तत्कालीन मनुष्योंको धातुओंका ज्ञान नहीं था । ऊपरी तहोंमें धातु- निर्मित शस्त्र मिलते हैं। इससे मालूम होता है कि उस समयके लोग पिछले लोगोंसे कुछ उन्नत तथा सभ्य थे । परंतु यह बात असत्य है, क्योंकि अबतक जहाँ-जहाँ खुदाई हुई है, वहाँ-वहाँ एक ही गहराईपर दोनो ही प्रकारके तथा- कथित उन्नत एवं अवनत शस्त्र मिलते हैं । इससे यह सिद्ध होता है कि एक ही समयमें दोनों ही प्रकारकी अवस्थाएँ थीं। आज भी भिन्न-भिन्न ढगकी अवस्थाएँ होती हैं । लोकमान्य तिलकने 'आर्योंका उत्तरी-ध्रुव-निवास'में लिखा है कि 'यूरोपमें अनेक जगह प्राचीन छावनियों, किलोंकी दीवालो, स्मशानों, देवालयों, जलाशयोंके खोदनेसे पत्थर तथा धातुके हजारों शस्त्र मिलते हैं। इनमेंसे कितने ही स्वच्छ किये हुए, घुटे हुए और कितने ही अस्वच्छ एवं भद्दे हैं। पुरातत्त्व- वेत्ताओंने इनके तीन विभाग किये हैं। पहले 'पाषाणशस्त्र, जिनमें सींग, काष्ठ एवं हड्डियोंके शस्त्रोंका भी समावेश है। दूसरेमें काँसेके शस्त्र और तीसरेमें लोहेके शस्त्र माने गये हैं।' परंतु इससे यह समझना भूल है कि एककी समाप्तिपर

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