मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविकासवाद २०३ दूसरेका आरम्भ हुआ है। इस तरह तो ताँवे और राँगेसे काँसा बनता है, अतः एक ताम्रयुग भी मानना पड़ेगा; किंतु ताम्र-युगका पता नहीं चलता। वस्तुस्थिति तो यह है कि जिस समय यूरोपके लोग पाषाणयुगकी भूमिका- में थे, उसी समय ईसवी सन्से ६ हजार वर्ष पूर्व मिस्रवासी उच्चतम सभ्यता प्राप्त कर चुके थे। इसी तरह जिस समय यूनानी लोग 'लौह-युग' में थे, उस समयतक इटालियन 'काँस्य युग'में ही थे। यूरोपके पश्चिमी भागके लोग तो उस समय पाषाणयुगमें ही थे। इससे पाषाणादि युगोंकी कल्पना ही निराधार है। जैसे आज बैलगाड़ी और वायुयान दोनों ही हैं, वैसे ही उन्नत-अवनत सभी प्रकारके साधन सदा ही मिलते हैं। किसीने एक ही जगह एक आधुनिक घड़ी और जंगली मनुष्योंकी चकमक पथरी पायी। घड़ी जंगलके अफसरकी थी और चकमक जंगलीका था। यदि यही चीजें दब जातीं और कालान्तरमें मिलतीं तो इनसे यही अनुमान करना पड़ता कि सभ्यता और जंगलीपन दोनों साथ थे। फिर 'ज्ञानका धीरे धीरे विकास हुआ' यह कथन कैसे सत्य माना जा सकता है ? पत्थरोंसे लोहा-ताँबा निकालना भी तो सामान्य बात नहीं। जिसको धातु विश्लेषणकी शिक्षा मिलती है वही यह कार्य कर सकता है। अतः जिसे लोह युग, जंगली युग नहीं कहा जा सकता ऐसे हरप्पा और मोहनजोदड़ोके खँडहरोंमें जहाँ सभ्यताके चिह्न मिलते हैं, वहीं पत्थरके शस्त्र—जंगलीपनके चिह्न भी मिलते हैं। इस तरह भूगर्भकी जाँचसे यह नहीं सिद्ध होता कि ज्ञानकी क्रमसे उन्नति हुई है। पीछे कहा जा चुका है कि एक जगहके धरातलमें जिस कालके पाषाण- शस्त्र मिलते हैं, उसी कालके दूसरे देशके धरातलमें पूर्ण सभ्यताके पदार्थ मिलते हैं। आज भी जो पढ़ता-लिखता है, सभ्य होता है, उसके पड़ोसमें बिना पढ़े- लिखे जंगली-जैसे लोग भी रहते हैं। बड़े बड़े विद्वानोंके पुत्र-पौत्र मूर्ख निकलते हे। अतः ज्ञानके क्रमिक विकासका पक्ष गलत है ? जान्स वोसनने १९२३ के 'न्यू एज' में लिखा है कि 'यदि मनुष्य-जातिका इतिहास उत्तरोत्तर विकासकी ओर है तो क्यों चानो लोग ईसवी संवत्के पूर्व बारूद और कपास काममें लेते थे, परंतु पीछे चलकर वे उसे भूल गये ? इसी तरह मिस्रमें पिरामिड बननेके समय वहाँके लोग रेखागणितकी चरम सीमापर पहुँचे थे, पर पीछे उन्हें वह विद्या भूल गयी।' दिल्लीकी लोहेकी लाट भारतमें ही बनी, पर क्या आज यूरोप भी वैसा बना सकता है ? इसलिये कहना पड़ता है कि संसारमें हास, विकास दोनों चलते रहते हैं। दीपकके पास पतंग आता है, आँच लगती है, भागता है, फिर आता है, बादमें कूदकर दीपकपर जल जाता है। यदि ज्ञानका विकास होता तो अनुभवसे