मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ मार्क्सवाद और रामराज्य पतंगोंको सबक सीखना था और दीपकके पास जाना बन्द करना था । परन्तु ऐसा नहीं देखा जाता, अतः यही कहना पड़ेगा कि जहाँ ज्ञान-शिक्षाकी परम्परा कायम रहती है, वहाँ ज्ञान रहता है और जहाँ परम्परा टूट जाती है वहाँ नष्ट हो जाता है । इसीलिये बिना सीखे ज्ञान नहीं होता । सृष्टिके आदिमें परमेश्वरसे ज्ञान प्राप्त होता है और अब भी पूर्वजों, अध्यापकों, आचार्योंसे ही ज्ञान सीखा जाता है । डिस्कार्टेका कहना है कि 'ईश्वरसम्बन्धी ज्ञान मनुष्यके हृदयमें स्वतः उत्पन्न नहीं होता; क्योकि वह अनन्त है। 'मैडम ब्लवेट्स्कीने 'सिक्रेट डॉक्ट्रिन'में लिखा है कि "कोई नवीन धर्मका प्रवर्तक नहीं हुआ। 'आर्यों, सेमिटिको, तुरानियो- ने नया धर्म, नयी सभ्यताका आविष्कार किया था,' इसका मतलब यही है कि वे धर्मके पुनरुद्धारक थे, मूल शिक्षक नहीं।"
भाषा-विज्ञान
ज्ञानके लिये भाषा भी अपेक्षित होती है; क्योंकि ऐसा कोई भी ज्ञान नहीं होता, जिसमें सूक्ष्म शब्दका अनुवेध न हो । भाषा भी सीखकर ही बोली जाती है । माता तथा कुटुम्बियोंकी बोलचाल सुनकर ही प्राणी बोलता है । स्वतन्त्रतासे कोई नयी भाषा बना भी नहीं सकता है । कहते हैं कि गूँगे बहरे भी होते हैं । वे सुन नहीं सकते, इसीलिये बोल भी नहीं सकते । परन्तु उनके मुँहमें बोलनेके साधन होते हैं । इसीलिये यन्त्रोंद्वारा उनसे बुलवाया जाता है । बिना सिखलाये कोई बोल नहीं सकता । गूँगा दूसरोंको मुँह फैलाकर बोलते देखकर वैसी नकल करता है। कहा जाता है कि भेड़ियेकी माँदसे निकले हुए मनुष्योंके बच्चे भेड़ियो- जैसा ही बोलते हैं। गूँगे और इन बच्चोंसे अ, इ, उ, ए, ओ के अतिरिक्त ककारादि वर्णमालाके अक्षर उच्चरित नहीं होते । यदि गूँगा अधा भी हो तो अ, इ आदिका भी उच्चारण नहीं कर सकता । प्रो० मैक्समूलरने 'भाषा-विज्ञान' (साइन्स ऑफ दि लैग्वेज) में लिखा है कि 'मिस्रके बादशाह सामिटकरने सद्यःप्रसूत दो बालकोंको गडरियोंके सुपुर्द करके यह प्रबन्ध किया कि उन्हें पशुओंके अतिरिक्त किसीकी भाषा सुननेको न मिले । उन लड़कोंके बड़े होनेपर देखा गया कि वे अ, इ, उ के सिवा कुछ भी बोल नही सकते थे।' इसी प्रकार द्वितीय फ्रेडरिक, चतुर्थ जेम्स, अकबर आदिने भी परीक्षा की थी । निष्कर्ष यही निकला कि मनुष्य बिना सिखाये भाषा सीख नहीं सकता । भाषा-विज्ञानके आधुनिक विद्वान् मनुष्य सृष्टिके साथ ईश्वरद्वारा भाषाका प्रादुर्भाव नहीं मानते । उनके अनुसार पहले हस्तसंकेत आदिद्वारा ही व्यवहार होता था। बादमें व्यवहारके लिये बुद्धिपूर्वक मनुष्योंने भाषा बनायी । विचारों और भाषाओंका अटूट सम्बन्ध होता है ।