भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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है, यह कहना सत्य नहीं। कई लोग पुराणोंकी चौरासी लक्ष योनियोंके वर्णन और मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह आदि अवतारोंके द्वारा भी विकासवाद सिद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं। इसी तरह कई लोग कुछ वेद-मन्त्रोंको भी विकास-सिद्धिके लिये उद्धृत करते हैं, परन्तु वेदों और पुराणोंसे डार्विनका विकास कथमपि सिद्ध नहीं हो सकता। पुराणोंके अनुसार एक प्राणीसे दूसरे प्राणीका विकास सिद्ध नहीं होता। किंतु सभी योनियाँ स्वतन्त्र मानी गयी हैं। अवतारोंमें भी मत्स्य- कच्छपादि स्वतन्त्र अवतार हैं। 'मत्स्यसे कच्छपका विकास हुआ है' यह पुराणोंसे नहीं सिद्ध होता। 'क्रिश्चियन हेरल्ड' में छपे अनुसार 'ब्रिटिश साइन्स सोसाइटी' के आस्ट्रेलिया अधिवेशनमें सभापति-पदसे प्रो० विलियम बेटसनने कहा था कि 'डार्विनका विकासवाद बिल्कुल असत्य और विज्ञानके विरुद्ध है।' अमेरिकाकी कई रियासतोंने स्कूलोंमें डार्विन सिद्धान्तकी शिक्षाको कानूनके विरुद्ध ठहराया। वहाँके एक जजने अपने एक फैसलेमें लिखा था कि 'ऊँचे दरजेके विद्वान् अब विकासवादपर विश्वास नहीं करते।' प्रो० पेट्रिक गेडिसका कहना है कि 'मनुष्यके विकासके प्रमाण संदिग्ध हैं। साइन्समें उनके लिये कोई स्थान नहीं।' सर जे० डब्लयू० डासनका कहना है कि 'विज्ञानको बंदर और मनुष्यके बीचकी आकृतिका कुछ भी पता नहीं है। मनुष्यकी प्राचीनतम अस्थियाँ भी वर्तमान-जैसी ही हैं।' प्रसिद्ध विद्वान् वुड जोन्सका कहना है कि 'डार्विनसे गलती हुई है। मनुष्य बंदरसे उत्पन्न नहीं हुआ, किंतु बंदर मनुष्यसे उत्पन्न हुए हैं।' सिडनी कालेटका कहना है कि 'साइन्स स्पष्ट साक्षी है कि मनुष्य अवनत दशासे उन्नत दशाकी ओर चलनेके स्थानमें उलटा अवनतिकी ओर जा रहा है। उसकी आरम्भिक दशा उत्तम थी।' प्रागुत्तर अश्मकालकी एक खोपड़ी मिली है। यह खोपड़ी जिस सिरकी है, वह यूरोपमें सबसे बड़ा समझा जाता है। यह खोपड़ी एक सौ चौदह क्यूबिक (घन) इंच है। यूरोपमें छोटे-से-छोटे सिर ५० क्यूबिक इंच और बड़े से-बड़ा ७५ क्यूबिक इंचका पाया गया है। इससे स्पष्ट है कि वर्तमान यूरोपनिवासियोकी दिमागी ताकत बढ़ नहीं रही है। सन् १८८३ में एक सिर हालैडमें निकला, जो यूरोपनिवासियोंके औसत घेरेसे बड़ा है। इसका घेरा १५० क्यूबिक इंच है। भूगर्भ-शास्त्रियों और पुरातत्त्वज्ञोंने 'हार्लींग सेक्सान' को २५ हजार वर्ष पुराना बतलाया है। इसका घेरा भी १५० क्यूबिक इंच है। इन सब बातोंसे सिद्ध होता है कि प्राचीन मनुष्योंका विकासहीन मस्तिष्क बंदरोंसे नहीं हुआ, किंतु वे परमात्माकी विशिष्ट रचना थे। आजके उत्तम-से उत्तम मनुष्योंकी अपेक्षा वे अधिक उन्नत थे। विकासवादी शंका करते हैं कि 'यदि क्रमोन्नतिका सिद्धान्त न माना जाय तो फिर दीर्घकाय प्राणियोंकी उत्पत्ति कैसे सम्भव हो सकती है? इतना बड़ा मनुष्य एकाएक आदि कालमें कैसे पैदा हो गया?' परन्तु वे एक कोष्ठके