मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९४ मार्क्सवाद और रामराज्य उपयोगी और ईश्वरदत्त ही है। हिंदू लाखों वर्षोंसे कान छिदवाते हैं; मुसलमान सैकड़ों वर्षोंसे खतना कराते हैं; चीनकी स्त्रियाँ हजारों वर्षोंसे अपने पैर छोटे बनानेका प्रयत्न करती हैं; परंतु उनसे वैसी संताने कभी नहीं हुईं। अतः कहना होगा कि कृत्रिम विकास अमर्यादित नहीं होता। विलायतकी विधवाओसे गायोंकी वृद्धिसे भी नवीन जातिकी उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती। डार्विनका सिद्धान्त है कि 'माता-पिताके प्रत्येक अङ्गसे सार एकत्रित होकर संततिका जन्म होता है।' वाइजमैनका कहना है कि 'इस सारके एकत्रित होनेमें यदि बीचमें कोई परिवर्त्तन उद्भूत हो तो वह संततिमें संक्रमित न होगा।' मेण्डलका मत है कि 'कभी लड़का पिताकी अपेक्षा पितामहके गुणका संग्रह करता है।' हाइजकी राय है कि 'कभी कभी नयी नयी जातियाँ अकस्मात् उत्पन्न हो जाती हैं।' ये सिद्धान्त तथा हेतुवाद और अज्ञात-ज्ञेय आदि सिद्धान्त मिलकर विकासके विरुद्ध ही ठहरते हैं। इनमेंसे पहली बात 'अङ्गादङ्गात्सम्भवसि' इत्यादि वेदोंकी ही है। पुत्रमें कोई नया परिवर्तन नहीं आता। ऐसे स्थलमें पुत्र पितामहके ही गुणोंको ग्रहण करता है। इससे जातिकी स्थिरता ही सिद्ध होती है। नवीन जलकृमियोंकी उत्पत्ति भी किसी शरीर बननेके लिये विकास आवश्यक नहीं। हेतुवाद और अज्ञात ज्ञेयशक्तिसे तो यही निश्चय किया जा सकता है कि ईश्वर ही कर्मानुसार प्राणियोंकी रचना करता है, क्रम-विकास आवश्यक नहीं है। 'विकासवाद' पुस्तकमें भी लिखा है कि 'प्राणियोंकी उत्पत्ति विकासद्वारा हुई या नहीं, एक प्रकारके प्राणीसे भिन्न-भिन्न प्रकारके प्राणी बनते हैं या नहीं, इस प्रकार निरीक्षण करनेवाला मनुष्य भी विकास-क्रियाके किसी अत्यन्त सूक्ष्म भागको भी प्रत्यक्ष होते हुए पूर्णतया नहीं देख सकता। कई प्रश्नोंके सम्पूर्ण उत्तर प्राप्त करनेकी आशा भी नहीं करनी चाहिये।' अतः विकासवाद एक कल्पना ही है, सिद्धान्त नहीं। 'समाजमें निर्बलोंको जीनेका हक नहीं है', यह कल्पना कितनी भीषण है। मनुष्य और रीछ अथवा भैंसकी तुलना करे तो यह स्पष्ट ही है कि शरीर, बलमें रीछ और भैंस दोनों अधिक ठहरेंगे। मनुष्य इनसे शरीर, बलमें अवश्य हार जायगा। तथापि मनुष्य बुद्धिके कारण अधिक बलवान् सिद्ध होता है। मनुष्योंमें भी अधिक बुद्धिमान् ही प्रबल ठहरता है। नीतिबल, बुद्धि और शरीर-बलसे भी अधिक महत्त्वका है। सोडम और गमोरा निवासी अनीतिके कारण ही नष्ट हो गये। नीतिमान्, शान्त, निर्व्यसन अधिक दीर्घजीवी होते हैं। जो जाति परमार्थ-बुद्धिकी अपेक्षा अधिक स्वार्थ-बुद्धि रखती है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाती है। जानवरोंमें भी परमार्थ-बुद्धि पायी जाती है। शेर, व्याघ्र-जैसे खूँखार प्राणी भी अपने बच्चोंको दूध पिलाते हैं, प्यार करते हैं। मनुष्यका स्वार्थ- त्यागी होना ही महत्त्व है। अतः 'जीवन-संग्राममें बलवानोंकी ही विजय होती