भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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२०६ मार्क्सवाद और रामराज्य टन्'का अनुकरण भी नहीं करते। यह विभिन्न वर्णोंके उच्चारण सीखे बिना कभी आ ही नहीं सकता। बाह्य अव्यक्त शब्दोंमें वर्ण नहीं होते, इसीलिये मुर्गेकी बोलीमें हम 'कुकड़ूकूँ' की कल्पना करते हैं। अंग्रेज लोग इसीको 'कॉक ए डू डिल् डू' कहते हैं। इसी प्रकार हर्ष, शोक आदिसे 'हाय, हा-हा' आदि शब्द भी उन्हींके मुखसे निकल सकते हैं, जिन्होंने वर्णोंका उच्चारण सीख रखा है। पशुओ और गूँगोके मुखसे 'हा-हा' 'हाय-हाय' आदिका उच्चारण नहीं बनता है। बोलनेवालेका सम्पर्क हुए बिना किसी दुधमुँहे बच्चेके मुँहसे क, ख, ग, घ आदि वर्णमालाका उच्चारण नहीं हो सकता। आधुनिक लोग भी जब यह मानते हैं कि मनुष्यमें ही स्पष्ट शब्द उच्चारणकी शक्ति है, अन्यमें नहीं, तब यह गुण जब इसके पूर्वजोमें नहीं था, तब इसमें क्यों और कैसे आ गया ? कुछ लोग कहते है कि 'ईश्वरने ही मनुष्यके मुखमें वर्णोंके उच्चारणकी शक्ति दी है।' तब फिर यह भी क्यो नहीं माना जाता कि ईश्वरने ही मनुष्यको भाषा सिखायी ? जब पशु मनुष्यकी बोली नहीं बोलता, तब मनुष्य ही पशुकी बोलीकी नकल करके भाषा बोलना कैसे सीख गया ? मैक्समूलरका कहना है कि 'मनुष्यकी भाषा ध्वनि अथवा पशुओकी बोलीसे नहीं बनी।' लॉक एडम, स्मिथ एवं डयूगल्ड स्टुवर्ट आदि कहते हैं कि 'मनुष्य बहुत कालतक गूँगा रहा, संकेतोंसे, भ्रूक्षेपसे वह काम चलाता रहा। जब काम न चला, तब परस्पर संवाद करके शब्दोंके अर्थ नियत करके भाषा बना ली।' इसके उत्तरमें मैक्समूलरने लिखा है कि “मैं नहीं समझता कि भाषाके बिना उनमें सवाद कैसे जारी रह सका ? क्या अर्थ नियत करनेके पूर्व संवाद निरर्थक ही चला आता था ? जबतक उनके पास कोई सार्थक ध्वनि नहीं थी, तबतक 'अमुक शब्दका अमुक अर्थ है' यह नियत करना कैसे सम्भव था ? एकने दूसरेसे कैसे कहा कि रोटीको चूँ-चूँ कहना और समझना चाहिये' और कैसे दूसरोने ये सब बाते समझ ली ? अतः ज्ञानके बिना भाषा नहीं बन सकती और भाषाके बिना ज्ञान नहीं बन सकता ।” नाम-नामीका घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। ऐसी दशामें यही तथ्य उपलब्ध होता है कि आदिम मनुष्य ज्ञान और भाषाके सहित उत्पन्न हुआ है। इसपर भी विचार करनेसे मालूम पड़ता है कि जब ज्ञान और भाषा दोनों- हीके लिये शिक्षा अपेक्षित है, तब बिना शिक्षाके ज्ञान और भाषा कैसे उत्पन्न हुई ? अतः अन्तिम सिद्धान्त यह मानना ही पडता है कि परमेश्वरने ही मनुष्यको निर्मित करके उसे ज्ञान और भाषा प्रदान की। वेदोंसे भी यही स्पष्ट मालूम पड़ता है कि परमेश्वरने ब्रह्माको उत्पन्न करके उन्हे वेद प्रदान किया—