मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविकासवाद २०७ यो वै ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । ( श्वेताश्वतर ० ६ । १८ ) ब्रह्मा ने अपने पुत्रों को और उन्होंने इसी तरह अपने पुत्रों और शिष्यों को आदिम भाषा और ज्ञान का उपदेश किया । आगे चलकर ज्ञान और भाषा में अपभ्रंश भी होता गया । यह पीछे कहा जा चुका है कि कोई भी बोध या ज्ञान ऐसा नहीं होता, जिसमें सूक्ष्म शब्द का सम्बन्ध न हो । फिर इस दृष्टि से अनादि ईश्वर के अनादि ज्ञान में जो शब्द अनुविद्ध थे, वही अनादि भाषा थी । कोई भी कार्य ज्ञान, चिकीर्षा एवं कृतिपूर्वक ही सम्पन्न होता है । इस तरह सृष्टि कार्य में भी ईश्वर की मति, चिकीर्षा और कृति अपेक्षित ही है । उस अनादि ज्ञान में अनुविद्ध अनादि शब्द- समूह का होना अनिवार्य है । जब संस्कृत भाषा एवं वेद से पुरानी पुस्तक संसार में उपलब्ध नहीं है, इसकी अतिप्राचीनता तर्कों से भी सिद्ध होती है, तब मनु आदिके अनुसार उसे ही अनादि भाषा मानना युक्त है । उसके व्यापक धातुओं से संसार की सभी भाषाएँ निष्पन्न भी हो ही जाती हैं । अतः 'ईश्वर ने आदिम प्राणियों को भाषा एवं विज्ञान सिखलाया' यही पक्ष ठीक है। जैसे आजकल हिप्नोटिज्म करनेवाला अपने माध्यम (सब्जेक्ट) के मुँह से मानसिक प्रेरणा द्वारा ऐसी भाषाओं के शब्द उच्चारण करा देता है, जिसको माध्यम ने कभी सुना भी नहीं, वैसे ही सर्वशक्तिमान् परमेश्वर भी मनुष्यों को अपनी शक्ति द्वारा शब्दोच्चारण करा सकता है । इसीलिये आदिम मनुष्य परम ज्ञानवान् थे—यही पक्ष श्रेष्ठ है। सुकरात के मतानुसार भी कोई किसी को नया ज्ञान नहीं सिखलाता, अपितु भूले हुए ज्ञान को याद दिलाता है । जिसमें ज्ञान-शक्ति नहीं, उसे ज्ञान कराया नहीं जा सकता, जैसे—पाषाणों को ज्ञान कराना असम्भव है । अतएव कोलब्रुक के मता- नुसार भी भाषा मनुष्य का एक आत्मिक साधन है । आर० सी ट्रेनिचने 'शब्दों का अध्ययन' (स्टडी ऑफ वर्डस्) में कहा है कि 'ईश्वर ने मनुष्य को वाणी उसी प्रकार दी, जिस प्रकार बुद्धि दी, क्योंकि मनुष्य का विचार ही शब्द है, जो बाहर प्रकाशित होता है ।' मैक्समूलर का कहना है कि 'भिन्न-भिन्न भाषा परिवारों में जो चार-पाँच सौ धातु मूल तत्त्वरूप शेष रह जाते हैं, वे न तो मनोराग-व्यंजक ध्वनियाँ ही हैं और न अनुकरणात्मक शब्द ही । हम उनको वर्णात्मक शब्दों का साँचा कह सकते हैं ।' प्लेटो के साथ हम कह सकते हैं कि 'वे स्वभाव से ही विद्यमान हैं ।' वैदिकों का तो स्पष्ट कहना है कि अनादि-निधन, सच्चिदानन्द ब्रह्म ही शब्द ब्रह्म है, उसी से विश्व की प्रक्रिया चलती है । अनन्त सदानन्द का ही प्रकाशविशेष अर्थ है । अनन्त चित् या अखण्ड बोध की ही अभिव्यक्ति-विशेष शब्द है । दोनों एक सच्चिदानन्द के प्रकाश हैं, अतएव दोनों में विषय-विषयी भाव होते हुए भी अभेद है । इसीलिये कोई बोध बिना सूक्ष्म शब्द के नहीं होता । शब्द और अर्थका मीमांसकों के मतसे