भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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औत्पत्तिक (स्वाभाविक) सम्बन्ध है। घटत्वादि जाति शब्दका शक्य होता है, अतः शब्दके समान ही अर्थ भी नित्य ही है- 'औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः' (पू० मी०) नैयायिक लोग शब्द और अर्थके सम्बन्धरूप संकेतको औत्पत्तिक, अकृत्रिम नही मानते, किंतु संकेतको पौरुषेय मानते हैं। परंतु जीव पुरुषके द्वारा नही, अपितु ईश्वरसे संकेतका होना मानते हैं। 'अमुक शब्दसे अमुक अर्थको समझना चाहिये,' इस प्रकार ईश्वर ही आदिम ऋषियोंको उपदेश करता है। इसपर मीमांसकोंकी आपत्ति यह है कि "ईश्वर जिन शब्दोंसे ऋषियोंको शब्दार्थ-सम्बन्ध बतलाता है, उन शब्दो और अर्थोंका सम्बन्ध यदि उससे पहले ऋषियोंको ज्ञात नहीं है, तो वे समझ कैसे सकते ? यदि कहा जाय कि 'हस्त, मुख, भ्रूक्षेप आदि इशारोसे ईश्वर संकेत ग्रहण करायेगा' तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि पहले तो ईश्वर निराकार है, उसका हस्त, भ्रूक्षेप आदि संकेत कैसे सम्भव होगा ? यदि लीला- शक्तिसे उसे साकार भी माने, तो भी अल्पज्ञ प्राणियोंको सब संकेतों, इशारोका बोध भी कितना कठिन है ? इसके अतिरिक्त, जितने असंख्यात शब्द और अर्थ हैं, उतने संकेत इशारोसे हो सकना भी सम्भव नहीं। हस्त, मुख, भ्रू आदिके विक्षेप सीमित हैं। परंतु शब्द और अर्थ अपार समुद्रतुल्य हैं - इन्द्रादयोऽपि यस्यान्तं न ययुः शब्दवारिधेः । यदि ईश्वर शब्दोंके द्वारा संकेत (शब्दार्थ-सम्बन्ध) को बोधित करे कि अमुक शब्दसे अमुक अर्थको समझना चाहिये, तो यह मानना ही पड़ेगा कि जिन शब्दोंके द्वारा वह बोध कराता है, उनका स्वार्थ सम्बन्धरूप संकेत प्रतिपादयिता और प्रतिपत्ता दोनोंको ही विदित होना चाहिये। इस दृष्टिसे नव- नवोत्पन्न अर्थों और अपभ्रंश शब्दोंका सम्बन्ध भले ही मनुष्यकृत हो, परंतु जिन गो आदि शब्दों एव सास्नादिमत् व्यक्ति आदि अर्थोंके सम्बन्ध अनादि वृद्ध व्यवहारमे प्रचलित है, उनका संकेत अकृत्रिम एवं औत्पत्तिक ही मानना उचित है। सुस्पष्ट है कि घटादि कार्य सशरीर व्यक्तियोंसे निर्मित होते हैं, परंतु अंकुरादि कार्य अशरीरसे निर्मित मान्य होते हैं। सर्वसाधारण मनुष्य शरीर माता पितासे उत्पन्न होते हैं, परंतु सृष्टिके प्रारम्भके शरीरको अशरीरसे निर्मित ही मानना पडता है। प्रथम साकार वस्तुको निराकारद्वारा निर्मित मानना पडता है। जैसे गन्धवती पृथिवी निर्गन्ध जलका, सरस जल नीरस तेजका, स्पर्शवान् वायु निःस्पर्श आकाशका कार्य है, वैसे ही कुछ शब्दार्थ सम्बन्ध कृत्रिम होनेपर भी आदिम शब्दार्थ अकृत्रिम ही हैं। सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके द्वारा ब्रह्माको और ब्रह्माद्वारा, वशिष्ठादि ऋषियोको उपदेश किया जाता है। बीज अंकुर, दिन-रात, निद्रा-प्रबोध और जन्म मरणके समान ही सृष्टि एव संहारकी भी अनादि परम्परा है। तथा च जैसे प्रबुद्ध व्यक्तिको निद्राके पूर्वकी बातोंका स्मरण रहता है, वैसे ही सुप्त-प्रतिबुद्ध न्यायसे विशिष्ट ऋषियोंको प्रथमकल्पीय कुछ शब्दार्थ सम्बन्धो एवं कुछ मन्त्रोंका भी स्मरण होता है।