मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसे ही आर्ष मन्त्रद्रष्टा होते हैं । आवट्य महर्षिको पिछले दस महाकल्पोंका स्मरण था— दशसु महासर्गेषु पुनःपुनरुत्पद्यमानेन मया यत्किंचिदनुभूतं तत्सर्वं दुःखमेव (योगभाष्य ३।१८) पूर्वमीमांसक तो खण्ड प्रलय ही मानते हैं, महाप्रलय नहीं, अतः कहीं-न कहीं सृष्टिका क्रम जारी रहता है । यह जगत् सदा ऐसा ही रहता है (न कदाचिदनीदृशं जगत्) । अतः हम जैसे अपने गुरुसे ही वेदाध्ययन करते हैं, वैसे ही पूर्वके गुरुओंने भी अपने-अपने गुरुओंसे वेदाध्ययन किया है । यह परम्परा बीजाङ्कुर परम्पराके तुल्य अनादि है— वेदस्याध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम् । वेदाध्ययनसामान्यादधुनाध्ययनं यथा ॥ जिन उत्तरमीमांसकोंके मतमें महाप्रलय होता है, उनके यहाँ भी प्रलयकालमें मूल गुरु परमेश्वरमें वेद विद्यमान रहते हैं । सृष्टिके आरम्भमें ईश्वर, वेद या शब्दार्थ सम्बन्धका निर्माण नहीं करते, किंतु नित्य सिद्धका उपदेश करके सम्प्रदाय प्रवर्तन करते हैं । यह भी कहा जाता है कि प्रथम एकाक्षरात्मक वर्ण नहीं थे, वाक्योद्वारा ही चिन्तन या विचार चलता है, अतः प्रारम्भमें वाक्यात्मक ही शब्द थे । जिससे पूर्ण- भावकी व्यक्ति हो वही वाक्य है, भले वह ‘चल’ ‘ॐ’ आदिकी तरह अनेकाक्षर हों चाहे अनेक शब्दाके हों । विकासवादी भाषाके सम्बन्धमें भी विकासका सिद्धान्त मानते हैं। अयोगात्मक भाषा चीनियोंकी मानी जाती है, उसमें प्रकृति-प्रत्ययका भेद नहीं होता । योगात्मक भाषा तुर्की है, जिसमें प्रकृति-प्रत्यय स्पष्ट रहते हैं । विभक्तियुक्त भाषा संस्कृत है । इनमें भी विकासवादी क्रमिक विकास मानते हैं । आधुनिक अनुसंधानोंसे पता लगा है कि चीनी भाषा सदा ही ऐसी नहीं थी । उसमें पहले अनेकाक्षरके शब्द होते थे । ह्रासके कारण एकाक्षरके शब्द हो गये । जैसे मुखका ‘मुंह’, कभी ‘मूं’ भी कह दिया जाता है, वैसे ही चीनमें हुआ होगा । रेड इडियनोंकी एवं इथियोपिक भाषाओंको बहुसंश्लेषणात्मक या बहुमिश्रात्मक कहा जा सकता है । अफ्रीकी भाषाओंको भी अनेकाक्षरात्मक ही कहा जा सकता है । इससे पता लगता है कि पहलकी भाषाएँ विभक्तियुक्त अनेकाक्षरात्मक थीं, बादमें एकाक्षरात्मक हुईं । अतः प्रतीत होता है कि संस्कृत भाषा ही आदिम भाषा है और उसका अपभ्रंश अन्यान्य भाषाएँ हैं। संश्लेषणात्मक एवं विभक्तियुक्त भाषाएँ प्राचीन हैं और विश्लेषणात्मक या एकाक्षरात्मक भाषाएँ नवीन हैं। आर्य, सेमिटिक और पुरानी भाषाएँ एक ही परिवारकी हैं । इनमें भेद भी है और वह भेद बहुत पुराना भी हो सकता है । जब सबके मूल पुरुष एक थे, तब आदि ज्ञान एवं आदि भाषाका भी रूप एक ही होना चाहिये । मा० स० १४-