मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 226, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंसरल और संकुचित करके उच्चारणकी दृष्टिसे अन्य भाषाएँ बनी हैं । जैसे 'ऋत' को 'राइट', 'उष्ट्र' को 'ऊन्तर', 'स्थान' को 'स्तान,' 'घनी' को 'गनी,' 'विधवा' को 'विडो,' 'गृभ' को 'ग्रिफ्ट,' 'भ्रातर' का 'ब्रदर,' 'मातर' का 'मदर', 'पितर' का 'फादर', संस्कृत एवं जेन्दमें 'असुर'को 'अहुर,' 'सोम' को 'होम,' 'सप्त' को 'हफ्त,' 'आहुति' को 'आज़ुति,' 'वाहू' को 'वाजू,' 'पशु' को 'पसू,' 'उक्षन्' को 'आक्स' तथा संस्कृत एवं फ़ारसीमें 'तनु' को 'तन', 'जानु' को 'जानु,' 'बाहु' को 'बाज़ू,' 'अंगुष्ठ' को 'अंगुस्त,' 'हस्त' को 'हस्त,' 'पाद' को 'पा', 'शिर'को 'सर' कहते हैं । संस्कृत और यूनानीमें 'गते' को 'केटन,' 'दश' को 'डेक,' 'अश्मन' को 'अकमन्' कहते हैं । संस्कृत और मिस्रीमें 'अथ' वो 'अख,' 'आप' को 'आप' कहते हैं । संस्कृत और अरबीमें 'हर्म्य' को 'हरम्' 'सुर' को 'हुर' कहते हैं । संस्कृत और अफ्रीकीमें 'ध्यान' को 'बानी', 'कर्त्त' को 'काटा' कहते हैं । संस्कृत और चीनीमें 'स्थान' को 'तान,' 'जन'को 'जिन', 'अम्बा' को 'माँ,' 'होम' को 'ह्योम' कहते हैं । संस्कृत एवं जापानीमें 'का' को 'का,' 'बहुत्व' को 'मोत्तो' आदि कहते हैं । संस्कृत और द्रविड़में 'तालु' को 'तला', 'मजु' को 'मछी,' 'मेष' को 'मेक,' 'राजा' को 'राजू' कहते हैं । इस तरह इन उदाहरणोंसे यह सिद्ध होता है कि उच्चारणमें असावधानीसे ही अनेक भाषाएँ बनी हैं । संस्कृतमें, विशेषतः वेदमें उच्चारणकी सावधानी बहुत ही आवश्यक होती है । स्वर एवं वर्णसे हीन मन्त्रका प्रयोग मिथ्या प्रयोग कहा जाता है । वह जिस अर्थके लिये प्रयुक्त हुआ है, उसका बोध नहीं कराता । इतना ही नहीं, वह वाग्वज्र बनकर यजमानका नाश कर देता है । जैसा कि—'इन्द्रशत्रो विवर्द्धस्व' में स्वरके दोषसे अर्थात् अन्तोदात्तके स्थानमें आद्युदात्तका प्रयोग करनेसे तत्पुरुष समासके अनुसार इन्द्रका शत्रु अर्थात् घातक अर्थ नही हुआ, अपितु बहुव्रीहि समासके अनुसार 'इन्द्र है घातक जिसका' ऐसा अर्थ हुआ । इस स्वरापराधसे यजमान वृत्र मारा गया । वैदिक- लौकिक दोनों ही प्रकारके व्याकरण वैदिक-लौकिक संस्कृत भाषाको बिगड़ने नहीं देते । वैदिक भाषाकी लिपि भी प्राचीन ही है और उसी आधारपर लिपि भी यन्त्र आदिके काम आती है । अब बहुत-से प्राचीन लेख मिल रहे हैं । ब्राह्मी लिपिके पहलेके कहे जानेवाले लेखोंमें कोई स्पष्ट लिपि नहीं । कितने ही शिलालेख तो काल्पनिक ही हैं । धातुपाठ, प्रत्यय, नियम, तीन वचन, आठ विभक्तियाँ, दस लकार, सन्धि-कौशल तथा स्वर-विज्ञानमें संस्कृत व्याकरणसे तुलना संसारका कोई भी व्याकरण नहीं कर सकता । इन सब प्रक्रियाओंका प्रयोग करनेसे शब्दोंके