मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वरूप अटल रहते हैं । उनमें अपभ्रंशका अवसर ( गुंजाइश ) नही रहता । यही कारण है कि लाखो वर्षोंका प्राचीन साहित्य एक ही ढगसे सर्वत्र उच्चरित और अवगत किया जा सकता है । कुछ लोग समझते हैं कि प्राकृत भाषाका सस्कार करके सस्कृत भाषा बनायी गयी है । जैसे किसी प्राकृत काष्ठ, पाषाणका संस्कार कर मलापनयन, अतिशयाधानद्वारा उससे विशिष्ट संस्थानकी वस्तुएँ बनायी जाती हैं । परतु वस्तुतः यहाँका संस्कार इस प्रकारका है कि जैसे मिश्रित ग्राह्य-अग्राह्य पदार्थोंमेसे गालिनी ( छलनी ) द्वारा अग्राह्य और ग्राह्यका पृथक्करण किया जाता है, इसे भी सस्कार ही कहा जाता है । इसी तरह मिश्रित साधु-असाधु शब्दोंमेसे व्याकरणके लक्षणों-सूत्रोंद्वारा असाधु शब्दोसे साधु शब्दोका विवेचन ही शब्दोका संस्कार है । इस तरह नित्य शब्दोमें भी संस्कारका व्यवहार होनेसे संस्कृतत्वका व्यवहार होता है । कहा जाता है कि भौतिक विज्ञानसे उत्पन्न भौतिक उन्नति अनिश्चित होती है । बड़े-बड़े विद्वान् बड़ी बुद्धिसे, साधनोंसे जो निश्चित करते हैं, कालान्तरमें उसका खण्डन हो जाता है । कारण यह है कि जितने सूक्ष्म तत्त्वोंसे मस्तिष्क बना होता है, उनसे भी अधिक सूक्ष्म पदार्थ ससारमें विद्यमान हैं । जैसे नेत्रकी दर्शन शक्तिसे भी दृश्य पदार्थ अधिक सूक्ष्म पाये जाते हैं, वैसे ही सोचनेवाले यन्त्र मस्तिष्कसे भी सूक्ष्म पदार्थ हो सकते हैं । इसीलिये विद्वान् थॉम्सनका कहना है कि 'ससारके जब छोटे रहस्य खुल जाते है, तब आगे बड़े रहस्य आ खड़े होते है । संसारके आश्चर्योंको विज्ञान कभी मिटा नहीं सकता, प्रत्युत उन्हे अगाध बना देता है ।' मनोविज्ञानके पण्डितोका कहना है कि 'किसी भी जीवन कार्यकी सगति भौतिक नियमोंसे अबतक स्पष्ट नहीं की जा सकी है । ऑसू निकलने, पसीना बहनेके छोटे-छोटे जीवन कार्य भी भौतिक तथा रासायनिक नियमोंसे स्पष्ट नही होते ।' एफ० सोडीका कहना है कि 'परस्पर दो पदार्थ क्यो आकर्षित होते हैं और क्यों जुदा होते हैं यह भी ज्ञात नही है । यही स्थिति अन्य विज्ञानोमे भी है । कल्पनाएँ बदलती रहती हैं ।' यहाँतक विकासवादके पक्षमें रखे जानेवाले तर्कोंपर विचार किया और सक्षेपमें अपने शास्त्रोका मत रखा । अब उन्हीपर कुछ विस्तारपूर्वक विचार करनेकी आवश्यकता है । मूल प्रश्न यही है कि सृष्टि जड़से हुई या चेतनसे ? पहले इसीपर विचार करना है— जड़ या चेतन ? जड़ ससार जड परमाणुओके एकत्रित होने या जड विद्युत्कणोंके संघर्ष अथवा प्रकृतिके हलचलमात्रका परिणाम नहीं है; किंतु अखण्ड सत्ता अखण्ड