भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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विकासवाद १९९ हिरण्यगर्भके मुख, बाहु, ऊरु एवं पादसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रकी उत्पत्ति हुई— एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् । इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ( मनु० श्लो० १२ । १२३ ) ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽजायत ॥ ( ऋग्वेद, १० । ९० । १२; यजु० ३१ । ११ ) मानवसृष्टिका मूलस्थान 'इसी तरह जब समस्त मनुष्य बंदरोंसे उत्पन्न हुए हैं, तब जहाँ-जहाँ बंदरोंका निवास है वहीं मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई और जब मनुष्योंकी उत्पत्ति वनमानुषोंसे हुई, तब वनमानुष जहाँ-जहाँ मिलते हैं वहाँ मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई । वनमानुष अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, मेडागास्कर, जावा आदिमें होते हैं । वहाँका निग्रोदल सभ्यतामें अबतक भी मनुष्य-समुदायसे पीछे है । उनमें कई जातियाँ और दल ऐसे हैं जो वनमानुषोंसे कुछ थोड़े उन्नत हैं।' वैसे विकासवादके खण्डनसे सब मत खण्डित हो ही जाते हैं । इसके अति- रिक्त एक ही स्थानमें सृष्टि होनेपर भी देश, काल, सम्पर्कसे उनमें भेद प्रतीत होने लगता है । बीजके बिना कोई भी पौधा तैयार नहीं हो सकता । समुद्रके टापुओंमें भी जबतक बीज नहीं पहुँचता, मिट्टीमें रस नहीं आता तबतक किसी तरहके पौधे उत्पन्न नहीं होते । कोई भी माली बीजोंसे पौधोंको ऐसी ही जगह तैयार करता है, जहाँ उसकी सुरक्षाके योग्य स्थान हो । आँधी, तूफान, जलप्लावन, अग्नि, भूकम्प आदिका उपद्रव जहाँ न रहा होगा, वहीं ईश्वरने मनुष्यादि सभी प्राणियोंको उत्पन्न किया होगा । कई लोग कहते हैं कि 'अमेरिकामें बंदर नहीं थे, अतः वहाँ मनुष्योंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती थी।' पहले यूरोपका भी जलवायु मनुष्यकी उत्पत्तिके अनुकूल नहीं था । विद्वान् अन्वेषकोंका कहना है कि 'स्तनधारी प्राणी एशियासे ही यूरोपमें आया है।' वार्न साहब तथा उनकी पुस्तकसे प्रभावित होकर लोकमान्य तिलकने उत्तरीध्रुवमें ही प्राणियोंकी सृष्टि मानी है । किंतु विद्वानोंका मत है कि 'उत्तरी ध्रुवमें प्रति साढ़े दस हजार वर्षमें भीषण हिमपात होता रहा है, अतः वहाँ सृष्टिका होना सर्वथा असम्भव है।' इंगलैंडके डा० एलेन्मनका कहना है कि 'मनुष्यकी खालपर ध्रुव-प्रदेशनिवासी पशुओंके समान लम्बे बाल नहीं हैं, इसलिये मनुष्य वहाँका प्राणी नहीं है । मनुष्यके शरीरपर पसीना निकलनेके लिये छोटे-छोटे रोम-छिद्र होते हैं, अतः यह अतिशीत प्रदेशका प्राणी नहीं है।' भूगोल- विशेषज्ञोंका यह भी कहना है कि 'उत्तरी ध्रुवमें वनस्पतियाँ नहीं होतीं, वहाँ मनुष्योंका