मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
विकासवाद १९९ हिरण्यगर्भके मुख, बाहु, ऊरु एवं पादसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रकी उत्पत्ति हुई— एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् । इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ( मनु० श्लो० १२ । १२३ ) ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽजायत ॥ ( ऋग्वेद, १० । ९० । १२; यजु० ३१ । ११ ) मानवसृष्टिका मूलस्थान 'इसी तरह जब समस्त मनुष्य बंदरोंसे उत्पन्न हुए हैं, तब जहाँ-जहाँ बंदरोंका निवास है वहीं मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई और जब मनुष्योंकी उत्पत्ति वनमानुषोंसे हुई, तब वनमानुष जहाँ-जहाँ मिलते हैं वहाँ मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई । वनमानुष अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, मेडागास्कर, जावा आदिमें होते हैं । वहाँका निग्रोदल सभ्यतामें अबतक भी मनुष्य-समुदायसे पीछे है । उनमें कई जातियाँ और दल ऐसे हैं जो वनमानुषोंसे कुछ थोड़े उन्नत हैं।' वैसे विकासवादके खण्डनसे सब मत खण्डित हो ही जाते हैं । इसके अति- रिक्त एक ही स्थानमें सृष्टि होनेपर भी देश, काल, सम्पर्कसे उनमें भेद प्रतीत होने लगता है । बीजके बिना कोई भी पौधा तैयार नहीं हो सकता । समुद्रके टापुओंमें भी जबतक बीज नहीं पहुँचता, मिट्टीमें रस नहीं आता तबतक किसी तरहके पौधे उत्पन्न नहीं होते । कोई भी माली बीजोंसे पौधोंको ऐसी ही जगह तैयार करता है, जहाँ उसकी सुरक्षाके योग्य स्थान हो । आँधी, तूफान, जलप्लावन, अग्नि, भूकम्प आदिका उपद्रव जहाँ न रहा होगा, वहीं ईश्वरने मनुष्यादि सभी प्राणियोंको उत्पन्न किया होगा । कई लोग कहते हैं कि 'अमेरिकामें बंदर नहीं थे, अतः वहाँ मनुष्योंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती थी।' पहले यूरोपका भी जलवायु मनुष्यकी उत्पत्तिके अनुकूल नहीं था । विद्वान् अन्वेषकोंका कहना है कि 'स्तनधारी प्राणी एशियासे ही यूरोपमें आया है।' वार्न साहब तथा उनकी पुस्तकसे प्रभावित होकर लोकमान्य तिलकने उत्तरीध्रुवमें ही प्राणियोंकी सृष्टि मानी है । किंतु विद्वानोंका मत है कि 'उत्तरी ध्रुवमें प्रति साढ़े दस हजार वर्षमें भीषण हिमपात होता रहा है, अतः वहाँ सृष्टिका होना सर्वथा असम्भव है।' इंगलैंडके डा० एलेन्मनका कहना है कि 'मनुष्यकी खालपर ध्रुव-प्रदेशनिवासी पशुओंके समान लम्बे बाल नहीं हैं, इसलिये मनुष्य वहाँका प्राणी नहीं है । मनुष्यके शरीरपर पसीना निकलनेके लिये छोटे-छोटे रोम-छिद्र होते हैं, अतः यह अतिशीत प्रदेशका प्राणी नहीं है।' भूगोल- विशेषज्ञोंका यह भी कहना है कि 'उत्तरी ध्रुवमें वनस्पतियाँ नहीं होतीं, वहाँ मनुष्योंका
जी सकना ही मुश्किल था।' अनेक विद्वान् एशियामें भी मनुष्योंकी उत्पत्ति मानते हैं। उनका कहना है कि 'पश्चिमोत्तर एशियामें ही मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई, वहाँ से भिन्न भिन्न श्रेणीके रूपमें लोग विभिन्न देशोंमें गये हैं।' मैक्समूलरने मध्य एशियामें और स्वामी दयानन्दजीने तिब्बतमें मनुष्योंकी उत्पत्ति मानी है। उमेशचन्द्र दत्तके मतानुसार मंगोलियामें मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है। अन्यान्य विद्वान् विभिन्न स्थान मानते हैं। संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, जेन्द आदि भाषाओंकी तुलना करनेपर भी अधिकांश विद्वान् इस निष्कर्षपर पहुँचे हैं कि इन भाषाओंके भाषी लोग कभी एक भाषा- भाषी रहे होंगे। जैसे-जैसे वे एक दूसरेसे दूर होते गये, वैसे-वैसे उनकी भाषामें कुछ भेद पडता गया। यद्यपि वे लोग इन भाषाओंको परस्पर भगिनी ही मानते हैं। उनकी जननी कोई अन्य भाषा रही होगी—ऐसी कल्पना करते हैं, तथापि संस्कृत भाषा ही सब भाषाओंकी जननी है—यह अधिक प्रमाणसिद्ध है। आज भी संसारमें सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद माना जाता है। मोहेनजोदड़ो, हड़प्पाकी खुदाईसे मिलनेवाली वस्तुओंसे भी वैदिक सभ्यताकी अतिप्राचीनता विदित होती है। 'वाचा विरूपनित्यया'—विरूप नित्य वेद लक्षण वाणीद्वारा आप सृष्टि करते हैं। इस वेद-वाक्यसे वेद अनादि सिद्ध होते हैं। मनु भी 'अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा'—स्वायम्भुवने अनादि-निधन-उत्पत्ति-नाशविवर्जित वेद लक्षण वाणीका उत्सर्ग किया; सम्प्रदायप्रवर्तन किया—इस वचनसे वेदको अनादि बतलाते हैं। अतः सर्व प्राचीन भाषा संस्कृत भाषा ही सिद्ध होती है। उससे ही अन्य भाषाओंका उद्गम हुआ है। उन अनादि अपौरुषेय वेदों, मनुस्मृति, चरक आदि ग्रन्थोंसे मालूम पडता है कि सप्तद्वीपा मेदिनीमे जम्बूद्वीप श्रेष्ठ है और जम्बूद्वीपमे भी भारतवर्ष ही सर्वोत्कृष्ट है। चतुर्दश भुवनोंमे पृथ्वी और पृथ्वीमे भारतवर्ष विराट् पुरुषका हृदय-स्वरूप है। इसीमे आर्यावर्त्त, ब्रह्मावर्त्त एव हिमालय हैं। इसीमें साङ्गोपाङ्ग सभी ऋतुओंका विकास होता है। इसीमें सभी रंगके मनुष्य भी मिलते हैं, अतः यहीं मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है— तेषां कुरुक्षेत्रं देवयजनमास। तस्मादाहुः कुरुक्षेत्रं वै देवानां देवयजनम्। ( शतपथ ) यदनु कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनम्। ( रामोत्तरतापि० १ । १, तारसार० २ ) डॉक्टर ई० आ० एलंसका 'मेडिकल' पुस्तकमें कहना है कि 'हिमालयमें वनस्पति, घास खूब होते हैं, अतः गाय, भैंस, बकरी, हाथी, कुत्ता आदि जानवर और मनुष्यका भी वहाँ होना सङ्गत है। हिमालयमें प्राणियोंके बहुत पुराने शेषांश मिलते हैं।' भाषाशास्त्री टेलर स्वर्गतुल्य काश्मीरको मनुष्य-जातिकी जन्मभूमि
विकासवाद २०१ कहते हैं । पुरातत्त्वके विद्वान् अविनाशचन्द्र दासकी ‘ऋग्वेदिक इंडिया’में कहा गया है कि 'आर्योंका आदिदेश काश्मीर ही है ।' उत्तरप्रदेशके मुख्य मन्त्री श्रीसम्पूर्णानन्दने अपनी 'आर्योंका आदिदेश भारत' पुस्तकमें भारतको ही आर्योंकी जन्मभूमि माना है । पाश्चात्त्य लोग गोरे, लम्बे, बड़े सिरवाले भारत, ईरान, योरोपवासियोंको आर्य कहते हैं । परंतु भारतीय कहते हैं कि 'जो रूप-रंग, आकृति- प्रकृति, धर्म-कर्म, ज्ञान-विज्ञान, आचार-विचार तथा शीलमें सर्वश्रेष्ठ है, वही आर्य है— कर्तव्यमाचरन् काममकर्तव्यमनाचरन् । तिष्ठति प्रकृताचारे यः स आर्य इति स्मृतः ॥ ( वशिष्ठ-स्मृति ) न वैरमुद्दीपयति प्रशान्तं न दर्पमारोहति नास्तमेति । न दुर्गतोऽस्मीति करोत्यकार्यं तमार्यशीलं परमाहुरार्याः ॥ न स्वे सुखे वै कुरुते प्रहर्षं नान्यस्य दुःखे भवति प्र
२०२ मार्क्सवाद और रामराज्य इन वचनोंसे भी हिमालयपर ब्राह्मणादि आर्योंकी उत्पत्ति सिद्ध की जाती है । ‘शतपथ’के ‘तदप्येतदुत्तरस्य गिरेः मनोरपसर्पणम्’ ( १ । २ । १ । ६ ) इससे हिमालयपर ही मनुका जलप्लावन सिद्ध किया जाता है। महाभारतके— ‘अस्मिन् हिमवतः शृङ्गे नावं बध्नीत माचिरम् ।’ ( महा० वनपर्व १८७ । ४९ ) इस वचनसे हिमालयके शृङ्गमें जलप्लावनके समय नावका बाँधना सिद्ध होता है । कहा जाता है कि हिमालयके मानस स्थानपर मानसी सृष्टि हुई है, इसीलिये उसका नाम मानस पड़ा है । कुछ भी हो, हर दृष्टिसे एशिया एवं तदन्तर्गत भारतमें ही मनुष्यकी सृष्टि सिद्ध होती है । वैवस्वतमनुको हुए अबतक ( संवत् २०१३ में ) १२ करोड़ ५ लाख ३३ हजार तीस वर्ष होते हैं, परंतु सृष्टि उनसे भी पहलेकी है, अतएव सृष्टिको हुए १ अरब ९५ करोड़ ५८ लाख ८५ हजार ५७ वर्ष माने जाते हैं । ब्रह्माके एक दिनमें १४ मनु बीतते हैं, जिसमें कि ४ अरब ३२ करोड वर्ष होते हैं। १५ खरब ५५ अरब २० करोड़ मानव-वर्षका उनका एक वर्ष होता है । अबतक ब्रह्माके ५० वर्ष बीत चुके हैं, जिसमें ७ नील ७७ खर्ब ६० अरब वर्ष बीत गये । इस तरहके १०० वर्षोंकी ब्रह्माकी आयु होती है । विष्णु एवं शिवका कालमान इससे भी बड़ा है । विकासवादी प्रायः प्राचीन वस्तुओंकी खोजसे अनुमान करते हैं कि 'मनुष्य पहले बहुत जंगली हालतमें था, क्योंकि भूमिकी सबसे नीचेकी तहोंमें मनुष्योंके बनाये जो पदार्थ मिले हैं, वे पाषाण-सींग आदिके ही बने हुए हैं। इससे मालूम होता है कि तत्कालीन मनुष्योंको धातुओंका ज्ञान नहीं था । ऊपरी तहोंमें धातु- निर्मित शस्त्र मिलते हैं। इससे मालूम होता है कि उस समयके लोग पिछले लोगोंसे कुछ उन्नत तथा सभ्य थे । परंतु यह बात असत्य है, क्योंकि अबतक जहाँ-जहाँ खुदाई हुई है, वहाँ-वहाँ एक ही गहराईपर दोनो ही प्रकारके तथा- कथित उन्नत एवं अवनत शस्त्र मिलते हैं । इससे यह सिद्ध होता है कि एक ही समयमें दोनों ही प्रकारकी अवस्थाएँ थीं। आज भी भिन्न-भिन्न ढगकी अवस्थाएँ होती हैं । लोकमान्य तिलकने 'आर्योंका उत्तरी-ध्रुव-निवास'में लिखा है कि 'यूरोपमें अनेक जगह प्राचीन छावनियों, किलोंकी दीवालो, स्मशानों, देवालयों, जलाशयोंके खोदनेसे पत्थर तथा धातुके हजारों शस्त्र मिलते हैं। इनमेंसे कितने ही स्वच्छ किये हुए, घुटे हुए और कितने ही अस्वच्छ एवं भद्दे हैं। पुरातत्त्व- वेत्ताओंने इनके तीन विभाग किये हैं। पहले 'पाषाणशस्त्र, जिनमें सींग, काष्ठ एवं हड्डियोंके शस्त्रोंका भी समावेश है। दूसरेमें काँसेके शस्त्र और तीसरेमें लोहेके शस्त्र माने गये हैं।' परंतु इससे यह समझना भूल है कि एककी समाप्तिपर
विकासवाद २०३ दूसरेका आरम्भ हुआ है। इस तरह तो ताँवे और राँगेसे काँसा बनता है, अतः एक ताम्रयुग भी मानना पड़ेगा; किंतु ताम्र-युगका पता नहीं चलता। वस्तुस्थिति तो यह है कि जिस समय यूरोपके लोग पाषाणयुगकी भूमिका- में थे, उसी समय ईसवी सन्से ६ हजार वर्ष पूर्व मिस्रवासी उच्चतम सभ्यता प्राप्त कर चुके थे। इसी तरह जिस समय यूनानी लोग 'लौह-युग' में थे, उस समयतक इटालियन 'काँस्य युग'में ही थे। यूरोपके पश्चिमी भागके लोग तो उस समय पाषाणयुगमें ही थे। इससे पाषाणादि युगोंकी कल्पना ही निराधार है। जैसे आज बैलगाड़ी और वायुयान दोनों ही हैं, वैसे ही उन्नत-अवनत सभी प्रकारके साधन सदा ही मिलते हैं। किसीने एक ही जगह एक आधुनिक घड़ी और जंगली मनुष्योंकी चकमक पथरी पायी। घड़ी जंगलके अफसरकी थी और चकमक जंगलीका था। यदि यही चीजें दब जातीं और कालान्तरमें मिलतीं तो इनसे यही अनुमान करना पड़ता कि सभ्यता और जंगलीपन दोनों साथ थे। फिर 'ज्ञानका धीरे धीरे विकास हुआ' यह कथन कैसे सत्य माना जा सकता है ? पत्थरोंसे लोहा-ताँबा निकालना भी तो सामान्य बात नहीं। जिसको धातु विश्लेषणकी शिक्षा मिलती है वही यह कार्य कर सकता है। अतः जिसे लोह युग, जंगली युग नहीं कहा जा सकता ऐसे हरप्पा और मोहनजोदड़ोके खँडहरोंमें जहाँ सभ्यताके चिह्न मिलते हैं, वहीं पत्थरके शस्त्र—जंगलीपनके चिह्न भी मिलते हैं। इस तरह भूगर्भकी जाँचसे यह नहीं सिद्ध होता कि ज्ञानकी क्रमसे उन्नति हुई है। पीछे कहा जा चुका है कि एक जगहके धरातलमें जिस कालके पाषाण- शस्त्र मिलते हैं, उसी कालके दूसरे देशके धरातलमें पूर्ण सभ्यताके पदार्थ मिलते हैं। आज भी जो पढ़ता-लिखता है, सभ्य होता है, उसके पड़ोसमें बिना पढ़े- लिखे जंगली-जैसे लोग भी रहते हैं। बड़े बड़े विद्वानोंके पुत्र-पौत्र मूर्ख निकलते हे। अतः ज्ञानके क्रमिक विकासका पक्ष गलत है ? जान्स वोसनने १९२३ के 'न्यू एज' में लिखा है कि 'यदि मनुष्य-जातिका इतिहास उत्तरोत्तर विकासकी ओर है तो क्यों चानो लोग ईसवी संवत्के पूर्व बारूद और कपास काममें लेते थे, परंतु पीछे चलकर वे उसे भूल गये ? इसी तरह मिस्रमें पिरामिड बननेके समय वहाँके लोग रेखागणितकी चरम सीमापर पहुँचे थे, पर पीछे उन्हें वह विद्या भूल गयी।' दिल्लीकी लोहेकी लाट भारतमें ही बनी, पर क्या आज यूरोप भी वैसा बना सकता है ? इसलिये कहना पड़ता है कि संसारमें हास, विकास दोनों चलते रहते हैं। दीपकके पास पतंग आता है, आँच लगती है, भागता है, फिर आता है, बादमें कूदकर दीपकपर जल जाता है। यदि ज्ञानका विकास होता तो अनुभवसे
२०४ मार्क्सवाद और रामराज्य पतंगोंको सबक सीखना था और दीपकके पास जाना बन्द करना था । परन्तु ऐसा नहीं देखा जाता, अतः यही कहना पड़ेगा कि जहाँ ज्ञान-शिक्षाकी परम्परा कायम रहती है, वहाँ ज्ञान रहता है और जहाँ परम्परा टूट जाती है वहाँ नष्ट हो जाता है । इसीलिये बिना सीखे ज्ञान नहीं होता । सृष्टिके आदिमें परमेश्वरसे ज्ञान प्राप्त होता है और अब भी पूर्वजों, अध्यापकों, आचार्योंसे ही ज्ञान सीखा जाता है । डिस्कार्टेका कहना है कि 'ईश्वरसम्बन्धी ज्ञान मनुष्यके हृदयमें स्वतः उत्पन्न नहीं होता; क्योकि वह अनन्त है। 'मैडम ब्लवेट्स्कीने 'सिक्रेट डॉक्ट्रिन'में लिखा है कि "कोई नवीन धर्मका प्रवर्तक नहीं हुआ। 'आर्यों, सेमिटिको, तुरानियो- ने नया धर्म, नयी सभ्यताका आविष्कार किया था,' इसका मतलब यही है कि वे धर्मके पुनरुद्धारक थे, मूल शिक्षक नहीं।"
भाषा-विज्ञान
ज्ञानके लिये भाषा भी अपेक्षित होती है; क्योंकि ऐसा कोई भी ज्ञान नहीं होता, जिसमें सूक्ष्म शब्दका अनुवेध न हो । भाषा भी सीखकर ही बोली जाती है । माता तथा कुटुम्बियोंकी बोलचाल सुनकर ही प्राणी बोलता है । स्वतन्त्रतासे कोई नयी भाषा बना भी नहीं सकता है । कहते हैं कि गूँगे बहरे भी होते हैं । वे सुन नहीं सकते, इसीलिये बोल भी नहीं सकते । परन्तु उनके मुँहमें बोलनेके साधन होते हैं । इसीलिये यन्त्रोंद्वारा उनसे बुलवाया जाता है । बिना सिखलाये कोई बोल नहीं सकता । गूँगा दूसरोंको मुँह फैलाकर बोलते देखकर वैसी नकल करता है। कहा जाता है कि भेड़ियेकी माँदसे निकले हुए मनुष्योंके बच्चे भेड़ियो- जैसा ही बोलते हैं। गूँगे और इन बच्चोंसे अ, इ, उ, ए, ओ के अतिरिक्त ककारादि वर्णमालाके अक्षर उच्चरित नहीं होते । यदि गूँगा अधा भी हो तो अ, इ आदिका भी उच्चारण नहीं कर सकता । प्रो० मैक्समूलरने 'भाषा-विज्ञान' (साइन्स ऑफ दि लैग्वेज) में लिखा है कि 'मिस्रके बादशाह सामिटकरने सद्यःप्रसूत दो बालकोंको गडरियोंके सुपुर्द करके यह प्रबन्ध किया कि उन्हें पशुओंके अतिरिक्त किसीकी भाषा सुननेको न मिले । उन लड़कोंके बड़े होनेपर देखा गया कि वे अ, इ, उ के सिवा कुछ भी बोल नही सकते थे।' इसी प्रकार द्वितीय फ्रेडरिक, चतुर्थ जेम्स, अकबर आदिने भी परीक्षा की थी । निष्कर्ष यही निकला कि मनुष्य बिना सिखाये भाषा सीख नहीं सकता । भाषा-विज्ञानके आधुनिक विद्वान् मनुष्य सृष्टिके साथ ईश्वरद्वारा भाषाका प्रादुर्भाव नहीं मानते । उनके अनुसार पहले हस्तसंकेत आदिद्वारा ही व्यवहार होता था। बादमें व्यवहारके लिये बुद्धिपूर्वक मनुष्योंने भाषा बनायी । विचारों और भाषाओंका अटूट सम्बन्ध होता है ।
, above it is a repha (curve open to the right) and a dot (anusvara). There is no diagonal stroke to the left. Wait, look at line 18: Wait, in line 18, above the bar there is also a repha and a dot, no diagonal stroke! Wait, look at line 31: "अन्यत्रसे वर्णांका उच्चारण" - also repha and dot! Wait! Why would all three have no diagonal stroke, but line 30 "वर्णोंकी" has it? Because in "वर्णोंकी", it's an 'ी' matra? No, "वर्णों" has 'ो' and then 'की'! Wait, in line 30: "वर्णोंकी" has 'ो' clearly! Why do lines 18, 22, 31 look like that? Wait, could it be that the font has a ligature where the diagonal stroke of 'ो' and the repha overlap, or the diagonal stroke was completely missing from the font's [र् + ो + ं + ा] sort? Yes, in old Hindi printing, the sort for "र् + ो + ं" sometimes just had the repha and bindu, or it's a known defect of that typecase. Wait, let's look at "वर्णांका" vs "वर्णोंका": Wait, is it "वर्णांका" or "वर्णोंका"? Wait, look at line 22 again:
२०६ मार्क्सवाद और रामराज्य टन्'का अनुकरण भी नहीं करते। यह विभिन्न वर्णोंके उच्चारण सीखे बिना कभी आ ही नहीं सकता। बाह्य अव्यक्त शब्दोंमें वर्ण नहीं होते, इसीलिये मुर्गेकी बोलीमें हम 'कुकड़ूकूँ' की कल्पना करते हैं। अंग्रेज लोग इसीको 'कॉक ए डू डिल् डू' कहते हैं। इसी प्रकार हर्ष, शोक आदिसे 'हाय, हा-हा' आदि शब्द भी उन्हींके मुखसे निकल सकते हैं, जिन्होंने वर्णोंका उच्चारण सीख रखा है। पशुओ और गूँगोके मुखसे 'हा-हा' 'हाय-हाय' आदिका उच्चारण नहीं बनता है। बोलनेवालेका सम्पर्क हुए बिना किसी दुधमुँहे बच्चेके मुँहसे क, ख, ग, घ आदि वर्णमालाका उच्चारण नहीं हो सकता। आधुनिक लोग भी जब यह मानते हैं कि मनुष्यमें ही स्पष्ट शब्द उच्चारणकी शक्ति है, अन्यमें नहीं, तब यह गुण जब इसके पूर्वजोमें नहीं था, तब इसमें क्यों और कैसे आ गया ? कुछ लोग कहते है कि 'ईश्वरने ही मनुष्यके मुखमें वर्णोंके उच्चारणकी शक्ति दी है।' तब फिर यह भी क्यो नहीं माना जाता कि ईश्वरने ही मनुष्यको भाषा सिखायी ? जब पशु मनुष्यकी बोली नहीं बोलता, तब मनुष्य ही पशुकी बोलीकी नकल करके भाषा बोलना कैसे सीख गया ? मैक्समूलरका कहना है कि 'मनुष्यकी भाषा ध्वनि अथवा पशुओकी बोलीसे नहीं बनी।' लॉक एडम, स्मिथ एवं डयूगल्ड स्टुवर्ट आदि कहते हैं कि 'मनुष्य बहुत कालतक गूँगा रहा, संकेतोंसे, भ्रूक्षेपसे वह काम चलाता रहा। जब काम न चला, तब परस्पर संवाद करके शब्दोंके अर्थ नियत करके भाषा बना ली।' इसके उत्तरमें मैक्समूलरने लिखा है कि “मैं नहीं समझता कि भाषाके बिना उनमें सवाद कैसे जारी रह सका ? क्या अर्थ नियत करनेके पूर्व संवाद निरर्थक ही चला आता था ? जबतक उनके पास कोई सार्थक ध्वनि नहीं थी, तबतक 'अमुक शब्दका अमुक अर्थ है' यह नियत करना कैसे सम्भव था ? एकने दूसरेसे कैसे कहा कि रोटीको चूँ-चूँ कहना और समझना चाहिये' और कैसे दूसरोने ये सब बाते समझ ली ? अतः ज्ञानके बिना भाषा नहीं बन सकती और भाषाके बिना ज्ञान नहीं बन सकता ।” नाम-नामीका घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। ऐसी दशामें यही तथ्य उपलब्ध होता है कि आदिम मनुष्य ज्ञान और भाषाके सहित उत्पन्न हुआ है। इसपर भी विचार करनेसे मालूम पड़ता है कि जब ज्ञान और भाषा दोनों- हीके लिये शिक्षा अपेक्षित है, तब बिना शिक्षाके ज्ञान और भाषा कैसे उत्पन्न हुई ? अतः अन्तिम सिद्धान्त यह मानना ही पडता है कि परमेश्वरने ही मनुष्यको निर्मित करके उसे ज्ञान और भाषा प्रदान की। वेदोंसे भी यही स्पष्ट मालूम पड़ता है कि परमेश्वरने ब्रह्माको उत्पन्न करके उन्हे वेद प्रदान किया—
विकासवाद २०७ यो वै ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । ( श्वेताश्वतर ० ६ । १८ ) ब्रह्मा ने अपने पुत्रों को और उन्होंने इसी तरह अपने पुत्रों और शिष्यों को आदिम भाषा और ज्ञान का उपदेश किया । आगे चलकर ज्ञान और भाषा में अपभ्रंश भी होता गया । यह पीछे कहा जा चुका है कि कोई भी बोध या ज्ञान ऐसा नहीं होता, जिसमें सूक्ष्म शब्द का सम्बन्ध न हो । फिर इस दृष्टि से अनादि ईश्वर के अनादि ज्ञान में जो शब्द अनुविद्ध थे, वही अनादि भाषा थी । कोई भी कार्य ज्ञान, चिकीर्षा एवं कृतिपूर्वक ही सम्पन्न होता है । इस तरह सृष्टि कार्य में भी ईश्वर की मति, चिकीर्षा और कृति अपेक्षित ही है । उस अनादि ज्ञान में अनुविद्ध अनादि शब्द- समूह का होना अनिवार्य है । जब संस्कृत भाषा एवं वेद से पुरानी पुस्तक संसार में उपलब्ध नहीं है, इसकी अतिप्राचीनता तर्कों से भी सिद्ध होती है, तब मनु आदिके अनुसार उसे ही अनादि भाषा मानना युक्त है । उसके व्यापक धातुओं से संसार की सभी भाषाएँ निष्पन्न भी हो ही जाती हैं । अतः 'ईश्वर ने आदिम प्राणियों को भाषा एवं विज्ञान सिखलाया' यही पक्ष ठीक है। जैसे आजकल हिप्नोटिज्म करनेवाला अपने माध्यम (सब्जेक्ट) के मुँह से मानसिक प्रेरणा द्वारा ऐसी भाषाओं के शब्द उच्चारण करा देता है, जिसको माध्यम ने कभी सुना भी नहीं, वैसे ही सर्वशक्तिमान् परमेश्वर भी मनुष्यों को अपनी शक्ति द्वारा शब्दोच्चारण करा सकता है । इसीलिये आदिम मनुष्य परम ज्ञानवान् थे—यही पक्ष श्रेष्ठ है। सुकरात के मतानुसार भी कोई किसी को नया ज्ञान नहीं सिखलाता, अपितु भूले हुए ज्ञान को याद दिलाता है । जिसमें ज्ञान-शक्ति नहीं, उसे ज्ञान कराया नहीं जा सकता, जैसे—पाषाणों को ज्ञान कराना असम्भव है । अतएव कोलब्रुक के मता- नुसार भी भाषा मनुष्य का एक आत्मिक साधन है । आर० सी ट्रेनिचने 'शब्दों का अध्ययन' (स्टडी ऑफ वर्डस्) में कहा है कि 'ईश्वर ने मनुष्य को वाणी उसी प्रकार दी, जिस प्रकार बुद्धि दी, क्योंकि मनुष्य का विचार ही शब्द है, जो बाहर प्रकाशित होता है ।' मैक्समूलर का कहना है कि 'भिन्न-भिन्न भाषा परिवारों में जो चार-पाँच सौ धातु मूल तत्त्वरूप शेष रह जाते हैं, वे न तो मनोराग-व्यंजक ध्वनियाँ ही हैं और न अनुकरणात्मक शब्द ही । हम उनको वर्णात्मक शब्दों का साँचा कह सकते हैं ।' प्लेटो के साथ हम कह सकते हैं कि 'वे स्वभाव से ही विद्यमान हैं ।' वैदिकों का तो स्पष्ट कहना है कि अनादि-निधन, सच्चिदानन्द ब्रह्म ही शब्द ब्रह्म है, उसी से विश्व की प्रक्रिया चलती है । अनन्त सदानन्द का ही प्रकाशविशेष अर्थ है । अनन्त चित् या अखण्ड बोध की ही अभिव्यक्ति-विशेष शब्द है । दोनों एक सच्चिदानन्द के प्रकाश हैं, अतएव दोनों में विषय-विषयी भाव होते हुए भी अभेद है । इसीलिये कोई बोध बिना सूक्ष्म शब्द के नहीं होता । शब्द और अर्थका मीमांसकों के मतसे
औत्पत्तिक (स्वाभाविक) सम्बन्ध है। घटत्वादि जाति शब्दका शक्य होता है, अतः शब्दके समान ही अर्थ भी नित्य ही है- 'औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः' (पू० मी०) नैयायिक लोग शब्द और अर्थके सम्बन्धरूप संकेतको औत्पत्तिक, अकृत्रिम नही मानते, किंतु संकेतको पौरुषेय मानते हैं। परंतु जीव पुरुषके द्वारा नही, अपितु ईश्वरसे संकेतका होना मानते हैं। 'अमुक शब्दसे अमुक अर्थको समझना चाहिये,' इस प्रकार ईश्वर ही आदिम ऋषियोंको उपदेश करता है। इसपर मीमांसकोंकी आपत्ति यह है कि "ईश्वर जिन शब्दोंसे ऋषियोंको शब्दार्थ-सम्बन्ध बतलाता है, उन शब्दो और अर्थोंका सम्बन्ध यदि उससे पहले ऋषियोंको ज्ञात नहीं है, तो वे समझ कैसे सकते ? यदि कहा जाय कि 'हस्त, मुख, भ्रूक्षेप आदि इशारोसे ईश्वर संकेत ग्रहण करायेगा' तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि पहले तो ईश्वर निराकार है, उसका हस्त, भ्रूक्षेप आदि संकेत कैसे सम्भव होगा ? यदि लीला- शक्तिसे उसे साकार भी माने, तो भी अल्पज्ञ प्राणियोंको सब संकेतों, इशारोका बोध भी कितना कठिन है ? इसके अतिरिक्त, जितने असंख्यात शब्द और अर्थ हैं, उतने संकेत इशारोसे हो सकना भी सम्भव नहीं। हस्त, मुख, भ्रू आदिके विक्षेप सीमित हैं। परंतु शब्द और अर्थ अपार समुद्रतुल्य हैं - इन्द्रादयोऽपि यस्यान्तं न ययुः शब्दवारिधेः । यदि ईश्वर शब्दोंके द्वारा संकेत (शब्दार्थ-सम्बन्ध) को बोधित करे कि अमुक शब्दसे अमुक अर्थको समझना चाहिये, तो यह मानना ही पड़ेगा कि जिन शब्दोंके द्वारा वह बोध कराता है, उनका स्वार्थ सम्बन्धरूप संकेत प्रतिपादयिता और प्रतिपत्ता दोनोंको ही विदित होना चाहिये। इस दृष्टिसे नव- नवोत्पन्न अर्थों और अपभ्रंश शब्दोंका सम्बन्ध भले ही मनुष्यकृत हो, परंतु जिन गो आदि शब्दों एव सास्नादिमत् व्यक्ति आदि अर्थोंके सम्बन्ध अनादि वृद्ध व्यवहारमे प्रचलित है, उनका संकेत अकृत्रिम एवं औत्पत्तिक ही मानना उचित है। सुस्पष्ट है कि घटादि कार्य सशरीर व्यक्तियोंसे निर्मित होते हैं, परंतु अंकुरादि कार्य अशरीरसे निर्मित मान्य होते हैं। सर्वसाधारण मनुष्य शरीर माता पितासे उत्पन्न होते हैं, परंतु सृष्टिके प्रारम्भके शरीरको अशरीरसे निर्मित ही मानना पडता है। प्रथम साकार वस्तुको निराकारद्वारा निर्मित मानना पडता है। जैसे गन्धवती पृथिवी निर्गन्ध जलका, सरस जल नीरस तेजका, स्पर्शवान् वायु निःस्पर्श आकाशका कार्य है, वैसे ही कुछ शब्दार्थ सम्बन्ध कृत्रिम होनेपर भी आदिम शब्दार्थ अकृत्रिम ही हैं। सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके द्वारा ब्रह्माको और ब्रह्माद्वारा, वशिष्ठादि ऋषियोको उपदेश किया जाता है। बीज अंकुर, दिन-रात, निद्रा-प्रबोध और जन्म मरणके समान ही सृष्टि एव संहारकी भी अनादि परम्परा है। तथा च जैसे प्रबुद्ध व्यक्तिको निद्राके पूर्वकी बातोंका स्मरण रहता है, वैसे ही सुप्त-प्रतिबुद्ध न्यायसे विशिष्ट ऋषियोंको प्रथमकल्पीय कुछ शब्दार्थ सम्बन्धो एवं कुछ मन्त्रोंका भी स्मरण होता है।
ऐसे ही आर्ष मन्त्रद्रष्टा होते हैं । आवट्य महर्षिको पिछले दस महाकल्पोंका स्मरण था— दशसु महासर्गेषु पुनःपुनरुत्पद्यमानेन मया यत्किंचिदनुभूतं तत्सर्वं दुःखमेव (योगभाष्य ३।१८) पूर्वमीमांसक तो खण्ड प्रलय ही मानते हैं, महाप्रलय नहीं, अतः कहीं-न कहीं सृष्टिका क्रम जारी रहता है । यह जगत् सदा ऐसा ही रहता है (न कदाचिदनीदृशं जगत्) । अतः हम जैसे अपने गुरुसे ही वेदाध्ययन करते हैं, वैसे ही पूर्वके गुरुओंने भी अपने-अपने गुरुओंसे वेदाध्ययन किया है । यह परम्परा बीजाङ्कुर परम्पराके तुल्य अनादि है— वेदस्याध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम् । वेदाध्ययनसामान्यादधुनाध्ययनं यथा ॥ जिन उत्तरमीमांसकोंके मतमें महाप्रलय होता है, उनके यहाँ भी प्रलयकालमें मूल गुरु परमेश्वरमें वेद विद्यमान रहते हैं । सृष्टिके आरम्भमें ईश्वर, वेद या शब्दार्थ सम्बन्धका निर्माण नहीं करते, किंतु नित्य सिद्धका उपदेश करके सम्प्रदाय प्रवर्तन करते हैं । यह भी कहा जाता है कि प्रथम एकाक्षरात्मक वर्ण नहीं थे, वाक्योद्वारा ही चिन्तन या विचार चलता है, अतः प्रारम्भमें वाक्यात्मक ही शब्द थे । जिससे पूर्ण- भावकी व्यक्ति हो वही वाक्य है, भले वह ‘चल’ ‘ॐ’ आदिकी तरह अनेकाक्षर हों चाहे अनेक शब्दाके हों । विकासवादी भाषाके सम्बन्धमें भी विकासका सिद्धान्त मानते हैं। अयोगात्मक भाषा चीनियोंकी मानी जाती है, उसमें प्रकृति-प्रत्ययका भेद नहीं होता । योगात्मक भाषा तुर्की है, जिसमें प्रकृति-प्रत्यय स्पष्ट रहते हैं । विभक्तियुक्त भाषा संस्कृत है । इनमें भी विकासवादी क्रमिक विकास मानते हैं । आधुनिक अनुसंधानोंसे पता लगा है कि चीनी भाषा सदा ही ऐसी नहीं थी । उसमें पहले अनेकाक्षरके शब्द होते थे । ह्रासके कारण एकाक्षरके शब्द हो गये । जैसे मुखका ‘मुंह’, कभी ‘मूं’ भी कह दिया जाता है, वैसे ही चीनमें हुआ होगा । रेड इडियनोंकी एवं इथियोपिक भाषाओंको बहुसंश्लेषणात्मक या बहुमिश्रात्मक कहा जा सकता है । अफ्रीकी भाषाओंको भी अनेकाक्षरात्मक ही कहा जा सकता है । इससे पता लगता है कि पहलकी भाषाएँ विभक्तियुक्त अनेकाक्षरात्मक थीं, बादमें एकाक्षरात्मक हुईं । अतः प्रतीत होता है कि संस्कृत भाषा ही आदिम भाषा है और उसका अपभ्रंश अन्यान्य भाषाएँ हैं। संश्लेषणात्मक एवं विभक्तियुक्त भाषाएँ प्राचीन हैं और विश्लेषणात्मक या एकाक्षरात्मक भाषाएँ नवीन हैं। आर्य, सेमिटिक और पुरानी भाषाएँ एक ही परिवारकी हैं । इनमें भेद भी है और वह भेद बहुत पुराना भी हो सकता है । जब सबके मूल पुरुष एक थे, तब आदि ज्ञान एवं आदि भाषाका भी रूप एक ही होना चाहिये । मा० स० १४-
२१० मार्क्सवाद और रामराज्य डेविसका 'हार्मोनिया' में कहना है कि 'भाषाके मुख्य उद्देश्यमें विकास होना सम्भव नहीं है, क्योकि उद्देश्य सर्वदेशी एवं पूर्ण होता है। उसमें किसी प्रकारका परिवर्तन सम्भव नहीं है।' मैक्समूलरके मतानुसार 'सभी भाषाएँ मूलमें एक ही थीं। मनुष्यकी असावधानीसे ही उनमें बिगाड हुआ।' इससे विकासके विपरीत ह्रास प्रतीत होता है। डा० पाटके अनुसार 'भाषाके मूल स्वरूपमे परिवर्तन नही हो सकता, केवल कुछ बाह्य परिवर्तन ही होते हैं। पिछली जातिने एक भी नया धातु नहीं बनाया। ज्ञान, अज्ञानका ज्वारभाटा सदासे ही आता रहता है। जो जातियों कभी जंगली थी, वही कभी ज्ञान-विज्ञानयुक्त हो जाती हैं और ज्ञान-विज्ञानयुक्त जातियाँ कभी अज्ञानसे जगली बन जाती है।' पीछे यह भी कहा गया है कि 'द्रविड़ भाषाका आस्ट्रेलियान आदि अनेक भाषाओंसे सम्बन्ध प्रतीत होता है और केम्बल्स् द्रविड़, तेलगू आदि भाषाओंका वैदिक भाषासे ही निकलना मानता है। इनके सैकड़ों शब्द अबतक एक ही समान पाये जाते हैं। इन भाषाओकी तुल्यता मिलती है। संस्कृतमें अम्ब, सीरियनमें आमो, द्रविड़में अम्मा, सामोपे डिकमें अम्म, सीथियनमें अम्माल, अरबीमे उम्म, मलयालीमें अम, तुलूमें अप्पा और चीनीमें मॉ इत्यादि । जैसे सस्कृत, जेन्द और लैटिन भाषाओंमें लिङ्ग एवं वचन तीन तीन होते हैं, वैसे ही सेमेटिक, अरबी और हिब्रू भाषामें भी लिङ्ग, वचन तीन-तीन होते हैं। पुँल्लिङ्गसे स्त्रीलिङ्ग बनानेका ढग वही है। जैसे रामका रामा, वैसे ही साहबको साहिबा और मलकको मलिका बनाकर पुँल्लिङ्गसे स्त्रीलिङ्ग किया जाता है। पुराने भेदके अन्तर्गत यूरल, अल्ताइक, तुंगसिक, मंगोलिक, तुर्की और तिलगू आदि भाषाएँ आती हैं। इनमें एक शाखा सामोपेडिक है, जो चीनकी पैतिसी तथा साइबेरियाकी ओवि नदीके किनारे विस्तृत रूपसे बोली जाती है। इस भाषामे सस्कृतकी भाँति तीन वचन और आठ विभक्तियाँ होती हैं। अनादिसिद्ध शुद्ध शब्दोंके उच्चारणमें शिक्षाकी कमीके कारण गड़बड़ी होती है। उच्चारणमें व्यत्यास हो जानेसे शुद्ध शब्द अपभ्रष्ट हो जाते हैं। जैसे असुर लोग 'हे आर्य !' के स्थानमें 'हेलय' उच्चारण करने लगे। आज भी इसी कारण सूक्ष्मको 'छुच्छम' और 'टिकिट'को 'टिकस' उच्चारण करते हैं। लिपिके अक्षरोंमें कमीके कारण अरबीमे 'चरक'को 'सरक', 'कोटपाल'को 'कोतवाल' कहा जाता है। तीन वचन- वाली संस्कृत भाषासे उत्पन्न हिंदी, मराठी, गुजराती, बगाली आदि भाषाओंमें दो ही वचन होते हैं, तीन नही । इसी प्रकार जेन्द भाषामें तीन वचन हैं, उससे उत्पन्न फारसी, पश्तो, उर्दू आदि भाषाओंमे दो ही वचन हैं। लैटिनमे तीन वचन होते हैं, उससे उत्पन्न भाषाओंमें दो ही वचन होते हैं। इसी तरह हिंदीमे नपुंसक लिङ्गका प्रयोग लुप्त हो गया । गुप्त कामोके लिये इसी तरह अपभ्रष्ट करके कुछ संकेतमयी भाषाएँ बना ली जाती हैं। क्लिष्ट और विस्तृत संस्कृत भाषासे ही
सरल और संकुचित करके उच्चारणकी दृष्टिसे अन्य भाषाएँ बनी हैं । जैसे 'ऋत' को 'राइट', 'उष्ट्र' को 'ऊन्तर', 'स्थान' को 'स्तान,' 'घनी' को 'गनी,' 'विधवा' को 'विडो,' 'गृभ' को 'ग्रिफ्ट,' 'भ्रातर' का 'ब्रदर,' 'मातर' का 'मदर', 'पितर' का 'फादर', संस्कृत एवं जेन्दमें 'असुर'को 'अहुर,' 'सोम' को 'होम,' 'सप्त' को 'हफ्त,' 'आहुति' को 'आज़ुति,' 'वाहू' को 'वाजू,' 'पशु' को 'पसू,' 'उक्षन्' को 'आक्स' तथा संस्कृत एवं फ़ारसीमें 'तनु' को 'तन', 'जानु' को 'जानु,' 'बाहु' को 'बाज़ू,' 'अंगुष्ठ' को 'अंगुस्त,' 'हस्त' को 'हस्त,' 'पाद' को 'पा', 'शिर'को 'सर' कहते हैं । संस्कृत और यूनानीमें 'गते' को 'केटन,' 'दश' को 'डेक,' 'अश्मन' को 'अकमन्' कहते हैं । संस्कृत और मिस्रीमें 'अथ' वो 'अख,' 'आप' को 'आप' कहते हैं । संस्कृत और अरबीमें 'हर्म्य' को 'हरम्' 'सुर' को 'हुर' कहते हैं । संस्कृत और अफ्रीकीमें 'ध्यान' को 'बानी', 'कर्त्त' को 'काटा' कहते हैं । संस्कृत और चीनीमें 'स्थान' को 'तान,' 'जन'को 'जिन', 'अम्बा' को 'माँ,' 'होम' को 'ह्योम' कहते हैं । संस्कृत एवं जापानीमें 'का' को 'का,' 'बहुत्व' को 'मोत्तो' आदि कहते हैं । संस्कृत और द्रविड़में 'तालु' को 'तला', 'मजु' को 'मछी,' 'मेष' को 'मेक,' 'राजा' को 'राजू' कहते हैं । इस तरह इन उदाहरणोंसे यह सिद्ध होता है कि उच्चारणमें असावधानीसे ही अनेक भाषाएँ बनी हैं । संस्कृतमें, विशेषतः वेदमें उच्चारणकी सावधानी बहुत ही आवश्यक होती है । स्वर एवं वर्णसे हीन मन्त्रका प्रयोग मिथ्या प्रयोग कहा जाता है । वह जिस अर्थके लिये प्रयुक्त हुआ है, उसका बोध नहीं कराता । इतना ही नहीं, वह वाग्वज्र बनकर यजमानका नाश कर देता है । जैसा कि—'इन्द्रशत्रो विवर्द्धस्व' में स्वरके दोषसे अर्थात् अन्तोदात्तके स्थानमें आद्युदात्तका प्रयोग करनेसे तत्पुरुष समासके अनुसार इन्द्रका शत्रु अर्थात् घातक अर्थ नही हुआ, अपितु बहुव्रीहि समासके अनुसार 'इन्द्र है घातक जिसका' ऐसा अर्थ हुआ । इस स्वरापराधसे यजमान वृत्र मारा गया । वैदिक- लौकिक दोनों ही प्रकारके व्याकरण वैदिक-लौकिक संस्कृत भाषाको बिगड़ने नहीं देते । वैदिक भाषाकी लिपि भी प्राचीन ही है और उसी आधारपर लिपि भी यन्त्र आदिके काम आती है । अब बहुत-से प्राचीन लेख मिल रहे हैं । ब्राह्मी लिपिके पहलेके कहे जानेवाले लेखोंमें कोई स्पष्ट लिपि नहीं । कितने ही शिलालेख तो काल्पनिक ही हैं । धातुपाठ, प्रत्यय, नियम, तीन वचन, आठ विभक्तियाँ, दस लकार, सन्धि-कौशल तथा स्वर-विज्ञानमें संस्कृत व्याकरणसे तुलना संसारका कोई भी व्याकरण नहीं कर सकता । इन सब प्रक्रियाओंका प्रयोग करनेसे शब्दोंके
स्वरूप अटल रहते हैं । उनमें अपभ्रंशका अवसर ( गुंजाइश ) नही रहता । यही कारण है कि लाखो वर्षोंका प्राचीन साहित्य एक ही ढगसे सर्वत्र उच्चरित और अवगत किया जा सकता है । कुछ लोग समझते हैं कि प्राकृत भाषाका सस्कार करके सस्कृत भाषा बनायी गयी है । जैसे किसी प्राकृत काष्ठ, पाषाणका संस्कार कर मलापनयन, अतिशयाधानद्वारा उससे विशिष्ट संस्थानकी वस्तुएँ बनायी जाती हैं । परतु वस्तुतः यहाँका संस्कार इस प्रकारका है कि जैसे मिश्रित ग्राह्य-अग्राह्य पदार्थोंमेसे गालिनी ( छलनी ) द्वारा अग्राह्य और ग्राह्यका पृथक्करण किया जाता है, इसे भी सस्कार ही कहा जाता है । इसी तरह मिश्रित साधु-असाधु शब्दोंमेसे व्याकरणके लक्षणों-सूत्रोंद्वारा असाधु शब्दोसे साधु शब्दोका विवेचन ही शब्दोका संस्कार है । इस तरह नित्य शब्दोमें भी संस्कारका व्यवहार होनेसे संस्कृतत्वका व्यवहार होता है । कहा जाता है कि भौतिक विज्ञानसे उत्पन्न भौतिक उन्नति अनिश्चित होती है । बड़े-बड़े विद्वान् बड़ी बुद्धिसे, साधनोंसे जो निश्चित करते हैं, कालान्तरमें उसका खण्डन हो जाता है । कारण यह है कि जितने सूक्ष्म तत्त्वोंसे मस्तिष्क बना होता है, उनसे भी अधिक सूक्ष्म पदार्थ ससारमें विद्यमान हैं । जैसे नेत्रकी दर्शन शक्तिसे भी दृश्य पदार्थ अधिक सूक्ष्म पाये जाते हैं, वैसे ही सोचनेवाले यन्त्र मस्तिष्कसे भी सूक्ष्म पदार्थ हो सकते हैं । इसीलिये विद्वान् थॉम्सनका कहना है कि 'ससारके जब छोटे रहस्य खुल जाते है, तब आगे बड़े रहस्य आ खड़े होते है । संसारके आश्चर्योंको विज्ञान कभी मिटा नहीं सकता, प्रत्युत उन्हे अगाध बना देता है ।' मनोविज्ञानके पण्डितोका कहना है कि 'किसी भी जीवन कार्यकी सगति भौतिक नियमोंसे अबतक स्पष्ट नहीं की जा सकी है । ऑसू निकलने, पसीना बहनेके छोटे-छोटे जीवन कार्य भी भौतिक तथा रासायनिक नियमोंसे स्पष्ट नही होते ।' एफ० सोडीका कहना है कि 'परस्पर दो पदार्थ क्यो आकर्षित होते हैं और क्यों जुदा होते हैं यह भी ज्ञात नही है । यही स्थिति अन्य विज्ञानोमे भी है । कल्पनाएँ बदलती रहती हैं ।' यहाँतक विकासवादके पक्षमें रखे जानेवाले तर्कोंपर विचार किया और सक्षेपमें अपने शास्त्रोका मत रखा । अब उन्हीपर कुछ विस्तारपूर्वक विचार करनेकी आवश्यकता है । मूल प्रश्न यही है कि सृष्टि जड़से हुई या चेतनसे ? पहले इसीपर विचार करना है— जड़ या चेतन ? जड़ ससार जड परमाणुओके एकत्रित होने या जड विद्युत्कणोंके संघर्ष अथवा प्रकृतिके हलचलमात्रका परिणाम नहीं है; किंतु अखण्ड सत्ता अखण्ड
बोध परमानन्दस्वरूप परमात्माकी अघटितघटनापटीयसी मायाशक्तिका परिणाम है। जैसे कल-कारखाने, रेल, तार, रेडियो, वायुयान, परमाणुबम हाइड्रोजन बम आदि उत्पादक, पालक, संहारक अनेक यन्त्रोंका निर्माण जड- प्रकृति आदिसे सम्पन्न नहीं होता, किंतु उनके लिये कोई बुद्धिसम्पन्न परिष्कृत मस्तिष्कवाला वैज्ञानिक उनका निर्माता अपेक्षित होता है। वैज्ञानिकोंके परिष्कृत मस्तिष्क, बुद्धि एवं शरीर आदिका निर्माता, विविध पशुओ, पक्षियों, फलोंका निर्माता सर्वेश्वर अपेक्षित है। मोहन-जो-दड़ो और हड़प्पाकी खुदाइयोंमें मिलनेवाली रंग-बिरंगी और विचित्र वस्तुओंके आधारपर यदि कोई विशिष्ट बुद्धिमान् चेतन कर्ता अपेक्षित होता है तो कोई कारण नहीं कि उपर्युक्त रंग-बिरंगे विचित्र फूलों-फलों, विचित्र साड़ी पहननेवाली तितलियों, पक्षियों, पशुओं तथा विचित्र बुद्धिपूर्ण मनुष्यका निर्माता कोई चेतन ईश्वर न हो। चन्द्र-सूर्य-सागर-पर्वतादि वस्तुएँ सावयव होनेसे कार्य हैं। कार्य होनेसे उनका सकर्तृक होना आवश्यक है। किसी भी कार्यको सकर्तृक, साधार एवं सोपादान होना अनिवार्य ही है। इस दृष्टिसे प्रपञ्चोत्पादिनी शक्तिसम्पन्न चेतनसे विश्वकी उत्पत्ति होना उचित है। पार्थिव प्रपञ्चका कारण पृथिवी, पृथिवीका कारण जल, उसका कारण तेज, उसका कारण वायु, वायुका आकाश, आकाशका अहंतत्त्व, अहंतत्त्वका महत्तत्त्व, महत्तत्त्वका अव्यक्ततत्त्व और उसका कारण स्वप्रकाश सत्तत्त्व है। जैसे वह्निमें दाहिका शक्ति एव मृत्तिकामें घटोत्पादिनी शक्ति होती है, वैसे ही सत्में प्रपञ्चोत्पादिनी शक्ति होती है। जैसे व्यष्टिगत व्यवहारमें निद्रायुक्त चेतनसे निद्रा भंग होनेपर कुछ बोध उत्पन्न होता है, तत्पश्चात् अहंका उल्लेख होता है, अनन्तर वायु, आकाश आदिका उपलम्भ होता है। आकाश होनेपर हलचल, हलचलसे ऊष्मा, ऊष्मासे स्वेद, स्वेदसे घनीभूत स्वेद अर्थात् पार्थिव मल उत्पन्न होता है। ठीक यही स्थिति समष्टि जगत्की उत्पत्तिकी है। कारण सूक्ष्म तथा व्यापक एव निर्विशेष होता है। कार्य उसकी अपेक्षा स्थूल, सविशेष एव व्याप्य होते हैं। पृथिवीमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध—ये पाँच गुण हैं। जलमें गन्धविहीन पूर्वोक्त चार गुण हैं। तेजमें शब्द, स्पर्श, रूप तीन गुण, वायुमें शब्द, स्पर्श दो गुण तथा आकाशमें केवल एक शब्द ही गुण है। उत्तरोत्तर व्यापकता भी इनमें प्रसिद्ध है। आधाराधेयकी दृष्टिसे भी व्यापक, सूक्ष्म एव निर्विशेष आधार है। स्थूल, व्याप्य आधेय हैं। सर्वाधार, सर्वकारण, स्वप्रकाश सत् निराधार एव अकारण है। 'मूले मूलाभावादमूलं मूलं' अन्तिम मूल समूल माननेसे अनवस्था प्रसंग होगा। अतः उसे अमूल मानना आवश्यक है। यद्यपि भौतिकवादी भूतको ही मूल मानता है। फिर भी किसी
२१४ मार्क्सवाद और रामराज्य भी कार्यमें प्रकाश, हलचल, अवष्टम्भ ( रुकावट ) अपेक्षित है । परमाणु, विद्युत्कण या भूतसे बिना उपर्युक्त तीनों गुणोंके काम नहीं चल सकता । प्रकाश बिना हलचल नहीं, हलचल बिना कार्य नहीं । साथ ही उचित रुकावट ( अवष्टम्भ ) बिना भी कार्य नहीं सम्पन्न हो सकता । कोई बढ़ई आलमारी तभी बना सकता है, जब उसे पहले उसका बोध हो, पुनः वह बसूला लेकर क्रिया प्रारम्भ करे । निरन्तर बसूला चलता ही जाय तो काष्ठ ही समाप्त हो जायगा, कोई कार्य सम्पन्न नहीं होगा । अतः यथायोग्य क्रिया और रुकावट भी होनी चाहिये । बस, ये ही तीन चीजें सत्त्व, रज और तम हैं । सत्त्व प्रकाशात्मक, रज क्रियात्मक तथा तम अवष्टम्भात्मक है । सांख्य और कई उसके अनुयायियोंने इन तीनों गुणोंकी समष्टि प्रकृतिको ही मूल मान लिया है; परन्तु प्रकृति या गुणोंका भी अस्तित्व एवं स्फुरण अपेक्षित है । उसके बिना सब असत् एवं स्फूर्तिविहीन हो जाते हैं । अतः सत्स्फुरण अर्थात् अबाधित स्फुरण या स्वप्रकाश सत्के भीतर सबका अन्तर्भाव हो जाता है । सत्का अन्तर्भाव अन्यत्र नहीं हो सकता, अतः स्वप्रकाश सत् ही मूल कारण है । वही अबाधित बोधस्वरूप है । वही सब विश्वका मूल है । एक वृक्ष, एक सरोवर, एक अङ्गुल भूमितक बिना स्वामीके नहीं है तो कैसे माना जाय कि चन्द्रमण्डल, सूर्यमण्डल, नक्षत्र- मण्डल, गगन, भूधर, पर्वत, सागर, भूमि, अरण्य बिना स्वामीके होंगे । इस तरह- सर्वकारण सर्वाधार सर्वकर्ता सर्वस्वामी सर्वशासक परमेश्वर सिद्ध होता है । उसीका सनातन अंश क्षेत्रज्ञ आत्मा सिद्ध होता है । देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धिका द्रष्टा साक्षी आत्मा देहादिसे भिन्न है । जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों बुद्धिकी अवस्थाओंका वही साक्षी है । जैसे महाकाशका अंश घटाकाश होता है, वैसे ही अनन्तबोध अखण्ड सत्स्वरूप परमात्माका ही अंश जीवात्मा है । वह भूतोंका परिणाम नहीं है । अतएव चेतनविहीन देहादि जडमात्र रह जाते हैं । भले ही देह, दिल-दिमाग या मस्तिष्क एवं बुद्धिके बिना स्वतन्त्र चेतनाका उपलब्ध नहीं होता, फिर भी चेतना देह या दिल-दिमाग आदिका धर्म नहीं है । जैसे तेज या अ ग्नेका दाहकत्व, प्रकाशकत्व, लोहालक्कड, तार आदि पार्थिव आप्य पदार्थोंके ही सम्बन्धसे व्यक्त होता है तो भी पार्थिव आप्य पदार्थोंका धर्म दाहकत्व, प्रकाशकत्व नहीं माना जाता, इसी तरह दिल-दिमाग आदिके सम्बन्धसे आत्माका चैतन्य अभिव्यक्त होता है, परन्तु चैतन्य उनका धर्म नहीं है । व्यक्तिके सम्बन्धसे ही जातिकी अभिव्यक्ति होती है । फिर भी जाति स्वतन्त्र वस्तु मान्य है । जालान्तर्गत सूर्यरश्मियोंके सम्पर्कसे त्रसरेणु आदि प्रतीत होते हैं, फिर भी उनका स्वतन्त्र अस्तित्व है । उसी तरह जिस बोधके द्वारा सब प्रमाण-प्रमेय आदिकी प्रतीति होती है, उस बोधका स्वतन्त्र अस्तित्व
है । इतना ही क्यों ? उसकी ही सत्तासे अन्य पदार्थ सत्तावान् होते हैं । उसीकी स्फूर्तिसे इतर पदार्थोंमें स्फूर्ति होती है । जैसे दर्पणभानके अनन्तर ही दर्पणस्थ प्रतिबिम्बकी प्रतीति होती है, इसी तरह अथवा आलोककी प्रतीतिके अनन्तर ही रूपकी प्रतीति होती है उसी तरह प्रमेय, प्रमाण तथा प्रमाता तीनोंकी प्रतीतिसे पहले ही सर्वभासक भानकी प्रतीति होती है । प्रकाश सम्पर्क होनेसे अथवा प्रकाशस्वरूप होनेसे वस्तु प्रकाश होता है । प्रमाण बिना प्रमेयसिद्धि नहीं 'होती । प्रमाण भी प्रमाताके पराधीन होता है । प्रमाता स्वभिन्न प्रमेयकी प्रमितिके लिये प्रमाण ढूँढता है । अपनी प्रमितिके लिये प्रमाणकी आवश्यकता नहीं समझता । यदि प्रमाता भी प्रमाणसिद्ध माना जाय तब तो वह प्रमेय- कोटिमें आ जायगा । फिर उसका प्रमाता कोई अन्य आवश्यक होगा, उसका भी अन्य, फिर उसका भी अन्य प्रमाता आवश्यक होगा । इस तरह अनवस्था- प्रसक्ति होगी । एक ही प्रमाता स्वयं प्रमाता और स्वयं प्रमेय नहीं हो सकता, क्योंकि एकमें कर्मकर्तृभाव नहीं बन सकता । किसी भी वस्तुका प्रागभाव या प्रध्वंसाभाव सिद्ध करनेके लिये प्रमाता प्रमाण या साक्षी अपेक्षित है । साक्षीविहीन भाव या अभाव कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकता । सुषुप्तिमें प्रमाता प्रमाणका भी अनुपलब्ध सिद्ध है । परंतु सर्वभासक बोध या संवित्का प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव या अत्यन्ताभाव कुछ भी नहीं सिद्ध होता । बोधाभावका बोध नहीं तो बोधाभाव सिद्ध नहीं हो सकता । बोधाभावका बोध है तो बोधाभाव भी कैसे कहा जा सकता है ? इस तरह यह अतीत अनागत अहोरात्र, पक्ष, मास, वर्ष, युग, कल्प सब देशकालका भासक है, स्वयं अनाद्यनन्त है । बीजसे पहले अङ्कुर, अङ्कुरसे पहले बीज होता है । जागरणसे पहले सुषुप्ति ( निद्रा ) एव उससे पहले जागरण होता है । प्राणी जागनेके बाद सोता है और सोनेके बाद जागता है । इसी प्रकार जन्म-मरण, सृष्टि-संहार तथा जन्मों और कर्मोंकी परम्परा अनादि है । संसारमें देखा ही जाता है कि कारणमें विलक्षणता हुए बिना कार्यमें विलक्षणता नहीं होती । रेल, तार, रेडियो आदि विलक्षण कार्योंके लिये विलक्षण हेतु अपेक्षित होते ही हैं । इसी तरह देव, मनुष्य, पशु आदि उच्चावच योनियोंमें जन्म बिना धर्माधर्मरूपी कर्मोंकी विलक्षणता सम्भव नहीं है । लोकमें भी भले कर्मोंका भला फल और बुरे कर्मोंका बुरा फल होता है । ठीक इसी तरह धर्म अधर्मके वैचित्र्यसे ही जन्मोंमें वैचित्र्य होता है । कोई भी शासक शासनके लिये शासन-विधान आवश्यक समझता है । सुतरा सनातन परमेश्वर भी सनातन जीवोंपर शासन करनेके लिये सनातन विधान आवश्यक समझते हैं । सनातन जीवात्माओंको सनातन परमपद प्राप्त करानेके लिये सनातन परमात्माने अपने सनातन निःश्वासभूत सनातन वेदादि
२१६ मार्क्सवाद और रामराज्य शास्त्रोद्वारा जिन सनातन नियमोको निर्धारित कर रखा है, वे ही सनातनधर्म या सनातन नियम संसारके कल्याणकारी हैं । यह अनुभवसिद्ध बात है कि संसारमें छोटे-बड़े किसी कार्यके करनेके पहले प्राणीको उसका संकल्प या ज्ञान होता है। इस तरह ज्ञानपूर्वक ही प्रत्येक कार्य होते हैं । साथ ही हरेक ज्ञान या संकल्पमें शब्दोंका अनुवेध अवश्य रहता है। ऐसा कोई भी प्रत्यय (बोध) नहीं होता जिसमें सूक्ष्मरूपसे शब्दका अनुगम न हो— न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते । (वाक्यपदीय) यद्यपि चार्वाक एवं उसके अनुयायी मार्क्स आदि भौतिकवादी प्रत्यक्ष प्रमाण- के अतिरिक्त कोई प्रमाण नहीं मानते, तथापि दूसरोंके अज्ञान, संशय, भ्रान्ति या जिज्ञासा-प्रशमनके लिये वाक्य-प्रयोग वे भी करते हैं । परन्तु केवल प्रत्यक्षवादी दूसरोंके अज्ञान, संशय, भ्रान्ति, जिज्ञासा आदि प्रत्यक्ष प्रमाणसे कैसे जान सकेंगे? श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राणसे शब्द-स्पर्शादिरहित अन्यनिष्ठ संशयादि सर्वथापि नहीं जाने जा सकते । बिना संशयादि जाने जिस किसीके प्रति अजिज्ञासित अर्थका प्रतिपादक वक्ता उन्मत्त ही कहा जा सकता है । अतः स्वीकार करना पड़ेगा कि मुखाकृति या वाग्व्यवहार आदिसे दूसरोंके संशयादिकोंका अनुमान करके ही कोई भी वक्ता वाक्यप्रयोग कर सकता है । अतः प्रत्यक्षातिरिक्त प्रमाण नहीं है, इसे कहनेके लिये भी अनुमान प्रमाण मानना आवश्यक है । अतएव पशु-पक्षीतकका व्यवहार भी अनुमानमूलक होता है । भोजन आदि लेकर आते मनुष्यकी ओर प्रवृत्त होना, दण्डोद्यतकर मनुष्यसे पलायन करना आदि भी अनुमानसे ही सिद्ध होता है । इसी प्रकार व्यवहारमें कोई भी व्यक्ति पिता- पितामहादिकी सम्पत्तिका उत्तराधिकारी तभी होता है, जब वह अपनेको पिता-पितामहका पुत्र-पौत्र सिद्ध कर सके । प्रत्यक्ष प्रमाणसे कोई प्राणी अपने माताकी सिद्धि नहीं कर सकता, पिता-पितामहकी सिद्धि तो दूरकी बात है । अतः पार्श्ववर्तियों तथा माता आदिकी बातोंपर विश्वास करनेसे ही पिता आदिकी सिद्धि होती है । पशु आदिको पिता आदिकी सम्पत्तिमें अधिकारी नहीं होना होता है, अतएव उन्हें वचनप्रमाणसे पिता आदिकी सिद्धिकी अपेक्षा नहीं होती । पशु आदि वचनप्रमाणरहित होते हैं, अतः उनकी दृष्टिसे माता, भगिनी, पुत्री आदिका भेद भी मान्य नहीं होता । वे पत्नी, भगिनी, किसीसे भी संतान उत्पन्न कर सकते हैं । पर मनुष्य वचनप्रमाण मानता है, इसीलिये यह माता, भगिनीका भेद मानकर यथायोग्य व्यवहार करता है । अतः आप्त पुरुषोंका कहना है—
विकासवाद २१७ मतयो यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति वानराः । शास्त्राणि यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति ते नगः ॥ प्रत्यक्षानुमानादिमूलक मति जहाँतक जाती है, वहाँतक जानेवाले वानरादि पशु होते हैं । परंतु प्रत्यक्षानुमान एव शास्त्र जहाँतक चलते हैं, वहाँतक चलनेवाला प्राणी ही नर होता है । हाँ, पौरुषेय वचन प्रत्यक्षानुमानादिमूलक होते हैं । पर अपौरुषेय वचन स्वतन्त्ररूपमे प्रमाण होते हैं । जैसे रूपग्रहणमें नेत्र स्वतन्त्र प्रमाण होता है, वैसे ही धर्म-ब्रह्मादिग्रहणमें वेदादि शास्त्र स्वतन्त्र प्रमाण होते हैं । इस तरह प्रत्यक्ष, अनुमान तथा वेदादि आगमोंद्वारा यही सिद्ध होता है कि शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार ईश्वरसे ही विश्वकी सृष्टि एव उसकी व्यवस्था होती है । विचित्र सूर्यमण्डल अपने आप कैसे बन गया ? उससे चन्द्रमण्डल, भूमण्डलके टुकड़े कैसे टूटे ? अब ऐसे टुकड़े क्यों नहीं टूट रहे हैं ? अब वानरसे मनुष्य क्यों नहीं उत्पन्न होते, इन अतीत इतिवृत्तोंमें क्या प्रमाण है ? केवल कुछ मनुष्योंकी दिमागी कल्पनाको छोड़कर इन तत्त्वोंका क्या आधार है ? आर्ष विज्ञान् अपौरुषेय शास्त्रोंके सामने इन कल्पनाओंका क्या मूल्य है ? इन कल्पनाओंकी निस्सारता इसीसे स्पष्ट है कि अग्नि, सूर्य, इन्द्रादि देवता उपयोगिताके आधारपर माने गये हैं । परंतु यह कोई भी नहीं कह सकता कि जिसका उपयोग करना हो उसकी पूजा भी करनी चाहिये ।' पूजा तो उसी दशामें होती है, जब दृश्य जडवस्तुसे भिन्न कोई चेतन वस्तु मान्य होता है । आस्तिक लोग उपयोगी अग्नि आदिमें एव अनुपयोगी पाषाण आदिमें भी चेतन अधिष्ठान देवता मानकर उनकी पूजा करते हैं । इसी तरह इन्द्र या ईश्वर आदि- की कल्पना भी भीरु प्राणीकी भीरुताका परिचायक नहीं, किंतु भय, शोक, मोह, सुख-दुःख आदि प्रापञ्चिक भावोंसे ऊपर उठे हुए महापुरुषोंद्वारा परम तथ्यका ऋतम्भरा प्रज्ञाद्वारा साक्षात्कार है । निर्विकल्पसमाधिदशामें ईश्वरतत्त्वका साक्षात्कार होता है । एव दार्शनिक दिव्य तर्कोंद्वारा अशृङ्खल भौतिकवादी कुतार्किकोंके अखर्व गर्वोको चूर करके अध्यात्मवादी आत्म परमात्मवाद सिद्ध करते हैं । वशिष्ठ, व्यास, कण्व, गौतम, श्रीहर्ष, उदयन, कुमारिल आदिकोंके महान् तर्क आज भी नास्तिकोंके लिये दुर्भेद्य हैं । विकासवाद और जाति जल, वायु एव देशोंके प्रभावसे रंगमें परिवर्तन होना प्रत्यक्ष अनुमान एव शास्त्रसे भी सिद्ध है । कफ, वात, पित्तकी प्रधानता-अप्रधानताने भी रंग, रूप, स्वभावमें भेद होना शास्त्रसिद्ध है । जैसे संकल्पों, विचारों एवं वातावरणोंसे रजस्वला स्त्री प्रभावित हो, स्त्री-पुरुष जैसे देश, काल,
२१८ मार्क्सवाद और रामराज्य वातावरणसे प्रभावित होकर गर्भाधान करते हैं, वैसे ही संतानका प्रादुर्भाव होता है। वात, पित्त, कफका प्रभाव भी संतानपर पड़ता है। 'बृहदारण्यक' मे स्पष्ट मिलता है कि जो चाहे कि मेरा पुत्र शुक्लवर्ण और एक वेदका विद्वान् हो, वह विधानसहित क्षीरोदन पकाकर घृतके साथ प्राशन करे। जो चाहे कि कपिल एवं पिंगलवर्णका पुत्र हो और दो वेदका पण्डित हो, वह विधिपूर्वक घृतयुक्त दध्योदनका प्राशन करे। ऐसे ही श्याम, लोहिताक्ष और तीन वेदका पण्डित होनेके लिये भी प्रकारान्तरका उल्लेख है। पुष्पो, फलो, पौधोंका भी रूप-रग, स्वाद बाह्य उपचारोंसे बदला जा सकता है, यह स्पष्ट ही है। तात्कालिक या प्राचीन लौकिक एवं शास्त्रीय कर्मोंसे रूप-रंगमें प्रमाणानुसार परिवर्तन माननेमें विकासवादके प्रसंगकी उपस्थितिका कोई भी अवसर नही रहता। इतना ही क्यो, देवताओ, ऋषियोके वर या शाप अथवा तीव्र पुण्य या पापसे तत्क्षण जातिका परिवर्तन हो जाता है। विश्वामित्रके शापसे रम्भा पहाड़ी हो गयी, सप्तर्षियोके वचनसे नहुष अजगर हो गया और देवताके वरसे नन्दी देवता हो गये। परन्तु इतनेसे ही विकासवादियोके बदरोसे मनुष्यकी उत्पत्ति हुई, इस मतकी पुष्टि नही होती। वैदिकोके मतमें किसी भी विलक्षण कार्यका आविर्भाव- तिरोभाव किसी हेतुसे किसी बुद्धिमान्द्वारा होता है, यह पक्ष तो सर्वसम्मत है। इस दृष्टिसे कर्मोंके वैचित्र्यसे सर्वज्ञ ईश्वरद्वारा विलक्षण कार्योंका आविर्भाव- तिरोभाव होना ठीक है। परन्तु कर्मनिरपेक्ष जड (प्रकृति या अन्यान्य जड) परमाणु या विद्युत्कणसे विलक्षण कार्य बन जाने या बंदरसे मनुष्य आदिकोंकी उत्पत्तिका कोई आधार नही है। जब कर्म, वर, शाप, भावना, सङ्कल्प आदि अन्यान्य हेतु परिवर्तनके विद्यमान हैं, तब खामखाह व्यभिचारकी ही कल्पना करना, सबको झूठा समझकर केवल अपने अटकलपर ही डटे रहना कहाँतक ठीक है? भले ही किसीको कोई रोग परस्त्री-सम्भोगसे ही हुआ हो, परन्तु अन्यान्य प्रकारके सम्पर्कसे वह रोग हो ही नहीं सकता, ऐसा नहीं कहा जा सकता। श्रीदशरथके राम, भरत ये दो श्यामल पुत्र और लक्ष्मण, शत्रुघ्न गौरवर्णके हुए। वसुदेवसे भी बलराम गौर, कृष्ण श्यामल हुए। प्रद्युम्न, अनिरुद्ध श्यामल हुए, व्यास, शुक आदि श्यामल थे, अतः यह तो कहा ही नहीं जा सकता कि आर्य सब गोरे ही होते थे। भारतमें छहों ऋतुओंका पूर्ण विकास होता है, अतः देश- कालभेदसे तथा अन्यान्य हेतुओंसे भी रूप-रंगमें भेद हो ही सकता है। मैथिल, बंगाली, पंजाबी, युक्तप्रान्तीय, महाराष्ट्रीय, द्रविड़ आदिकोंके रूप-रंग, स्वरूपमें स्पष्ट भेद पड़ जाते हैं। वे सभी आर्य हैं, सभीके समान गोत्र होते हैं। शंकर गौरवर्ण, ब्रह्मा रक्तवर्ण, विष्णु श्यामल वर्णके है। यही स्थिति