भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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८ मार्क्सवाद और रामराज्य जो त्रिकालाबाध्य है, एकरस है, वही सत्य है । उन्होंने अप्रामाणिकप्राय असम्बद्ध ज्ञानोंसे उपप्लुत मस्तिष्कको परिष्कृतकर उनमें सत्य ज्ञानके बीज बोये । उनका दर्शन शब्दार्थज्ञानविषयक ही है । बाह्य ज्ञानकी अपेक्षा आन्तरिक ज्ञानकी ही महत्ता उन्होंने अत्यधिक प्रख्यापित की है । उनके शिष्य अफलातून विशिष्ट दार्शनिक हुए । उन्हींके प्रभावसे अनेक विद्वान् अपूर्ण संसारसे विरक्त हो गये और अनन्त सत्यमें अपना मन लगा दिया । भौतिकवादियोंकी दृष्टिसे लोग 'वस्तु' से अपना ध्यान हटाकर अमूर्त्त व्यापक सत्यके अन्वेषणमें लग गये । इन्द्रियव्यापारोंसे उपरत होकर उन्होंने विचारशक्तिसे महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त स्थिर किये । उक्त विरोधाभासको ही तत्त्व मानकर यह मान लेना कि 'गति या परिवर्तन विरोधपूर्ण है, अतः उसकी व्याख्या नहीं हो सकती' मिथ्या ही है । इसलिये तत्त्व तो अपरिवर्तनीय ही रहा और वही सत्य भी है, वही नित्य भी है । परिवर्तन तो भ्रममात्र है । भौतिकवादकी पद्धतिसे तो इस दर्शनमें अनुभव और प्रयोगकी उपेक्षा ही है । जो तत्त्व है, वह 'कृतबुद्धिग्राह्य' ही है अर्थात् परमेश्वरके अनुग्रहसे प्राप्त हुई किसी रहस्यमयी आत्मशक्तिद्वारा ही उसका ज्ञान ( ग्रहण ) हो सकता है । अन्य यूनानियोंका यह मार्ग भी प्रादुर्भूत हुआ कि 'तर्कद्वारा भी तत्त्वान्वेषण हो सकता है ।' अफलातूनके मतसे 'भौतिक वस्तुओंको सत्यपरिचायक समझना चाहिये । घटनाएँ असम्पूर्ण और भ्रामिका होती हैं । इसलिये घटनाओंके मूलमें कोई गम्भीर सत्य रहता है । वही 'वैज्ञानिक नियम' कहलाता है । सारी सृष्टि उसीके अनुसार है । उन्हीं नियमोंसे घटनाओंकी व्याख्या भी होती है । साथ ही मूलभूत वैज्ञानिक नियम जाने भी जा सकते हैं ।' अफलातूनके मतमें विश्वका घटनाचक्र यन्त्र-सा नहीं है, अपितु जैसे वस्तुओंकी वृद्धिका मूल सूर्य है, वैसे ही सब घटनाचक्र किसी-न-किसी शुभके ही उद्देश्यसे प्रवृत्त होता है । इसका विषयानुरूप विवरण यह हो सकता है कि जितने अंशसे इन्द्रिय जगत्-सम्बद्ध है, उतने अंशमें उसकी सत्ता न्यून है । यदि कोई हिम ( बर्फ ) पर हाथ रखकर कवोष्ण जल ( गुनगुने पानी ) में हाथ डाले, तो उसे वह जल अनुष्णके समान लगता है और यदि अनुष्ण जलमें पहले हाथ डालकर गुनगुनेमें डाले, तो उसे वह शीतल- जैसा लगेगा, इस प्रकार वही जल उष्ण भी है और शीतल भी । हाथीकी दृष्टिसे चूहा 'लघु जन्तु' है, परंतु चींटीकी दृष्टिसे वही 'महान्' अनुभूत होने लगता है । इस प्रकार वही मूषक लघु भी है, वही महान् भी । दृष्टिभेदकी दृष्टिसे यही युक्ति अन्य भी अनेक स्थलोंपर प्रयुक्त हो सकती है । कोई भी इन्द्रियानुभूत वस्तु विपरीत गुणयुक्त विदित होने लग सकती है । अतः गुण निश्चित नहीं कहे जा सकते और जो अपरिवर्तनीय गुणयुक्त नहीं है, वह सत्य नहीं है, और न वह ज्ञान ही प्रमात्मक है । कोई चित्र