मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाश्चात्य-दर्शन ९ किसीको सुन्दर लगता है किसीको असुन्दर । जो वस्तु नित्य है, उसका गुण निश्चित होता है अथवा गुणाभाव निश्चित होता है।' उन (अफलातून) के मतसे 'इन्द्रिय-सम्बद्ध जगत जाना नहीं जा सकता । यदि पूछा जाय कि 'जो विज्ञान अनुभूत होता है वह किसका है ?' तो उनके मतसे उत्तर है—'रूपजगतका अथवा धारणाओंका ।' इन्द्रियानुभूत (वस्तुओं) में गुणोंकी उपलब्धिको कारण रूप है । उसीसे उसमें सत्यत्व- का आभास होता है । रूपका ही सम्यग्ज्ञान होता है । रूपशब्दसे यहाँ तात्त्विक रूप लेना चाहते हैं । सारांश यह कि अपूर्ण बाह्य जगतकी अपेक्षा नित्यसिद्ध पूर्णताका ही अन्वेषण करना चाहिये ।' अरस्तूने बाह्य एव आन्तर दोनोंकी व्याख्या की है । 'व्यापक विचारोंसे ही तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है' यह तो उन्हें भी मान्य ही है । वे रूपोंको वस्तुसे संश्लिष्ट ही मानते हैं, अत्यन्त पृथक् नहीं । अफलातूनकी रेखागणितमे अभिरुचि थी, इसलिये काल्पनिक वस्तुकी ओर उनका स्वाभाविक झुकाव रहा । अरस्तूकी जीवविज्ञानमे रुचि थी, इसलिये प्रकृतिके विकार, परिवर्द्धन आदि संस्कारोंकी प्रबलताके कारण अपरिवर्तनीय धारणा आदि सम्बन्धमे इनकी रुचि रही । उनके मतसे आकारमण्डित ही वस्तु विशिष्ट रूप ग्रहण करती है । विभिन्न वस्तुओंका वस्तु-तत्त्व और रूप पृथक्-पृथक् होता है । जैसे मूर्त्तिका वस्तुतत्त्व पाषाण है और शिल्पीकृत रूप ही रूप है । वनस्पति, पशु, मनुष्य आदिका शरीर- संघटन वस्तुतत्त्व है । रूप है; पचन-क्रिया, इन्द्रियानुभूति और बोध । रूपके बिना वस्तु कुछ नहीं है, क्योंकि धरणी, जल, अनल, अनिल आदि भी किसी मूल वस्तुके अवस्थाविशेष ही हैं । विश्वका गतिदायक परमेश्वर है, जो स्वयं गतिहीन है । उसकी सत्तामात्रसे विश्व पूर्णताकी ओर अभिमुख होकर विकासोन्मुखी है । जिस वस्तुमें जितने अधिक रूप हैं, उसका उतना ही अधिक महत्त्व है । आम्रका वस्तुभूत वृक्ष है और वृक्षका रूप आम्रफल है, परन्तु वृक्ष भी वनका रूप है । उसकी दृष्टिसे वन वस्तु है । यहाँ एक ही पदार्थ किसीकी दृष्टिसे रूप है और किसीकी दृष्टिसे वस्तु । अरस्तूकी दृष्टिसे भी सभी वस्तुएँ बीजरूपसे स्थित हैं ही । साराका सारा वटवृक्ष बीजमे अवस्थित है । उपयुक्त सामग्रीसे उसके आवरणका अपनयन होनेपर उसकी अभिव्यक्ति हो जाती है । विकासोन्मुख वस्तुओंमें विकासानुगुण (विकासोचित या विकासोपयुक्त) शक्तियोंकी कल्पना कर लेनी चाहिये । वृद्धिशील वस्तुओकी प्रवृत्ति किसी उद्देश्यसे ही होती है । विश्व