मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहाँसे और क्यो दृष्टिगोचर होता है इस प्रश्नका उत्तर वस्तु, रूप, सुप्तशक्ति एव वास्तविकता इन चार बातोसे होता है । बीज वृक्षका भौतिक हेतु है । दूसरा है नियम, जिससे आम्रवृक्षसे आम्रहीका वृक्ष होता है, पनस ( कटहल ) का नहीं । तीसरा--कर्ता, जिसकी प्रेरणासे क्रिया निर्वृत्त होती है । वास्तव- विकता चौथा हेतु है, जिसके उद्देश्यसे बीजकी प्रवृत्ति होती है । बीजके क्षेत्रमे यह आम्रफल है, चित्रकारके क्षेत्रमे सम्पूर्ण चित्र है । यह सारा यूनानी भाषामे 'टेलिओलौजी' सिद्धान्त कहलाता है । यान्त्रिक हेतु इससे भिन्न है । वह कार्य्यका पूर्ववर्ती तथा भावी ( कार्य्य ) का निर्णायक होता है । सामग्री सम्पूर्ण रहे तो कार्योत्पत्ति निःसंदिग्ध है । जैसे छोटे- छोटे यन्त्र महान् यन्त्रके चलानेवाले होते है । 'टेलिओलौजी' सिद्धान्त बतलाता है कि 'इस बातपर भी ध्यान देना चाहिये कि कारण न हो तो वस्तु क्या हो जाय और किस उद्देश्यसे उसकी प्रवृत्ति होने लगे । सर्वत्र सुकल्पित, सुसङ्घटित व्यवस्था ही ईश्वरके अस्तित्वको भी सिद्ध करती है ।' 'अचेतन माया प्रकृति ही अन्य सभी चेतनोंका मूल है' यह भी उनका मत है--कि 'अन्तर्निहितशक्तिवाले भूत ही जीव, जन्तु, वनस्पति आदि रूपोंमें परिणत हो जाते है । जिस प्रकार जीर्ण-शीर्ण काष्ठ, सड़े-गले गोबर तथा गीले बालोंसे कीडे, बिच्छू तथा जूँ आदि उत्पन्न हो जाते हैं।' पर वास्तवमें ऐसी बात नहीं है । यद्यपि इस मतकी विस्तृत समालोचना आगे चलकर मार्क्सदर्शनकी समीक्षाके अवसरपर की जायगी, तथापि यहाँ इतना कह देना आवश्यक हे कि गोबर, काष्ठ, लोम, केशादिकोंसे बिच्छू आदिके जड़ कलेवरकी ही उत्पत्ति होती है, न कि उनके चेतन आत्माकी । वह तो सदाके अनुसार अन्यत्रसे ही आता है, वहाँ उसकी अभिव्यञ्जनामात्र होती है । जैसे लोहा-लकड़, कोयला, पानी आदिपर स्वतः विद्यमान अग्निकी ही अभिव्यक्ति होती है, वैसे ही विद्यमान चेतनकी ही तत्तत् शरीरोंमें अभिव्यक्ति होती है । आधुनिकोंमें बहुतोंका मत यह है कि पहले वस्तुओंको देखनेके साधन यन्त्र ऐसे नहीं थे, इसलिये समष्टि दृष्टिसे विचार-परम्परा चल पड़ी । 'मानसिक विचारोंसे ही तत्त्वबोध हो सकता है, इस धारणाका भी मूल कारण यही है । अरस्तूने ज्ञानरश्मियुक्त आत्माओंके जन्मान्तर माने हैं । भौतिकवादियोंका कहना है कि यह उनका भ्रम ही था, क्योंकि जीवविज्ञानशास्त्रका निश्चित मत है कि संस्कार एवं अन्तर्बोध इन्द्रियजन्य अनुभवका ही परिणाम है । अरस्तूके मतसे पदार्थोंमें जीवनके बीजाणु सर्वदा ही रहते हैं । संसारमें विशिष्ट श्रेणियाँ विशिष्टगुणयुक्त होती हैं । यह विज्ञानकी विशिष्ट उन्नति है । संसारका स्वरूप बुद्धिप्रसूत है, नियन्त्रित है । इसलिये सभी वस्तुएँ नियमानुवर्ती ( नियमबद्ध ) ही हैं ।