मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिन्हीं मूषकोंकी शिवमन्दिरमें दीपककी बाती उमका देनेसे, किसी पक्षीकी बाजके भयसे अन्नपूर्णाकी परिक्रमा कर लेनेसे सद्गति हुई है ? इसी तरह बहुत-से ऐसे जीव हैं, जिनके शरीर सूक्ष्म तन्मात्राओके ही बने होते हैं । उनके द्वारा बहुत-से मानस कर्म होते हैं । उनकी संख्या भी अपार है । 'जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहू न समाय' । एक वटबीजके भीतर वटवृक्ष, उसमें अपरिगणित फल, उससे फिर अगणित बीज और उनमें वृक्ष, इस दृष्टिमे जैसे एक वटबीजमें अनन्तकोटि वटवृक्षों की सम्भावना हो सकती है, वैसे ही एक परमाणुके पाँचवें अंग स्पर्शतन्मात्रामें वायु, उसके एक देशमें प्राण और उसके एक देशमें मन और मनमें ब्रह्माण्ड होता है । फिर ब्रह्माण्डके अनन्त मनोंमें अनन्त ब्रह्माण्ड होते हैं। एक क्षणके स्वप्नमें अपरिगणित जीव दिखायी देने लगते हैं । फिर उनके कर्मों और भोगोंका सिवा ईश्वरके और किसको पता लग सकता है ? फिर विद्वान् तो फल बलसे कारण- की कल्पना करते हैं । कार्य देखकर कारणकी कल्पना करनी