मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ मार्क्सवाद और रामराज्य प्रतिपक्षका साधन-बाधन ही द्वन्द्वमान ठहरता है । 'वाद'मे भी भारतीय प्रणालीके अनुसार नियम होते हैं । मध्यस्थ और सदस्य उसके नियामक होते हैं । निर्दोष तर्कद्वारा सिद्ध पदार्थका तर्कान्तरसे खण्डन नहीं हो सकता । तर्कशतसे भी पदार्थ- स्वभाव नहीं बदलता । यथार्थ-ज्ञान वस्तुतन्त्र होता है, पुरुषतन्त्र नही । केवल तर्क अनवस्थित होता है । उसके आधारपर किसी भी वस्तुकी सिद्धि नहीं हो सकती । कुशल तार्किक तर्कद्वारा जिस वस्तुको सिद्ध करता है, दूसरे तार्किक उसे अन्यथा ही उपपादित कर देते हैं— यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः । अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते ॥ (वार्त्तिकसार) प्राग्लोप, अविनिगमकत्व, प्रमाणापगम—इन दोषोसे अनवस्था दोष दुष्ट होते है । मार्क्सीय द्वन्द्वात्मक प्रणालीके मुख्य लक्षण निम्नलिखित है— अतिभूतवादके प्रतिकूल द्वन्द्ववादके अनुसार प्रकृति ऐसे पदार्थोंका आकस्मिक सघटन नही जो परस्पर स्वतन्त्र, विच्छिन्न और असम्बद्ध हैं । द्वन्द्ववादके अनुसार प्रकृति सम्बद्ध और पूर्ण इकाई है । उसके पदार्थ और बाह्यरूप एक दूसरेपर निर्भर तथा एक दूसरेसे सजीवरूपमें सम्बद्ध हैं और परस्पर एक-दूसरेकी रूप-रेखा निश्चित करते हैं। कुछ पदार्थोंका कार्य-कारण- भाव अवश्य मान्य है । पर अनेक संनिहित पदार्थ ऐसे भी हैं, जिनका आपसमें कोई सम्बन्ध नहीं; जैसे पशुके दोनों श्रृङ्गोमें आपसमें कोई कार्य-कारण सम्बन्ध नहीं, इसीलिये यह भी कहना ठीक नहीं कि 'द्वन्द्वात्मक-प्रणालीका यह सिद्धान्त है कि अपने चारों ओरके सघटनसे अलग करके कोई प्राकृतिक घटना अपने-आप- में समझी नहीं जा सकती । कारण यह है कि उसके चारों ओरकी परिस्थितियोंसे और उनके प्रसङ्गमें उनका विचार न करके वह घटना प्रकृतिके किसी भी प्रदेशकी घटना हमारे लिये निरर्थक सिद्ध होती है । फलतः हम प्रकृतिकी कोई भी घटना तभी समझ सकते तथा उसकी व्याख्या कर सकते हैं, जब हम उसके चारों ओरके संघटनके अविभाज्यरूपमें उसपर विचार करें और हम यह सोचकर उसकी व्याख्या करें कि उसकी रूपरेखा उसके चारों ओरके संघटनसे निश्चित हुई है ।' इससे भी सभी संनिहित पदार्थों या घटनाओंमें परस्पर कार्य-कारण भाव नहीं होता । कई घटनाएँ और पदार्थ एक साथ उत्पन्न होते हैं, फिर भी उनमें कोई सम्बन्ध नहीं होता । कार्य-कारण निर्णयके लिये अन्वय-व्यतिरेकादि युक्तियाँ अपेक्षित होती हैं । अन्वय-व्यतिरेक दृढ होनेपर अव्यवहित पौर्वापर्य होनेपर भी उसे काकतालीय-न्याय कहा जाता है । जैसे काकके बैठते ही ताल-फल गिरनेसे कई अविवेकी काक एव ताल पतनका कार्य-कारणभाव मान लेते हैं ।