भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 248

ही रहती है । इसका मूल कारण यह है कि उनमें प्रमाणोंका स्पष्ट विश्लेषण नहीं होता । उदाहरण या दृष्टान्तको ही ये कभी-कभी प्रमाण मान बैठते हैं, जो कि पौरस्त्य- दर्शनमें परार्थानुमानके पञ्चावयवमें केवल एक अङ्ग है । चर्चा या विवाद स्वयं कोई प्रमाण नहीं, जिसके आधारपर स्वयं कोई प्रमेय सिद्ध हो सके— ‘लक्षणप्रमाणाभ्यां वस्तुसिद्धिः ।’ —लक्षण और प्रमाणसे वस्तुसिद्धि होती है, केवल चर्चासे नहीं । पौरस्त्यदर्शनोंमें चर्चा वाद, जल्प, वितण्डा-भेदसे तीन प्रकारकी होती है । तत्त्व-निर्णीषा, विजिगीषा, परपक्ष-निराचिकीर्षासे प्रेरित वादी-प्रतिवादियोंद्वारा परस्पर पक्ष-प्रतिपक्षोंका प्रमाणोंद्वारा साधन बाधन करनेको ‘चर्चा या विवाद’ कहा जा सकता है । प्रामाणिक असंगति और विरोधप्रदर्शन, परपक्षनिराकरण, स्वपक्ष- साधनका एक आंशिक साधनमात्र है । अनुमानके अङ्ग, व्याप्तिनिर्णयमें अनुकूल तर्क अपेक्षित होता है । व्याघात-प्रदर्शन करके संशय-निवृत्तिरूप अनुकूल तर्कसे व्याप्तिज्ञान दृढ़ हो जाता है । फलतः निर्दोष अनुमानसे अनुमेय पदार्थोंकी अनु- मिति होती है । उसीके एक अंशको ‘वाद’ मानकर उसे विचार-क्षेत्रके बाहर लागू करना असंगत ही है । हाँ, अनुमानोंके आधारपर प्राकृतिक पदार्थोंका गुण- स्वभावादि निर्णय करना गुण ही है, फिर इसे कोई खास व्यक्तिका वाद मानना व्यर्थ है । वेदान्ती अन्य मतोंमें असंगति दिखलाकर सर्वमतखण्डनावधि निराकर्ताके प्रत्यगात्माकी स्वतः सिद्धि मानते हैं। इसी पक्षको लेकर हेगेलने अखण्ड नित्यबोधकी सिद्धिमें उसे प्रयुक्त किया है— नेति नेतीति नेतीति शेषितं यत् परं पदम् । निराकर्तुमशक्यत्वात्तदस्मीति सुखी भव ॥ नेति नेति नेति—इन तीन निषेधोंसे स्थूल, सूक्ष्म, कारण—इन त्रिविध दृश्योंका निषेध कर देनेपर सर्वनिषेधावधि, निषेधाधिष्ठान, निषेधसाक्षी निराकर्ताका प्रत्यगात्मा ही अवशिष्ट रह जाता है । उसका निषेध अशक्य है, अतः वह स्वतः सिद्ध है । पर इस असंगति-प्रदर्शनमात्रसे किसी गुणधर्मकी सिद्धि शक्य नहीं । किसी भी साध्यकी सिद्धिके लिये प्रमाण अपेक्षित है । मार्क्सवादके अनुसार ‘द्वन्द्वमान’ ( Dieletics ) में एकके द्वारा तर्ककी उत्थापना होती है, फिर उसका खण्डन होता है, पुनः नये तर्ककी उत्थापना होती है । इस प्रकार एक नीचे दर्जेके सत्यसे ऊँचे दर्जेके सत्यपर पहुँचते हैं। यह क्रमोन्नतिप्रक्रिया है। इसमें स्थिरता नहीं, वेग है । यही प्रक्रिया सारी प्रकृतिमें वर्तमान है । मानव-समाज और प्रकृतिके इतिहाससे ही द्वन्द्वमानके नियम निकाले गये हैं । ये नियम व्यापकरूपसे सब प्रकारकी गतिके नियम हैं। यहाँ भी वादी-प्रतिवादियो, तर्क प्रतितर्कोंद्वारा पक्ष-