मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ मार्क्सवाद रामराज्य गिरनेसे जटिल गतियोंकी उत्पत्ति नहीं होती, अतः विश्वसृष्टि दुर्लभ ही हो जायगी' अतः एपिकुरसने उनका वक्रगतिसे पतन माना है, जिससे विश्वसृष्टि उत्पन्न हो जाय । इस प्रकार वह सिद्ध करता है कि मनुष्य स्वतन्त्र इच्छावाला है किसी अन्यके द्वारा प्रयोज्य नहीं । शून्यसे शून्यकी ही उत्पत्ति हो सकती है, और किसी- की नहीं । अन्यथा किसीसे भी कुछ भी उत्पन्न हो जाय । जो है वह पिण्ड है, जो नहीं है वह शून्य है ( अथवा जिसकी सत्ता है वह पिण्ड है, जिसकी सत्ता नहीं है, वह शून्य है ) । अणु अविभक्त हैं, अपरिवर्तनीय हैं एव गतिमान् हैं । परस्पर अभिमुख होनेसे उनका संयोग होता है । गतियाँ अनादि हैं । परिमाण और आकारके अतिरिक्त उनका कोई गुण नहीं है । उनके मतमें आत्मा भी अणुविशेष ही है । वस्तुओंसे पृथक् जीवन-क्रियाको प्रदर्शित करनेके लिये ही आत्माकी सृष्टि हुई ( या की गयी ) है । धर्मका बन्धन छुड़ाकर प्रकृतिका अध्ययन करना ही मुख्य 'दर्शन' है-ऐसा उन ( डीमोक्रीटस ) के मतानुयायियोंका कथन है, परंतु ऐसा है नहीं । अणु परिमाण उसे कहना चाहिये जिससे अन्य कोई अपकृष्ट परिमाण न हो-'यतः अपकृष्टपरिमाणं नास्ति तत् अणुपरिमाणम्' । सूक्ष्मताकी कल्पना करते-करते वाचस्पतिकी मति भी जहाँ परिश्रान्त हो जाय, उस अविभाज्य निरतिशय सूक्ष्म अवयवको परमाणु कहते हैं । स्वतन्त्र जड परमाणुओं- में प्रपञ्चारम्भ या विनाशानुकूल व्यापार स्वतः सम्भव नहीं; क्योंकि चेतनानधिष्ठित जड पदार्थोंमें विलक्षण व्यवस्थित अभीष्टकार्यकारित्व सम्भव नहीं। अतएव स्वतन्त्र रूपमें वक्र गति या सीधी गतिसे भी सृष्टि निर्माण सम्भव नहीं, अपितु अदृष्ट और ईश्वरसपेक्ष ही परमाणुओंसे कदाचित् सृष्टि और कदाचित् विनाश होता है । मिस्रके 'अलेग्जैण्ड्रिया' नगरमें बहुत-से दार्शनिकोंका आविर्भाव हुआ । पाश्चात्त्य एवं पौरस्त्य दार्शनिक वहाँ एकत्र हुआ करते थे । वहाँ प्लाटिनसके प्रभावमें धर्म और दर्शनका सम्मिश्रण हुआ । वे मानते थे कि 'अनन्तप्रज्ञारूपिणी रहस्यपूर्ण सत्तासे ही सब वस्तुओंकी उत्पत्ति हुई है और वह सत्ता दुर्ज्ञेय है । उसकी प्रपञ्चोत्पादिनी शक्तिको ही ईश्वर मानकर व्यवहार चलाया जा सकता है और वह अपने भीतर ही संकल्पसे विश्वात्माकी सृष्टि करता है। विश्वात्मा ही समष्टिजगत् एवं व्यक्तियोंकी आत्मा है। पार्थिव सम्बन्धसे अवनति होती है और उसके विच्छेदद्वारा पूर्ण सत्ताप्राप्ति ही उत्थान है।' क्रान्सिस्कन, जान स्कोटस, एरिगेना ( ई० ८१०-८७० ), रोजिलिनस ( १०५१-११२६ ) इत्यादि दार्शनिक अफलातूनके सिद्धान्तसे प्रभावित रहे और डोटिनिसन, एलबर्ट स आदि अरस्तूके । एक्विनसकी दृष्टिसे निर्गुण पदार्थ-स्वरूप ही वस्तुएँ हैं । उन्हींमें प्रपञ्चकी उत्पत्ति होती है । उपलब्ध वस्तुएँ रूप ही हैं । जिन रूपोंसे वस्तुओंका ज्ञान होता है, उन्हींसे मूर्ति मूर्त हो पाती है, अन्यथा