भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 257

२४२ मार्क्सवाद और रामराज्य सामग्रियाँ ही कार्य-विकासमूल समझी जा सकती हैं, असंगतियाँ विरोध या संघर्ष नहीं। कार्यके प्रतिबन्धकादि दोषका निवारण अवश्य अपेक्षित होनेपर पुरातन या निर्वाण स्वय विनाशोन्मुख है । अतः उसकी प्रतिबन्धकता असिद्ध है । स्टालिनका कहना है कि 'समाजके जीवन और इतिहासके अध्ययन करनेके लिये सामाजिक क्षेत्रके द्वन्द्वात्मक प्रणालीका प्रचार कितना महत्त्वपूर्ण है और समाजके इतिहास तथा सर्वहारावर्गकी पार्टीकी प्रत्यक्ष कार्यवाहीपर उन सिद्धान्तोंका लागू करना क्या महत्त्व रखता है, यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है । यदि संसारमें कोई भी वस्तु विच्छिन्न और एकाकी नहीं है, यदि सभी वस्तुएँ सम्बद्ध और परस्पर निर्भर हैं, तो सिद्ध है कि इतिहासकी किसी भी समाज-व्यवस्था या सामाजिक आन्दोलनका मूल्याङ्कन हम किसी भी सनातन न्याय अथवा पूर्वकल्पित सिद्धान्तसे नहीं कर सकते । इस प्रकारके मूल्याङ्कनका इतिहासोंमें नितान्त अभाव नहीं है। यह मूल्याङ्कन परिस्थितियोपर विचार करके वे ही कर सकते हैं, जिन्होने उस समाज-व्यवस्थाके सामाजिक आन्दोलनको जन्म दिया होगा, जिससे वे सम्बद्ध हैं। वर्तमान परिस्थितियोंमें दासप्रथा निरर्थक, अस्वाभाविक और मूर्खतापूर्ण होगी। पर जब पंचायती-व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो रही थी, तब दास- प्रथाका होना समझमें आ सकता था। तबकी परिस्थितिमें वह एक स्वाभाविक घटना थी, क्योकि प्राचीन समाजकी पंचायती व्यवस्थाको देखते हुए वह उन्नत व्यवस्था थी । जब जारशाही और पूँजीवादी व्यवस्था विद्यमान थी, तब उदाहरण- के लिये १९०५ के रूसमें एक पूँजीवादी जनवादी प्रजातन्त्रकी माँग अच्छी तरह- से समझमें आ सकती थी । वह उचित और क्रान्तिकारी माँग थी, क्योकि उस समय इनकी प्राप्तिका अर्थ होता 'प्रगतिकी राहपर एक कदम आगे बढ़ना।' पर अब सोवियतसंघकी परिस्थितियोंमे पूँजीवादी जनवादी प्रजातन्त्रकी माँग एक अर्थ- हीन और क्रान्तिविरोधी माँग होगी; क्योकि सोवियत प्रजातन्त्रकी तुलनामें पूँजीवादी प्रजातन्त्र निकृष्ट है । यह तो पिछली मंजिलकी ओर लौटना होगा। देशकाल- परिस्थितियोके अनुसार ही प्रगति और प्रतिक्रियाका निर्णय हो सकता है, यह स्पष्ट है । सामाजिक घटनाओँके प्रति इस ऐतिहासिक दृष्टिकोणके बिना ऐतिहासिक विज्ञान- का अस्तित्व और विकास असम्भव है। इतिहास विज्ञान-तारतम्य-हीन घटनाओँ- की सूची और क्षुद्रतम भ्रान्तियोंका संकलन न बने, यह इस दृष्टिकोणद्वारा ही सम्भव है।' उपर्युक्त बातोंकी समालोचनामें सबसे पहली बात यह है कि जिस इतिहासके आधारपर द्वन्द्ववादकी कल्पना खड़ी की जाती है, वह इतिहास स्वय किसी सिद्धान्तका साधक या बाधक नहीं हो सकता । इतिवृत्त, ऐतिह्य, इतिहासादि