भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 258

मार्क्सीय द्वन्द्ववाद २४३ शब्द पुरानी घटनाओंके लिये प्रयुक्त होते हैं। 'इति ह आस'—ऐसा था, ऐसी प्रसिद्धि ही इतिहास कहलाता है । वह प्रामाणिक, अप्रामाणिक दोनों ही प्रकार- का होता है । इतिहास यदि प्रत्यक्षानुमानमूलक हो या शब्दमूलक हो तो प्रमाणके निर्दुष्ट होनेसे ही निर्दुष्ट हो सकता है। प्रमाण दुष्ट है तो इतिहास भी दुष्ट ही होता है । प्रायः आजकलके इतिहास दुर्भिसन्धि एव भ्रान्तिपूर्ण होते हैं। इस सम्बन्धमें अनेक पाश्चात्त्य विद्वानोंकी सम्मतियाँ 'भारतमें अंग्रेजी राज्य' पुस्तकमें उद्धृत हैं। किसी सिक्के या खण्डहर आदिके आधारपर ऐतिहासिक कल्पनाओंका महल खड़ा कर दिया जाता है । चतुर लोग अपने विभिन्न उद्देश्योंकी पूर्तिके लिये मनगढन्त इतिहासका निर्माण कर देते हैं । आँखों देखी घटनाओंके सम्बन्धमें विभिन्न संवाददाताओंकी विभिन्न रायें होती हैं । तार, टेलीप्रीन्टर, रेडियो, अखबारों- तक पहुँचते-पहुँचते उनके अनेक रूप बन जाते हैं । फिर इनके आधारपर किसी सत्य घटनाका निर्णय कैसे किया जा सकता है ? ऋतम्भरा-प्रज्ञायुक्त ऋषियोंके इतिहास अवश्य प्रामाणिक कहे जा सकते हैं । वे समाधिके द्वारा सनिकृष्ट, विप्रकृष्ट, स्थूल, सूक्ष्म वस्तुओंका साक्षात्कार कर सकते हैं । परन्तु उनकी दृष्टिमें पुरानी घटनाओंका दुहराना मात्र, 'इतिहास' गड़े मुर्दोंको उखाड़नेके अतिरिक्त और कुछ नहीं । सत्य ऐतिहासिक घटनाओंमें भी समीचीन, असमीचीन, इष्ट, अनिष्ट, उचित, अनुचित कई तरहकी घटनाएँ होती हैं । इसीलिये व्यवहारमें इतिहास प्रमाण नहीं होता, अपितु विधान प्रमाण होता है । इसीलिये रामायण, भारतसे यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि रामादिवत् आचरण करना चाहिये, न कि रावणादिवत् । यही इतिहासका प्रयोजन है। जिन घटनाओंसे राष्ट्र या विश्वको धार्मिक, आर्थिक, चारित्रिक उन्नतिमें सहायता मिलती हो, उन्हीं घटनाओंका इतिहासमें उल्लेख होना उचित है । आज भी विशिष्ट पुरुषोंका ही इतिहासमें उल्लेख होता है । मार्क्स, लेनिन-जैसा अन्य कम्युनिष्टोंका इतिहासमें महत्त्व नहीं । म्युनिसिपलिटीके दफ्तरमें मनुष्यके जन्म मरणका उल्लेख होता है । कीट-पतंगोंका नहीं, क्योंकि उनका महत्त्व नहीं है । सारांश यह है कि इति- वृत्तमात्रसे कोई सिद्धान्त नहीं निकाला जा सकता, क्योंकि इतिवृत्तकी घटनाएँ उचित-अनुचित—दोनों ही ढंगकी हो सकती हैं । विधानमें औचित्य निर्णयके अनन्तर ही कोई ऐतिहासिक घटना स्थान पा सकती है । यदि सूर्योदय सूर्यास्त, चन्द्रमाका ह्रास विकास, समुद्रके ज्वार-भाटादिके नियम सनातन हैं तो कोई सनातन न्याय या सिद्धान्त भी हो ही सकता है, पर व्यक्तिविशेष या परिस्थितिविशेषसे कुछ क्रियाओंमें अन्तर पड़ सकता है । सनातन न्याय एवं सिद्धान्तोंपर इनका कुछ भी असर नहीं पड़ सकता । उष्णता अग्निका स्वभाव है, वह व्यक्ति या परिस्थितिविशेषसे बदल नहीं सकता ।