भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 260

प्रवाह चलाता है । महापुरुष कभी प्रवाहमें नहीं बहते, वे उसे रोककर धर्म- नियन्त्रित बनाते हैं । अतः कभी नास्तिक भौतिकवादियोंका बाहुल्य होता है, फिर आस्तिकपक्ष उठता है । सत्य-अनृत, आसुर-दैव दोनों पक्षोंका कालानुसार उद्भव, अभिभवादि होता रहता है । फिर भी 'सत्यं जयति नानृतम्' के अनुसार अन्तमें सत्य ही जीतता है, भले ही पहले अनृतका बोल बाला फैल गया हो । इसी तरह धर्मकी ही विजय होती है, अधर्मकी नहीं । इसलिये चिरन्तन शाश्वत सत्य सिद्धान्तका अवलम्बन करनेसे ही अनृत-अधर्मका अतिक्रमण किया जा सकता है । एतावता यह कहना सर्वथा असङ्गत है कि 'संसार निरन्तर गतिशील है, पुरातन- का विनाश और नवीनका उदय होता रहता है; पुरातन व्यवस्थाएँ चिरन्तन नहीं हो सकतीं ।' कोई वस्तु स्थायी रहनेपर ही स्थायी कही जा सकती है । स्टालिनका यह कहना भी ठीक नहीं कि 'शोषण और व्यक्तिगत सम्पत्तिके सिद्धान्त शाश्वत सत्य नहीं हो सकते । किसानपर जमीनदारके, मजदूरपर पूँजीपतिके प्रभुत्वका सिद्धान्त त्रिकालाबाध्य नहीं हो सकता; क्योंकि यह एक साधारण वस्तु- का अतिरञ्जित वीभत्स वर्णनमात्र है ।' व्यक्तिगत सम्पत्तिके सिद्धान्तको शोषणका सिद्धान्त नहीं कहा जा सकता । ( आगे चलकर तर्कके आधारपर व्यक्तिगत सम्पत्तिका सिद्धान्त निरूपित किया जायगा, देखिये पृष्ठ २४८ ) । कम्युनिष्टकी दृष्टिमें तो किसी गिरहकट व्यक्तिको रोका नहीं जा सकता और न तो उसका पुनरुत्थान ही सम्भव है । इसलिये उसे और धक्का दे देना चाहिये, जिससे वह शीघ्र ही नष्ट हो जाय ।' इस तरह वे सर्वदा अभ्युदयोन्मुख वर्गके साथी होते हैं । 'बहुजनहिताय, बहुजनसुखाय' बहुमतका सिद्धान्त वहाँ असम्भव है । स्टालिनका कहना है कि '१९ वीं शतीके नवे दशकमें जब मार्क्सवादियों तथा लोक- वादियोंमें सङ्ग्राम चलरहा था, रूसी सर्वहारावर्ग साधारण जनताका एक क्षुद्र अल्प भाग था, इसके विपरीत खेतिहर किसान जनताका बहुसंख्यक भाग था । पर सर्व- हारावर्ग एक विकासमान वर्ग था, जब कि वर्गके रूपमें किसान छिन्न भिन्न हो रहे थे । पर चूंकि सर्वहारावर्ग एक विकासमान वर्ग था, अतः मार्क्सवादियोंने इसीके आधारपर अपनी नीति निर्धारित—स्थापित की । उनकी यह धारणा भ्रान्त न थी । अतएव आगे चलकर यही वर्ग एक क्षुद्र शक्तिसे विकसित होकर उच्च कोटिका ऐतिहासिक और राजनीतिक शक्ति बन गया ।' ( जे० स्टालिनका द्वन्द्वात्मक ऐतिहासिक भौतिकवाद ) पर यह कहना ठीक नहीं । उत्थान पतन संसारका धर्म है । जो सूर्य कभी अस्त होता है, वही उदय होता है । जीवनमें भी ग्रहदशाके अनुसार कभी पतन, कभी उत्थान भी होता है— 'नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण ।' ( मेघदूत २।५० )