भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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खेतिहर किसान वर्गको शोषक भी नहीं कहा जा सकता । उसीकी कमाई सबको खानेको मिलती है । अतः 'बहुजनहिताय, बहुजनसुखाय' उसकी दशा सुधारना क्या उचित न था ? फिर जब कम्युनिष्ट शोषितका ही पक्ष लेता है, तब यह भी कहना होगा कि 'जो सर्वाधिक शोषित हो, उसीका पक्ष लेकर शोषकोंका मुकाबला करना चाहिये ।' इस दृष्टिसे भी सर्वाधिक बहुसंख्यक समाजके हितार्थ प्रयत्न आवश्यक है । फिर केवल सर्वहारा मजदूर समाजका ही पक्षपात क्यों ? पुनश्च, यदि परिणाम सम्बन्धी, क्रमिक-परिवर्तन और अकस्मात् एवं शीघ्रतासे होनेवाले गुण-सम्बन्धी परिवर्तन विकासके नियम हैं तो जैसे सर्वहारावर्गद्वारा की गयी क्रान्ति स्वाभाविक अनिवार्य घटना हो सकती है, वैसे ही खेतिहर वर्ग- द्वारा भी की गयी क्रान्ति महत्त्वपूर्ण क्यों न होगी ? फिर यदि द्वन्द्वमानके अनुसार निर्माण और निर्वाणका क्रम चलता ही रहेगा तो किसी दिन साम्यवाद- की कल्पना भी पुरानी होगी और फिर इसे भी मिटानेके लिये कम्युनिष्टको प्रयत्न- शील होना पड़ेगा । आजकल जो 'सुधारवाद' चलता है, जिसका उद्देश्य प्राचीन वस्तुओंका एकाएक विनाश नहीं, किंतु दोषोंको दूर कर उन्हें अच्छा बनाना होता है, स्टालिन आदिने उसे नगण्य बताया है । समाजवादकी मुख्य तीन प्रवृत्तियाँ हैं—सुधारवाद, अराजकतावाद और मार्क्सवाद । सुधारवाद— ( बर्न्सवीक आदिकी विचारधारा ) समाजवादको बहुत दूरकी बात समझता है । उससे आगे कुछ है ही नहीं । सुधारवाद समाजवादी क्रान्तिको नहीं मानता और शान्तिपूर्ण उपायोंसे समाजवाद कायम करना चाहता है । सुधारवाद वर्गसंघर्षको न मानकर वर्ग- सहयोगका प्रतिपादन करता है । स्टालिनकी दृष्टिमे 'यह सुधारवाद दिन-प्रति-दिन सड़ता ही जा रहा है । समाजवाद और सुधारवादकी सारी समानता दिन-प्रति- दिन खतम होती जा रही है, अतः सुधारवादपर विचार करना ही व्यर्थ है ।' सुधारवादके सम्बन्धमें मार्क्सवादियोंकी यह धारणा है । प्राचीनतावादी सुधार- वादियोंको सर्वथा हेय बताते हैं । भारतमें काग्रेस, हिंदूसभा, जनसंघ आदि सुधार- वादी संस्थाएँ हैं । ये एक तरफ भारतीयता, संस्कृतिकी बातें करतीं और सुधार भी चाहती हैं । उधर, कम्युनिष्ट, सोशलिष्ट आदि अराजकतावादी पार्टियाँ सर्वथा परिवर्तनकर महाक्रान्ति चाहती हैं । रामराज्यादि पार्टियाँ शास्त्रों और परम्पराके अनुसार सनातन संस्कृति, धर्म एव राजनीतिमें सिद्धान्ततः तिलभर परिवर्तन नहीं चाहतीं । इनमें सुधारवादी किभी सिद्धान्तपर स्थिर नहीं हैं । रामराज्यवादी ईश्वर एव धर्म आत्माको ही आधारभित्ति मानकर चलते हैं । अपौरुषेय वेद एवं तन्मूलक आर्षग्रन्थ तथा तदविरुद्ध तर्कके आधारपर तत्त्वका निर्णय करते हैं । भौतिकवादी आत्मधर्मशास्त्रादिनिरपेक्ष, तर्क, प्रत्यक्ष एवं विज्ञानके आधारपर