भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्सीय द्वन्द्ववाद २४७ तत्त्व-निर्णय करते हैं । पर सुधारवादी बीच-बीचमें रहना चाहते हैं । फलतः वे दोनों पक्षोंहीसे उपेक्षित रहते हैं । उनमेंसे कुछको अन्तमें भौतिकवादकी ओर जाना पड़ता है और कुछको अध्यात्मकी ओर । अराजकतावादीका कहना है कि 'जबतक व्यक्तिको स्वतन्त्रता नहीं मिलती तबतक जनताको स्वतन्त्रता नहीं मिल सकती । अतः सब कुछ व्यक्तिके लिये होना चाहिये ।' मार्क्सवादी कहता है कि 'जनताकी स्वतन्त्रतासे ही व्यक्तिको स्वतन्त्रता मिलती है । अतः सब कुछ जनताके लिये ही होना चाहिये ।' पर रामराज्यवादीकी दृष्टिमें व्यक्ति और समाज दोनोंका समन्वय ही ठीक है । समष्टिकी सुख-समृद्धि और स्वतन्त्रतासे व्यक्तिके अभ्युदयमें सुविधा होती है । अनुकूल साधन और वातावरणसे आदमी उन्नतिके मार्गमें अग्रसर हो सकता है । इसके साथ ही जैसे एक-एक वृक्ष कट जानेसे वन कट जाता है, एक-एक सैनिक कट जानेसे सेना कट जाती है, वैसे ही एक-एक व्यक्तिके धनवान्, बलवान् बन जानेसे समष्टि बलवान्, धनवान् बन जाता है । व्यक्तियोंके निर्धन, अयोग्य हो जानेसे समष्टि निर्धन एव अयोग्य हो जाता है । जहाँ व्यष्टि समष्टिके हितोंमें विरोध हो, वहाँ समष्टिके अविरुद्ध ही व्यष्टिको आत्महित-साधनमें प्रवृत्त होना अनिवार्य होगा । व्यक्तिको समाजहितका, समाजको राष्ट्रहितका, राष्ट्रको विश्वहितका ध्यान रखना अनिवार्य होगा । समष्टिको हानि पहुँचाकर आत्महित साधना निन्द्य समझा जायगा । मार्क्सवादियोंके मतानुसार 'सुधारवादी न होकर क्रान्तिवादी होना चाहिये । विकासका क्रम आन्तरिक असंगतियोंके खुलनेसे आगे बढ़ता है । इन असंगतियोंपर विजय पानेके लिये इन्हींके आधारपर विरोधी शक्तियोंमें संघर्ष होता है । अतः मजदूरोका वर्ग-संघर्ष स्वाभाविक तथा अनिवार्य घटना है । इसीलिये पूँजीवादी असंगतियोंपर पर्दा न डालकर उन्हें खुलासा करना चाहिये । वर्ग-संघर्ष रोकनेका प्रयत्न न कर उसे उसके अन्तिम परिणामतक ले जानेका प्रयत्न करना चाहिये । अतः बिना मुलाहिजेकी सर्वहारा श्रेणी वर्गनीतिका पालन आवश्यक है ।' सर्वहारा और पूँजीवादियोंके हित-सामञ्जस्य करते ही सुधारवादी नीति या पूँजीवाद- के समाजवादमें विकसित होनेकी समझौतावादी नीतिका अनुसरण उचित नहीं है । इसे ही समाजके जीवन एव इतिहासपर लागू की जानेवाली द्वन्द्वात्मक प्रणाली कहा जाता है । रामराज्यवादी सर्वत्र अनिन्दित व्यक्ति या वर्गोंमें सामञ्जस्यके साथ अभ्युदयोन्मुखी प्रगतिको श्रेयस्कर समझते हैं । वर्गसंघर्ष दुष्प्रचारमूलक ही होता है । मन्थराने राम और भरतमें फूट डालकर संघर्ष डालना चाहा, पर सफल न हुई । इसी तरह अच्छे लोगोंमें वर्गवाद सफल नहीं होता ।