मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ मार्क्सवाद और रामराज्य
वह प्रयोग और विवेककी कसौटीपर कसता है, पर वह शब्दप्रमाणसे मान्य नही हो सकता। यो प्रत्यक्षानुमानकी शिक्षाके लिये अपेक्षित शिक्षकका जो मूल्य है, वही इनके मतानुसार आप्तोपदेशका मूल्य है। कुछ आधुनिक वेदप्रामाण्यवादी वेदोका प्रामाण्य इसलिये मानते हैं कि वेदोक्त अर्थ प्रयोग और विवेककी कसौटीपर खरे उतरते हैं। परन्तु वास्तविक वेदप्रामाण्यवादियोका कहना है कि जिस प्रयोग और विवेकके आधारपर वेदोक्त अर्थका सौष्ठव एव सत्यता सिद्ध की जाती है, उसी आधारपर वेदोक्त अर्थका परिज्ञान भी सम्पादित किया जा सकता है। फिर उसके लिये वेदप्रामाण्यकी कोई आवश्यकता नही ठहरती। जैसे नेत्रसे अवगतरूपके लिये दूसरे प्रमाणकी आवश्यकता नहीं होती। अज्ञातज्ञापकता ही प्रमाणोका मुख्य प्रामाण्य होता है। प्रयोग और विवेकसे जो वस्तु ज्ञात हो, उसका ज्ञापक वेदवाक्य ज्ञातज्ञापक होनेसे अनुवाद ही ठहरता है। देकार्तने भी बेकनका अनुवर्तन करते हुए 'धर्मबन्धनसे विनिर्मुक्त' ही दर्शनका प्रवर्तन किया। उसके मतसे 'ईश्वर भी बुद्धिसे अतीत [ परे ] नही है।' विश्वसृष्टिके लिये उसने यान्त्रिक सिद्धान्त स्वीकृत किया है। पृथिवीकी गतिके दृष्टान्तसे वस्तुओ एव उनकी गतियोसे ही विश्वकी सृष्टि उसने सिद्ध की है। उसके मतमे 'विस्तार पदार्थोंका मुख्य गुण है, इसलिये जहाँ विस्तार हो, वहाँ भी पदार्थका अस्तित्व मान लेना चाहिये। इसलिये रिक्त स्थान है ही-नही। जो स्थान रिक्त समझा जाता है, वह कोणमुक्त कणोसे भरा हुआ ही है और सभी गतिमान् पदार्थ पारस्परिक सघर्षसे 'कोणत्व' के मिट जानेपर वृत्ताकार और सूक्ष्म हो जाते हैं। उन्हींसे सूर्य तथा अन्य प्रकाशवान् वस्तुएँ होती हैं। कुछ विलक्षण प्रकारके उन्ही कोणत्वहीन पदार्थोसे आकाशकी भी उत्पत्ति होती है। तीसरे प्रकारके उन्ही पदार्थोंसे, जो स्थिरप्राय होते हैं, पृथ्वी उत्पन्न होती है, जिसमे प्रकाशकी किरणोका प्रवेश नहीं हो पाता। इनकी गतियाँ वृत्ताकार आवर्त-जैसी होती हैं। बड़ी वस्तुएँ भँवरके बीचमे रहती हैं, छोटी उनके चारो ओर। भँवरकी इस गतिसे ही नक्षत्र सूर्यके चारो ओर चक्कर काटते रहते हैं।' पर चेतनानधिष्ठित किसी भी प्रकारके पदार्थोसे व्यवस्थित सृष्टिका होना असगत है; क्योकि कुलालादिसे अधिष्ठित मृत्तिकादिसे ही घटादिकी उत्पत्ति होती है। सारथिसे अधिष्ठित रथादिकी व्यवस्थित प्रवृत्ति होती है। इसलिये ईश्वर आवश्यक है। देकार्तको भी यह मानना पड़ा। वह ईश्वर बुद्धयतीत होते हुए भी बुद्धिगम्य हो सकता है। सृष्टिकर्तृत्वादिसे उसका अनुमान होता ही है। जहाँतक आकाशकी उत्पत्तिकी बात है, वहाँ आकाश यदि अवकाशात्मक, आवरणात्मक हो तो उसकी कल्पना निरर्थक है। क्योंकि निरवयव पदार्थकी उत्पत्तिमें कोई