भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पाश्चात्त्य-दर्शन ३५ प्रमाण नहीं है । शब्दसमवायिकारण आकाश निरवयव एव व्यापक है । इसलिये नैयायिकों तथा वैशेषिकोंके मतानुसार आकाशकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । वेदान्त- मतानुसार यद्यपि आकाशकी उत्पत्ति होती है, तथापि वह आकाशसे भी सूक्ष्म एवं अमूर्त अहंतत्त्वका ही परिणाम है । परमाणु, अन्य भूतों या किन्हीं कणोंसे आकाशकी उत्पत्ति तो सर्वथा असंगत एव निराधार है । 'ज्ञान कहाँसे प्राप्त होता है और किस प्रकारका होता है' यह दार्शनिकोंका मुख्य प्रश्न है । 'मनमें कुछ निश्चित सिद्धान्त सुस्थिर रहते ही हैं, बुद्धि उन्हींका अनुगमन करती है और पदार्थोंके सत्य-ज्ञानके विषयमें सत्य-ज्ञान उत्पन्न होते हैं—यही देकार्त्त- का 'प्रज्ञावाद' है । 'जिस प्रकार गणितका सारा प्रपञ्च कुछ निश्चित सिद्धान्तोंके आधार- पर चलता है, उसी प्रकार सारा-का-सारा दार्शनिक प्रपञ्च बुद्धिके आधारपर चलता है, यह कहा जा सकता है।' दूसरे पक्षका कहना है कि 'यदि विश्वकी सारी समस्या गणितकी ही जैसी हो तो ऐसा कहा जा सकता है, परंतु ऐसा है नहीं।