भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पाश्चात्त्य-दर्शन ३५ प्रमाण नहीं है । शब्दसमवायिकारण आकाश निरवयव एव व्यापक है । इसलिये नैयायिकों तथा वैशेषिकोंके मतानुसार आकाशकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । वेदान्त- मतानुसार यद्यपि आकाशकी उत्पत्ति होती है, तथापि वह आकाशसे भी सूक्ष्म एवं अमूर्त अहंतत्त्वका ही परिणाम है । परमाणु, अन्य भूतों या किन्हीं कणोंसे आकाशकी उत्पत्ति तो सर्वथा असंगत एव निराधार है । 'ज्ञान कहाँसे प्राप्त होता है और किस प्रकारका होता है' यह दार्शनिकोंका मुख्य प्रश्न है । 'मनमें कुछ निश्चित सिद्धान्त सुस्थिर रहते ही हैं, बुद्धि उन्हींका अनुगमन करती है और पदार्थोंके सत्य-ज्ञानके विषयमें सत्य-ज्ञान उत्पन्न होते हैं—यही देकार्त्त- का 'प्रज्ञावाद' है । 'जिस प्रकार गणितका सारा प्रपञ्च कुछ निश्चित सिद्धान्तोंके आधार- पर चलता है, उसी प्रकार सारा-का-सारा दार्शनिक प्रपञ्च बुद्धिके आधारपर चलता है, यह कहा जा सकता है।' दूसरे पक्षका कहना है कि 'यदि विश्वकी सारी समस्या गणितकी ही जैसी हो तो ऐसा कहा जा सकता है, परंतु ऐसा है नहीं।

१६ मार्क्सवाद और रामराज्य वे केवल बुद्धिसे ग्रहण कर ली जाती हैं और वे मनुष्योको स्वतःसिद्ध हैं, अतः प्रमाण-निरपेक्ष होकर भी सत्य है।' वस्तुतः सत्यताका निर्णायक प्रमाण ही होता है, क्योकि प्रमाके कारणको प्रमाण कहते है और अज्ञात अबाधित असदिग्धविषयक ज्ञान ही प्रमा शब्दसे कहा जाता है । उस प्रमाके कारणको ही प्रमाण कहा जाता है। सहज प्रत्यय भी तो चक्षुरादि प्रमाणोसे ही उत्पन्न होंगे । इसीलिये सहज प्रत्ययो- मे भ्रम, प्रमा आदि विभाग होगे । देकार्तेके मतमें जिस वस्तुका बुद्धिमे स्पष्ट अवभासन हो, उसीका सत्य ज्ञान होता है, परंतु यहाँ यह विच्चारणीय है कि किसीकी बुद्धि या मनमे जो भासित होगा वह दूसरेकी भी बुद्धि या मनमे भासित हो यह अनिवार्य नही । यदि प्रत्येककी बुद्धिमे जो भासित हो उसीको सत्य मान ले, तो भिन्न-भिन्न बुद्धियोमे भिन्न भान होनेके कारण वस्तुका रूप ही विकृत हो जायगा । फिर भी अन्य सभी वस्तुओमे सदेह करनेवाला भी अपनेमे कोई सदेह नही करता । 'सदेह करनेवाला कोई मनन करनेवाला है' यह तो असदिग्ध ही है । यहाँ भी सदेह आदिका भासक कोई है, यह तो मानना ही पड़ेगा और वह अपरिवर्तनशील ही हो सकता है, अतः चेतनावान् पुरुषको भी देकार्त्तने माना है। ह्यूमका कहना है कि 'काम, सकल्प, लज्जा, भय इत्यादि मानसिक भावोकी जिस प्रकार अनुभूति होती है, उस प्रकार उसके भासक पुरुषकी अनुभूति नही होती । यदि ऐसी कल्पना की जाय कि ये मानसिक भाव मणितुल्य हैं और आत्मा- रूपी सूत्रमे निबद्ध ह, तब भी मणिस्थानीय भावोके समान सूत्रस्थानीय आत्माकी भी उपलब्धि तो आवश्यक ही रहती है और यह सूत्रस्थानीय आत्मा उपलब्ध होता नही, अतः उसका अस्तित्व ही नही है।' साथ ही इस पक्षमे बाह्य वस्तुकी अपेक्षा मनके मननकर्तृत्वसे स्वात्मज्ञान ही अधिक है । इस प्रकार ससारके मानसिक कल्पनामात्र होनेसे वस्तुत्वकी ही सिद्धि न होगी । तब फिर मनको पूर्णरूपेण शरीरसे भी पृथक् मानना पडेगा । ऐसी भ्रान्ति बहुतोको हुई है । वस्तुतः सर्वभासक साक्षी उपलब्धि अथवा भानस्वरूप होनेसे भानान्तरनिरपेक्ष ही सिद्ध है । वस्तुका प्रकाश दो प्रकारसे होता है । एक प्रकाशस्वरूप होनेसे और दूसरा प्रकाशसे ससर्ग होनेसे । जैसे घटादिमे 'प्रकाशके ससर्गसे प्रकाशित होता है, ऐसा व्यवहार होता है और प्रकाशमे संसर्गान्तर बिना ही 'स्वतः ही प्रकाशित होता है' ऐसा व्यवहार होता है । इसी तरहसे प्रकाशान्तर या बोधान्तरका विषय न होनेपर प्रकाशस्वरूप होनेसे 'प्रकाशित होता है', ऐसा व्यवहार सगत है और मणियोके बीच सूत्रोपलब्धिके समान विविध बोधवृत्तियोकी सधियोमे निर्विकल्प बोधस्वरूप स्वतः भासमान रहता ही है। गतिविज्ञानवादियोकी दृष्टिमें यन्त्रादिकी अपेक्षा गति ही पहलेसे निर्धारित है। शरीर- के यन्त्ररूप निर्मित होनेके कारण उनकी भी गति वैसे ही पूर्वनिर्धारित ही है। मन भी

पाश्चात्त्य-दर्शन १७ यदि शरीरसे अभिन्न वस्तु हो, तो उसकी भी वैसी ही गति सिद्ध हो जाय। पृथक्त्ववादियोंके मतमे मन शरीर-प्रभावसे अस्पृष्ट ही रहता है। देकार्त्तके मतसे 'मन और वस्तु दोनो ही ईश्वरनिर्मित हैं। चिन्तन मनकी विशेषता है और विकास वस्तुकी। ये दोनों परस्पर भिन्न होनेके कारण एक दूसरेसे अत्यन्त अप्रभावित रहते है। जिस प्रकार दो घटिकायन्त्र स्वतन्त्ररूपसे नाद करते हैं, अतः एक साथ नाद करनेपर भी उनका सम्बन्ध नही माना जा सकता, उसी प्रकार मन एव शरीरकी घटनाएँ यद्यपि एक दूसरेके अनुरूप होती हैं, तथापि उनका कोई पारस्परिक सम्बन्ध नही है। परमेश्वरकी कृपासे ही मन और शरीर दोनोकी क्रियाओमे सामञ्जस्यसे जीवन चलता है।' इस प्रकार भौतिकवाद तथा आदर्शवाद--ये उस [देकार्त्त] के दर्शनकी दो धाराएँ हैं। स्पिनोजा [१६३२-१६७७ ई०] भौतिकवादका प्रवर्त्तक हुआ और लाइवनिट्स [१६४६ ई०] आदर्शवादका। स्पिनोजाके मतसे 'प्रज्ञा ही सबसे उत्कृष्ट है। उसीके द्वारा धर्मग्रन्थके विषयोकी भी परीक्षा की जानी चाहिये। प्रज्ञासे वस्तुओके सम्बन्धोका अन्वेषण करना चाहिये। प्राकृतिक घटनाओके आन्तरिक सम्बन्धके बतलानेमे अप्राकृतिक शक्तिका हस्तक्षेप अनुचित है। इसके मतसे आध्यात्मिक, मानसिक एव भौतिक ऐश्वर्य आदि सभी भाव प्रकृतिमे ही अन्तर्भूत हो जाते हैं और इस प्रकार ईश्वर अथवा प्रकृति एक ही है। सम्पूर्ण ही ईश्वर है, ईश्वर ही सम्पूर्ण है। घटनाओका ऐक्य केवल उनके अस्तित्वमात्रका है, जो नियमानुवर्ती है। भूतो तथा आत्माओका पूरा साम्य है। उनमे ईश्वरकी सत्ता है, अतः भूत आत्ममय ही हुए। सीमित वस्तुएँ एव घटनाएँ अपने अतिरिक्त असंख्य वस्तुओ एव घटनाओसे सम्बद्ध है। इनके समूहका ज्ञान अत्यन्त दुष्कर है, अतः किसी न किसी स्वात्मनिर्भरकी सत्ता मानना आवश्यक है। इस प्रकार मूल पदार्थका वैविध्य नहीं रह जाता। साथ ही इस पक्षमे शून्यकारणतावादका परिहार बड़ी सरलतासे हो जाता है। पूर्ण अनन्त ईश्वर अथवा पूर्ण अनन्त प्रकृतिसे बहिर्भूत अन्य कुछ नहीं रह जाता--ईश्वर ही सम्पूर्ण है। इसमे अन्तर इतना ही है कि कार्य कारणसे अभिन्न अर्थात् अनन्य हो सकता है, परन्तु कारण कार्यसे अभिन्न नहीं होता। जैसे हाटक (सोना) से भिन्न कटक, मुकुट, कुण्डलादि नहीं हैं, पर कटक, मुकुट आदिके बिना भी हाटक रहता है। अतः हाटकको उनसे अभिन्न नहीं कहा जा सकता। इसी तरहसे सम्पूर्ण जगत् परमेश्वरसे अभिन्न है। पर जगत्के बिना भी वह परमेश्वर रहता है। अतः वह जगत्से अभिन्न नहीं कहा जा सकता और प्रकृति तथा ईश्वरमे इतना भेद है कि स्वतन्त्र और चेतन ईश्वर है, किंतु अचेतन चेतनाधिष्ठित प्रकृति है। सृष्टिचक्रके बाहर कोई अप्राकृत वस्तु नहीं है और प्रकृतिका स्वभाव चञ्चल है। सभी शक्तियाँ उसीमे विलीन रहती हैं। सारी-की मा० रा० २--

१. प्रथम खण्ड: द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) की दार्शनिक समीक्षा

१८ मार्क्सवाद और रामराज्य गरी शक्तियाँ परमेश्वरकी अङ्गभूता हैं । व्यापकता तथा मननशक्ति इन दोका अनुभव लोगोंको होता है । भौतिक पदार्थ तथा घटनाएँ व्यापकताशक्तिमे एव मन तथा उसकी अनुभूतियाँ मननशक्तिमे अन्तर्भूत हो जाती हैं । एक ही अन्तिम सत्ताके विभिन्न रूप होनेके कारण तथा समानकालिक होनेके कारण मन तथा शरीर परस्पर क्रिया-प्रतिक्रियावान् हैं । पदार्थगतिके अनुरूप ही मनोगति होती है । बाह्य नियमबन्धनका प्रतिविम्बमात्र ही आन्तरिक-नियमबन्धन है । बुद्धिमें जिसकी धारणा होती है, बाहर भी उसकी सत्ता होती है । साथ ही, कार्यकारणभाव सर्वत्र है । जैसे लौहका कूट ( निहाई ) आदिके द्वारा ताड़नादि होता है, वैसे ही कूटादिका भी अन्य साधनोसे ही निर्माण होता है । वैसे ही उन साधनोका भी निर्माण साधनान्तरोसे ही होता है—यों कार्य-कारणभावकी कहीं समाप्ति नहीं । समान गुण हुए बिना दो वस्तुएँ परस्पर प्रभावोत्पादक नहीं हो सकती । इसलिये आत्मा एव भूतोके पारस्परिक प्रभावो- त्पादनके लिये उनका समानगुणत्व मानना होगा । यो मूलतः दोनो एक ही हैं । आन्तर कारणके सम्बन्धमें स्पिनोजाकी दृष्टिसे 'किसी प्रयोजनके बिना मन्द व्यक्ति भी किसी कार्यमें प्रवृत्त नहीं होता, अतः प्रवृत्ति सोद्देश्य होनी चाहिये । जैसे नेत्र देखनेके लिये बनाये गये हैं, दाँत चबानेके लिये, सूर्य प्रकाशके लिये, ऐसे ही सभी वस्तुएँ मानवीय उपयोगके लिये ही बनी हैं । उपयोग करने योग्य वस्तुएँ अपने प्रयत्नके बिना ही मिल गयीं, इसलिये यह कल्पना की जाती है कि वे किसीके द्वारा बनायी गयी होगी । निर्माताके बिना ही स्वतः उत्पन्न हो गयी होगी ऐसा विश्वास जल्दी नहीं होता; क्योकि वैसा देखा नहीं जाता । जैसे हमलोग अपने उद्योगके लिये वस्तुओका निर्माण करते हैं, वैसे ही प्रकृतिके अधीश्वरने हमलोगोपर अनुग्रह कर वस्तुओका निर्माण कर दिया—ऐसे निरूढ संस्कारसे ईश्वर सिद्ध हो जाता है ।' इसपर भौतिकवादियोका यह कहना है कि "सब वस्तुएँ परमेश्वरके अनुग्रहसे उत्पन्न हुई हैं' यह इसलिये नहीं कह सकते कि बहुत-सी ऐसी भी वस्तुएँ मिलती हैं, जो उपयोगार्ह नहीं हैं, प्रत्युत विघातक हैं । यथा—विष, भूकम्प, व्याधि आदि । यदि कहा जाय कि 'ये वस्तुएँ परमेश्वरके कोपमूलक हैं' तो वह भी ठीक नहीं, क्योकि वैसा माननेपर धार्मिको एव ईश्वरभक्तोपर इनका कोई प्रभाव न पडना चाहिये था । पर देखा यह जाता है कि धार्मिक और अधार्मिक सब उपद्रव- ग्रस्त होते हैं । दूसरा मार्ग खोजनेकी अपेक्षा अन्धकारमें पड़े रहना ही सुखकर है ऐसा सोचकर आदर्शवादी वहीं पड़े हैं ।" यह भौतिकवादियोका प्रलाप है । वास्तवम सुख-दुःख धर्माधर्ममूलक हैं ( सुखका मूल धर्म और दुःखका मूल अधर्म है ) । व्यष्टिके पापोसे व्यष्टिको दुःख

और समष्टि पातकोंसे समष्टिदुःखजनक उपद्रवोंकी उत्पत्ति होती है, यह सर्वथा निर्दोष सिद्धान्त है। इस स्थितिमें धार्मिक होनेपर भी दुःख आनेपर कालान्तरीय पातकोंकी कल्पना की जा सकती है, जो फलवलकल्प्य है। इस प्रकार कोई दोष नहीं रह जाता। ऐसे प्रलापोंका समाधान बहुत पूर्वसे होता आ रहा है। मनुने पापी पुरुषोंको सुखी और कदाचित् धर्मात्माओके दुखी होनेकी शङ्कापर बतलाया है कि ऐसी बात देखकर भी अधर्मसे बचना चाहिये। क्योकि पहले अधर्मसे कभी-कभी वृद्धि देखी जाती है, पर उसका कारण व्यक्तिके प्राक्तन सुकृत हैं। उनका फल समाप्त होते ही उसका समूल विनाश हो जाता है-- अधर्मैनेधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति । ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति ॥ नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव । शनैरावर्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति ॥ न सीदन्नपि धर्मेण मनोऽधर्मे निवेशयेत् । अधार्मिकाणां पापानां शीघ्रं पश्यन् विपर्ययम् ॥ ( मनु० ४ । १७४, १७५, १७१ ) पापीके बड़े-बड़े पुण्योंका फल तनिक सुखमे समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार पुण्यात्माके बड़े-बड़े पाप साधारण कष्टभोगोंसे समाप्त हो जाते हैं। पापीको जहाँ साम्राज्यप्राप्तिकी बात थी, वहाँ उसे पाप करते एक अशर्फी मिलकर रह जाती है। यो ही पुण्यात्माको जहाँ मरण-जैसा भयङ्कर कष्ट आना होता है, वहाँ पुण्य करते काँटा चुभकर रह जाता है। प्रज्ञा (बुद्धि) में भी भ्रम आदि दोष देख पड़ते ह, अतः उसका भी प्रामाण्य ऐकान्तिक नहीं है। अनुभवके अतिरिक्त भी कोई विचारमार्ग है या नही ? इस प्रश्नके उत्तरमे अध्यात्मवादी कहते हैं 'है', भौतिकवादी कहते ह 'नहीं है' । हाब्सने सब वस्तुओकी व्यवस्था यान्त्रिक सिद्धान्तानुसार बतलायी। उसके मतानुसार 'केवल वस्तुएँ और गतियाँ ही सत्यभूत हैं और सब इन्हींका विकार- समुदाय है। ज्ञान भी उसीमे अन्तर्भूत हो जाता है। इन्द्रियानुभूति ही ज्ञान है। वस्तुओके द्वारा इन्द्रियाक्रान्ति ही अनुभूति है। यह भी गतिविशेष ही है। मन भी भौतिक ही है। सभी वस्तुओका यह मूलभूत गुण है कि वे अपनी वर्तमान अवस्थामे रहती हैं। वह अवस्था गतिरहित हो या गतिमती हो यह दूसरी बात है।' हाब्सके मतमें 'मानव कल्पनाशक्तिके सीमित ही होनेके कारण किसी भी वस्तुकी असीम धारणा सम्भव नहीं है। इसलिये सीमारहित शक्ति या सीमारहित समय नहीं है। कहीं-कहीं असीम शब्दका जो प्रयोग होता है, उसका यही तात्पर्य होता है कि हमें उसकी सीमाका ज्ञान नहीं है। इन्द्रियानुभूतिका विषय न हो ऐसा कोई भी धारणाका विषय ( संभव ) नही हो सकता।' लाइबनिट्सने भौतिकवादका खण्डन करनेके लिये संशोधित रूपसे परमाणु- वादकी प्रतिष्ठापना की। निर्जीव भूतोमे सृष्टि नहीं हो सकती, यह सिद्ध करनेके लिये उसने 'मोनाड' नामके अनुभवशक्तियुक्त आध्यात्मिक अणुओको ही सृष्टिका कारण

माना। यान्त्रिक नियमोंका अनुवर्त्तन करनेवाले इन असंख्य और असमान अणुओंका अन्योन्य प्रभाव न होनेपर भी परमेश्वरकी महिमासे परस्पर सम्बन्ध अवभासित होता है। जिस प्रकार अनेक घटीयन्त्र (घडियाँ) समान रूपसे कालनिर्देशन करते हैं, वैसे ही इन अनन्त असंसृष्ट अणुओंके विषयमे भी समझना चाहिये। कार्य-कारणकी परम्परा ईश्वरमें जाकर समाप्त हो जाती है, क्योकि मूलका मूल नहीं हुआ करता। इसलिये जो सबका मूल है उसे स्वयं अमूल (मूलरहित) ही होना चाहिये। कार्य-कारणपरम्पराके नियमानुवर्त्ती होनेके कारण सृष्टिमें परमेश्वरका हस्तक्षेप नहीं होता। ये 'मोनाड' नामके अणु ही अन्तर्निहित शक्तियोंद्वारा जीव, अजीव, पशु, मनुष्य आदिके रूपमे विकसित होते हैं। 'मोनाड' मन और शरीर तथा पशु और मनुष्यके भेदको दूर कर देता है। बाह्य वस्तुएँ प्रत्यक्ष अनुभूतिके विषय हैं, अतः उनका मनसे पृथक् रूपमे अस्तित्व है और उससे मन प्रभावित होता है। उसीसे बाह्य वस्तुओंका प्रत्यक्षीकरण होता है। परंतु ऐसा माननेपर 'एक मोनाड दूसरे मोनाडोंसे प्रभावित नहीं होता' यह सिद्धान्त खण्डित हो जाता है। इसलिये वह प्रक्रिया ठीक नहीं। घड़ीके समान परस्पर सम्बन्ध न रहनेपर भी समान क्रिया हो सकती है—यह उपपत्ति तो दी ही जा चुकी है। इसलिये आत्मनिष्ठ घटनाका ही अनुभव होता है। बाह्यानुभूति तो माया ही है। काम, सकल्प आदिके समान बाह्य वस्तु भी मानस (मानसिक) ही है। मनुष्य-शरीर असंख्य मोनाडोंसे संघटित है। इसका नियामक मन या आत्मा एक ही मोनाडसे बना है। विश्वके सम्बन्धमे मोनाडोंका विचार समानरूप- में व्यक्त नहीं होता। अग्निसे दो हाथकी दूरीपर स्थित व्यक्तिको उष्णताकी अनुभूति होनेपर प्रतीत होता है कि औष्ण्य अग्निका गुण है। उससे भी अधिक निकट जानेपर औष्ण्यकी अभिवृद्धि हो जानेपर देहमें पीडा भी होने लगती है। वह संनिधान या नैकट्यका ही गुण हो सकता है, अग्निका नहीं। पीडा तो उष्णताका ही उत्कट रूप है। अतः औष्ण्य अनुभूतिविशेष ही हुआ, अग्निका गुण नहीं। कुछ कीटाणुओंकी टाँगे इतनी सूक्ष्मतम होती हैं कि वे सूक्ष्मवीक्षण-यन्त्रसे ही देखी जा सकती हैं परंतु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि उन [कीटाणुओ] को भी अपनी टाँगे सूक्ष्मवीक्षणयन्त्रसे ही ज्ञात होती है। इसलिये द्रष्टाके मनके गुणों- के अनुसार ही सूक्ष्मता या दीर्घता प्रतीत होती है। इसीलिये कीटाणुके मनके लिये दृश्य कुछ और है, हमारे मनके लिये दृश्य कुछ और है। किंतु इतने मात्र- में उस टाँगकी लम्बाई दो प्रकारकी नहीं हो जाती। परंतु सिद्ध यह होता है कि परिमाण दृष्टिका गुण है, दृश्य वस्तुका गुण नहीं। कारण, वह द्रष्टाके मनसे सापेक्ष है। जो आपाततः गुण प्रतीत होते हैं, विचार करनेपर वे मनकी अनुभूतिके

पाश्चात्य-दर्शन २१

• अतिरिक्त और कुछ नहीं रह जाने । दर्शन श्रवण आदिके स्वरूपका विचार करने- पर भी यही निश्चय होता है । जैसे—वस्तुओंकी आलोककिरणें स्नायुओंके सूक्ष्म दृष्टिमन्त्रोंपर पडती हैं । उसमे स्नायुओमे गति उत्पन्न होती है । उसस मस्तिष्कगत कणोंमे स्पन्दन उत्पन्न होता ह । उसीमे किसी प्रकार चेतना उत्पन्न हो जाती है । यही वस्तुदर्शन कहलाती है । इसी प्रकार शब्दका, जो वायुमण्डलीय स्पन्दनविशेष है, कर्णशष्कुलियोंसे सम्बन्ध होता है, जिसमे मस्तिष्क प्रभावित होता है । उससे मस्तिष्कस्थित स्नायु-कणोंमें गतिसमूह उत्पन्न होता है, उससे चेतना । इसीको 'श्रवण' कहते हैं । मस्तिष्क गहरे तमसे आच्छन्न कमरे- सरीखा है । उसमें एक सुदीप्त पट है, जिसका दीपन करनेवाली चेतना है । अनुभूयमान बाह्य विषय इन्द्रियोंको उत्तेजित करते हैं और वे मस्तिष्कगत स्नायुओं- को उत्तेजित करती हैं । उससे उत्पन्न चेतनाके द्वारा उद्दीप्त हुए पटपर वस्तुकी प्रतिकृतियाँ अभिव्यक्त हो जाती हैं । 'वस्तुओंका ज्ञान प्राप्त किया जाता है, इसका अर्थ यह है कि वस्तुओंके चित्र—प्रतिकृतियाँ—मस्तिष्कस्थ प्रदीप्त पटपर व्यक्त होती हैं । चेतनाके द्वारा उज्ज्वलित पटपर प्रतिफलित वस्तुकी प्रतिकृति ही ज्ञान है । सांख्य योग तथा वेदान्तके मतानुसार इन्द्रियोंद्वारा प्रत्युपस्थापित शब्दादि-विषयाकाराकारित वृत्तिसे युक्त अन्तःकरणमे प्रतिबिम्बित असङ्ग पुरुषका अपने प्रतिबिम्बके साथ तादात्म्याभिमानके द्वारा विषयोपरागाभिमान उत्पन्न होता है । जैसे जपाकुसुमसे उपरक्त हुआ स्फटिक स्वनिष्ठ प्रतिबिम्बमें अपना आकार समर्पित कर देता है । तथा च वृत्तियुक्त अन्तःकरणमें स्थित विषयाकारताका प्रतिबिम्बमें भान होता है । इसलिये प्रतिबिम्ब भी रक्त हो जाता है ओर उसके तादात्म्याभिमानसे बिम्ब भी अपने आपको रक्त मानता है । दर्पणगत मालिन्यके कारण दर्पणान्तर्गत प्रतिबिम्बमें भी मलिनता प्रतीत होती है । प्रतिबिम्बके साथ तादात्म्याभिमानवान् होनेके कारण 'मेरा मुख मलिन है' यह समझकर बिम्ब भी चिन्तित होता है । उसी प्रकार विषयोपरक्त अन्तःकरणमें पुरुषका प्रतिबिम्ब है, अतः उस प्रतिबिम्बके साथ तादात्म्याध्यास ( अभेदाध्यास ) के कारण बिम्बमें भी विषयोपरागका अभिमान होता है । इस तरह असङ्ग स्वप्रकाश चेतनमे विषयोपरागद्वारा विषयका प्रकाश होता है । ज्ञाताका मन प्रथम पदार्थ है, बाह्य वस्तु द्वितीय तथा चेतनोज्ज्वलितपट- प्रतिबिम्बित चित्र या प्रतिकृति तृतीय । मन प्रतिकृतिको तो जानता है, पर बाह्य वस्तुको नही, क्योंकि प्रथम एव तृतीय द्वितीयके बाधकके रूपमें उपस्थित हैं । ऐसी दशामे प्रश्न उठता है कि फिर द्वितीयका अस्तित्व माना जाय या नहीं । यदि द्वितीय जाना ही नहीं जा सकता तो फिर उसीसे तृतीय उत्पन्न कैसे हो जाता है यह

वाचोयुक्ति भी संगत मालूम होती है। अन्य लोगोंका कहना है कि बाह्य वस्तु अनुभूतिके कारणके रूपमे मान लेना चाहिये, क्योकि उसके बिना अनुभूतियोंमे वैचित्र्य उपपन्न नही होता। औरोका कहना है कि वासनाओके वैचित्र्यसे ही उन अनुभूतियोंके वैचित्र्यकी उपपत्ति दी जा सकती है। कुछ लोगोंका कहना है कि यद्यपि विज्ञानके अतिरिक्त और कुछ अनुभवका विषय नहीं होता, तथापि विज्ञानके वैचित्र्यकी उपपत्तिके लिये जब उसे मान लेना पडता है, तब स्वातन्त्र्येण भी उसकी कही सत्ता होगी ऐसा मान लेना चाहिये। बौद्धोंमे कोई क्षणिक बाह्य और आन्तर दोनो पदार्थ मानते हे। कुछ लोग आन्तरको प्रत्यक्ष और बाह्यको अनुमेय कहते हुए आन्तर विज्ञानमे विचित्रताकी उपपत्ति के लिये अनुमेय बाह्य पदार्थ मानते हे,। कुछ लोग वासना-वैचित्र्यसे ज्ञान-वैचित्र्य मानते हैं। इसलिये बाह्य पदार्थका अस्तित्व नहीं स्वीकार करते। वर्कलेका (१६८५-१७५३) मत है कि 'औष्ण्य (उष्णता)के समान ही रूप, संस्थान,गुरुत्व आदि भी 'मानस' भाव ही है, इसलिये उनमे भी औष्ण्यसे कुछ वैशिष्ट्य न होनेके कारण कोई भेद नही। इसी प्रकार वस्तु गुणात्मक ही है। गुणोंके न रह जाने- पर वस्तु रह ही नहीं जाती और गुण विज्ञानके अतिरिक्त कुछ नहीं है।' भारतीय वेदान्तानुसार भी वस्तुस्थिति ऐसी ही है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि गुणोंके अभावसे पृथ्वीतत्त्व कुछ मनोमात्र ही तो रह जाता है। परमेश ज्ञानमय होनेके कारण व्यवहारमे सब वस्तुओका यथायोग्य उपयोग हो जाता है, परंतु विचारसे उनका बाध हो जाता है, अतः अविचारितरमणीयता भी है। ईश्वरकी कल्पनाके विषय पदार्थ 'व्यावहारिक' और 'धारणाविषय' कहे जाते हैं और हमलोगोके कल्पित पदार्थ 'प्रातिभासिक' और 'कल्पनामात्र' । यही भेद है। ब्रह्मसे भिन्न सब कुछ दृष्टिसृष्टिमात्र है। भौतिकवादी न तोपरमेश्वरको ही मानते हे, न चेतनको ही स्वतन्त्र मानते हैं। अतः उनके मतमे तो यह सारा ही दर्शन बाधित हो जाता है। उनके मतमे विज्ञान- सिद्ध पदार्थका भी अस्तित्व है ही। मन अथवा चेतना पदार्थोंके गुण ही हैं। काण्ट (ई० १७२४-१८०४) दार्शनिक तथा गणितज्ञ था। उसकी 'प्रकृतिका साधारण इतिवृत्त' और 'ऊर्ध्वलोक-सिद्धान्त' नामकी पुस्तके प्रसिद्ध है। उसने ह्यूमके अज्ञेयवादसे विज्ञानका उद्धार किया और धर्मकी भी रक्षा की। उसके मतमें सभी वस्तुएँ दो प्रकारकी होती हैं—पारमार्थिक तथा प्रातिभासिक। इसलिये सामान्य व्यक्तिको वस्तुका यथावत् ज्ञान नहीं होता। उसके मतमे 'मनसे सम्बद्ध कुछ कारण होते हैं, जिनसे युक्त मनके द्वारा वस्तुएँ कुछ दूसरे ही प्रकारकी जानी जाती हैं। जैसे सहज नीले उपनेत्रसे युक्त चक्षुके द्वारा सब वस्तुएँ नील ही प्रतीत होती हैं, वैसे ही कुछ हेतुओसे युक्त मनके द्वारा देश-कालमें व्याप्त ही

पाश्चात्त्य दर्शन २३ वस्तुएँ प्रतीत होती हैं। अनुभूतिमें जिनकी प्रतीति होती है, उनमें पहले रूपा- दिहीन वस्तुएँ ही प्रतीत होती हैं।' सहज नीले उपनेत्र लगा लेनेके समान स्वतःसिद्ध ज्ञानरूपी साँचेसे वस्तुएँ जब मष्तिष्कमें जाती हैं, तब देश-कालादिसे सम्बद्ध ही प्रतीत होती हैं—यह हम कह आये हैं। 'यहाँ', 'वहाँ', अथवा 'सर्वत्र' किंवा 'इस समय', 'उस समय' अथवा 'सर्वदा'--इस प्रकार सभी वस्तुओंका अवबोध देश-कालसे आबद्ध ही होता है। काण्टके अनुसार मनमें यही स्वतः- प्राप्त ज्ञानका रूप है।' ऐसे ही मनःसंलग्न सहज उपनेत्रके समान अन्य कारणोंसे ज्ञान होनेका उस (काण्ट) का सिद्धान्त भी समझ लेना चाहिये, जिससे गुण, परिमाण, पदार्थ, कार्य और कारणके सम्बन्धोंका भान होता है। 'जो भी वस्तुएँ जानी जाती हैं, उनमेंसे प्रत्येक पदार्थ परिमाणयुक्त है। उनमें कुछ गुणयुक्तोंकी दृष्टिसे कार्य हैं, कुछकी अपेक्षासे कोई कारण है। ज्ञानसिद्धान्तानुसार अनुभूयमान वस्तुओंमे मनके साथ मानसिक भाव भी संयुक्त हो जाते हैं। अतः ज्ञात वस्तु सम्मिश्रित ही होती है शुद्ध नहीं। सहजप्रत्ययरूप रूपहीन पदार्थ ज्ञानसिद्धान्तसे संसृष्ट होकर विज्ञात होता है और 'यह मनुष्य है', 'यह पशु है' इत्यादि रूपसे प्रत्यभिज्ञात होता (पहचाना जाता) है। इसीसे अनुभव विज्ञान बनता है। उसके मतमें प्रतीयमान जगत्का नाम 'फेनोमेना' है और वस्तुभूत जगत्का 'नूमेना' प्रथम वर्कलेके सिद्धान्तसे सम्मत है, द्वितीय उससे भिन्न। समस्त व्यवहार सङ्कल्पमूलक ही हैं। तर्क, गणित आदिके नियम भी सङ्कल्पात्मक ही हैं। जैसे दो और तीन मिलकर पाँच होते हैं—यह गणितका नियम है। कार्य सदा सकारण होता है। आम्र स्वयं भी और स्वयंसे भिन्न भी— यह सम्भव नहीं, यह तर्क भी उसी ढंगका है। ये भाव मानस ही हैं क्योंकि जिनके मनका संघटन भिन्न प्रकारका होगा, उनके इस विषयमें विचार भी भिन्न प्रकारके हो सकते हैं। इसलिये हमारी धारणाके अनुसार ही हमारा जगत् है। परन्तु हमारे विचारोंसे वस्तुव्यवहार भी प्रभावित होता है, इस विश्वासका कोई कारण नहीं है। तर्क और अनुभवके मध्यसे विज्ञान प्रवृत्त होता है। गणितके समान विज्ञानमें भी तर्कका स्थान है। भेद इतना ही है कि विज्ञान अनुभवसे तर्ककी परीक्षा करता है और गणितका परिणाम अपरीक्षणीय ही रहता है, क्योंकि उसकी सत्यता छिपी नहीं रहती। इन्द्रियानुभूतिमें भी वैसी जटिलता नहीं है, किंतु तब गणितके तर्कोंका अनुभूतिके क्षेत्रोंमें प्रयोग कैसे हो, यह समस्या तो है ही। वैज्ञानिकी प्रक्रिया तो यह है। उसमें तर्कसिद्ध ज्ञान वस्तुव्यवहारमें प्रयुक्त होता है। जैसे मध्याकर्षण-नियमके आविष्कारसे वस्तुव्यवहारके सम्बन्धमें भविष्यवाणी की जाती है और वैसा ही घटित भी होता है। तर्कसिद्ध वस्तु प्रयोगमें भी कैसे सत्य होती है। यह समस्या है। जिन वस्तुओंका इन्द्रियानुभूतियोंमे ग्रहण

किया जाता है तथा जिनका बुद्धिसे ग्रहण किया जाता है, उनमें अन्तर स्पष्ट है। कुछ वस्तुओंकी दो-दो जोड़ियाँ बालकके द्वारा गिनी जानेवाली बुद्धिसे दो-दो चार होते हैं, यह व्यापक सत्य है। व्यापकधारणा विशिष्ट इन्द्रियानुभूतियोंसे भिन्न पृथक् ही हैं, कारण वह रूप, प्रयोग आदिसे भिन्न है। यहाँ प्रजावादी तो इन्द्रियानुभूतिके विप्रयका ही अपलाप कर देते हैं। कार्यकारण-सम्बन्धमें बँधे होनेके कारण एक वस्तुके विज्ञानसे ही सब विज्ञान हो जाता है, क्योंकि वही अवश्यंभावी परिणाम है। उनके मतमें कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसका अस्तित्व घटनामात्र हो।' डार्विनका (१८०९-१८८२) मत है कि 'इन्द्रियोंसे पृथक् विचारशक्ति है ही नहीं, इसलिये इन्द्रियानुभूतिके अतिरिक्त विचार कुछ है ही नहीं।' उसके मतमें 'उन सूक्ष्म तन्तुओंका संकुचन, गतिविशेष अथवा रूपान्तरसे परिवर्त्तनविशेष हो ज्ञान है, जिनसे इन्द्रियोंका निर्माण होता है।' विचारका ही दूसरा पर्याय इन्द्रिय गतिविज्ञान है। स्मृतिशक्ति, कल्पना यदि जीवगति नहीं तो और क्या हो सकती हैं? यदि उसे वस्तुओंका चित्र या प्रतिकृति कहा जाय तो वह कहाँ है, जहाँ सभी वस्तुओंका संग्रह शक्य हो? सामान्यतया इन्द्रियानुभूति-विश्वासियोंके मतमें कोई आत्मा है, जिसके द्वारा बाह्य वस्तुएँ प्रतिकृतिके रूपमें ग्रहण की जाती हैं। डार्विन, हक्सले प्रभृति वैज्ञानिकोंने आत्मवादका खण्डन कर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया कि 'वस्तुओंके इन्द्रिय-सन्निकर्षसे स्नायुओंद्वारा शरीरमें जो क्रियाविशेष उत्पन्न होती है, उसीसे विचारका जन्म होता है।' इन्द्रियाँ और उनका विषयोंके साथ सन्निकर्ष एवं मस्तिष्क-स्नायुओंपर तज्जन्य प्रभाव सभी अचित् (जड़) होनेसे वे स्वयं अपना ही प्रकाश नहीं कर सकते, तो फिर दूसरों- की तो बात ही क्या? अचेतनमें चेतनकी उत्पत्ति होती है, यह सिद्धान्त भी असिद्ध है, जैसा कि पहले दिखलाया जा चुका है। कात्पानी (१८४२-१९३५) का कहना है कि 'मानवेन्द्रियोंमें बाह्य वस्तुओं- की क्रिया-प्रतिक्रिया आदिके द्वारा जो प्रभावोत्पादन होता है, वही ज्ञान है। अनुभव ही जीवन है। घटनावलीयोंकी अद्भुत शृङ्खलाओंसे उसका अस्तित्व है। सभी वृत्तियोंके द्वारा अपने विकाससे किसी आवश्यकताकी पूर्ति ही की जाती है और परस्परके अनुसार अभ्यास बढ़ानेवालेके प्रयोजनोंकी निवृत्ति भी हो जाती है। बाह्य वस्तुओंके घात-प्रतिघातका परिणाम ही मानवजीवनका अस्तित्व है। हल्बागने 'प्रकृति-प्रथा' नामक पुस्तकमें फ्रांसीसी भौतिकवाद प्रकाशित किया है। उसमें दीदेरो, वफो, दकेसी, हेलवेशियस इत्यादिका मत संगृहीत है। उनके अनुसार 'दुःखका मूल प्रकृतिका अन्यथाज्ञान ही है। रूढ़िपाशमें बँधे हुए प्रकृतिके अध्ययनसे विमुख लोगोंका प्रेत-पिशाचादिमें अन्धविश्वास ही दुःख- का मूल है। प्रकृतिके अध्ययनसे उसका उच्छेद (कर डालना) आवश्यक है।

सत्य एक ही हे और वह सुखरूप हे । श्रमवशात् ही उद्धृत पुरोहितों तथा राष्ट्रोने जातियोंका बन्धन बनाया ओर भीषण मृग-तृष्णामय धर्मोके शिकार बने । अन्यथा-ज्ञानसे ही लोग घृणा तथा क्रूर दमनके भागी बनते हैं । इसलिये अन्धविश्वासका अपनयन और वस्तुतत्त्वज्ञान नितान्त आवश्यक है । जीव और उसे प्रभावित करनेवाले पूर्ण प्रकृतिके.अङ्ग हैं । अप्राकृत पुरुष कल्पना- प्रसूत ही है । मानव भौतिक ही हे । विशिष्ट-सङ्घटनका परिणाम होनेके कारण उसकी विशेषता है । वस्तु तथा उसकी गतिके अतिरिक्त ओर कुछ नहीं हे । कार्यकारण-सम्बन्धकी अनन्त शृङ्खला ही संसार है । वस्तुओंमे परस्पर क्रिया- प्रतिक्रियाकी परम्परा चलती ही रहती है । विचित्र गुणो एव संयोगोमे वस्तुविशेष- की अभिव्यक्ति होती है ।' सुकरात, अफलातून, अरस्तू, काण्ट आदिके दर्शन ही इस पक्षका खण्डन हैं । सुख अवश्य पुरुषार्थ है, परन्तु क्षणभङ्गुर नही, अपितु अनन्त एव शाश्वत भी है और वही पुरुषार्थ है । प्रकृति और प्राकृत प्रपञ्चका जो भान है, जिसके

२६ मार्क्सवाद और रामराज्य

लिये दृश्य वस्तुओका एकत्रीकरण, उनका पारस्परिक सम्बन्ध-स्थापन तथा तुलनात्मक आलोचना होती है। इसलिये इन्द्रियानुभूतिको सत्य माननेपर बुद्धिप्राप्त ज्ञान ही असम्भव है। यदि प्रज्ञावाद सत्य हो, तो इनका ज्ञान असम्भव है। ज्ञानका विषय कुछ है। परंतु यह भी सत्य है कि अनुभूतियोंमें बुद्धि प्रयुक्त होती है। उसके परिणामका भी अपने जगत्‌मे प्रयोग होता है। परंतु उभयवादियोके सामञ्जस्यकी समस्या तो वैसी ही रह जाती है। इस विषयमें काण्टका कहना है कि 'अनुभूतिका विषय अकृत्रिम नही है। इसलिये वस्तुतत्त्व अनुभवसे गृहीत नही होता, किन्तु ज्ञानप्राप्तिकी क्रियासे परिष्कृत देशकालादि- सम्बद्ध ही वस्तुका ग्रहण होता है। इससे यह तो सम्भव है कि वस्तु उन नियमोका पालन करे, जिन नियमोसे वस्तु बुद्धिसे मण्डित होती है। यदि भौतिकवादके अनुसार प्रकृतिको क्रियाशील और ज्ञानको अक्रिय माना जाता है तो ज्ञानमे व्यवस्थापकत्व कैसे बन सकता है ? काण्ट आदिके ज्ञानका रचनात्मक कार्य कर्तृत्व इस दृष्टिसे होता है कि मनस या सर्वमनस ही ज्ञान है, भारतीय वेदान्तकी दृष्टिसे मन स्वय ही भौतिक कार्य है, उसकी उत्पत्ति होती है और वह व्यापारवान् होता है, सक्रिय तो है ही। इगलिश-फ्रेन्च भौतिकवादियोका यह मत भी ठीक नही कि वस्तुका अस्तित्व विचार कर्ताके अस्तित्वसे पहले है, विचारकर्ता इसकी अनुभूति प्राप्त कर सकता है। यदि आत्मा भूतका ही परिणाम है तब तो सुतरा कार्य भूत आत्माके पहले कारणरूप भूतका रहना ठीक ही है। परंतु जडभूतोके किसी परिणाममे चेतनता या विचारकर्तृता किसी भी प्रमाणसे नही सिद्ध हो सकती, हान्सके विचार भी इस सम्बन्धमे भौतिकवादी ही हैं। भौतिकवादी भूतपरिणामको ही ज्ञान मानते हैं, अतएव ज्ञानका उद्गमस्थान उनकी दृष्टि से इन्द्रियग्राह्य रूपोके मूलभूत ही है। किंतु अध्यात्मवादी जडभूतो के अतिरिक्त आत्माको ही ज्ञानका उद्गमस्थान मानते है। वह आत्मा नैयायिक, वैशेषिक आदिके अनुसार ज्ञान-गुणवाला है, कुछके मतानुसार ज्ञान- स्वरूप होकर ज्ञानधर्मक है और कुछके मतानुसार अखण्ड नित्य बोधस्वरूप है। उससे ही सर्वभूतो एव भूतप्रकृतिकी उत्पत्ति होती है, उससे भौतिक अन्तःकरण मन आदि उत्पन्न होता है, उसीसे साभास वृत्तिरूप अनित्य ज्ञान उत्पन्न होते हैं। परंतु उन सबमे पृथक् अखण्ड स्वतः सिद्ध नित्यबोध है, जिससे अनित्य ज्ञानोकी उत्पत्ति, स्थिति एव प्रलय आदिका बोध होता है।

हेगेल-दर्शन

हेगेलने (१७७०-१८३१) काण्टकी वस्तुस्वरूप धारणाका खण्डन किया और बतलाया कि 'वस्तुको उसके आवेष्टन गुणो और अवस्थाओसे अलग करके देखना

ही वस्तु स्वरूपकी धारणा है । परंतु ऐसा सम्भव नहीं । अतः वह ज्ञानसे परे है।' हेगेलके जगत्का भी स्रष्टा मन ही है, काण्टके अमल जगत् एव दृश्यमान जगत्के द्वित्वका भी इसने खण्डन किया है। स्पिनोजाके समान हेगेल भी आत्मा-मन ओर भूतको अभिन्न ही मानता है। अर्थात् आत्मासे अभिन्न मन एव मनसे अभिन्न भूत हैं । उसके अनुसार 'पूर्णतत्त्व ही सब कुछ है, दृश्यमान जगत् उसीका अङ्ग है । किसी वस्तुको समझनेके लिये दूसरी वस्तुओसे तुलना आवश्यक होती है । जैसे एक मुर्गीका अण्डा गेंदसे कम गोल है, चमड़ेसे अधिक टूटनेवाला है, गौरैयाके अण्डेसे बड़ा है । इस तरह सभी घटनाओको मिलाकर ही वस्तुविशेष बनती है । अतः दूसरी वस्तुओसे इसके सम्बन्ध इसकी प्रकृतिको बताते हैं । साथ ही दुनियाकी सभी वस्तुओसे भी इस अण्डेका सम्बन्ध है । भले ही यह सम्बन्ध समतामे हो या विषमतामे । इसलिये एक अण्डेको पूर्णरूपसे जाननेके लिये हर विद्यमान वस्तुका ज्ञान होना चाहिये जो कि अल्पज्ञ प्राणीके लिये असम्भव ही है । अतः भेद असत्य है, एक ही महान् वस्तुके सब अङ्गोपाङ्ग हैं । यही बात विचारोंके सम्बन्धमे भी है। किसी सत्यके अस्तित्वके प्रकाशके साथ-साथ उसके विपरीत असत्यके अस्तित्वका भी प्रकाश होता है । शङ्ख श्वेत है, इस प्रकारकी घटनाके विवरणके लिये ही यह सत्य नहीं किंतु सिद्धान्तोके विचारके लिये भी यही सत्य है । जैसे स्वतन्त्र इच्छाके ही सिद्धान्तको देखें, अपनी इच्छाके अनुसार काम करनेकी स्वतन्त्रता हमें नहीं है । हमारा कार्य पूर्वनिर्धारित है । घटनावश उस कार्यको करनेके लिये हम बाध्य हैं । इसे ही 'पूर्वनिर्धारणका सिद्धान्त' कहा जाता है । इन सिद्धन्तोके विपरीत सिद्धान्तके अस्तित्वका अर्थ ही यही है कि कोई भी सिद्धान्त स्वतन्तरूपसे पूर्ण सत्य नहीं है । इसलिये वह कहता है कि 'कोई उपाय ऐसा अवश्य होना चाहिये जिसमे एक सत्य एव उसके विपरीत सत्यको मिलाकर व्यापक सत्यकी प्रतिष्ठा हो, जिसमें दोनो आंशिक सत्य मिले हों।' इन आंशिक सत्योका परस्पर विरोध रहता है, अतः इनके अधूरेपनमे मनका टिकना सम्भव नहीं । इसीलिये मन व्यापक सत्यकी खोजमें बढता रहता है । यद्यपि कारणरूपी सत्यमे विरोधी कार्योंका समन्वय हो जाता है, जैसे मृत्तिकामे घट-शरावादि विविध कार्य अन्तर्गत होते हैं, तथापि मृत्तिका भी स्वयं कार्य है, अतः अन्तिम (अधिष्ठान ) सत्यपर जबतक मन नहीं पहुँचता, जहाँ किसी भी आंशिक सत्यका विरोध विलीन हो जाता है तबतक आंशिक सत्योको मिलाकर एक व्यापक सत्यमें परिणत करनेकी क्रिया जारी रहती है । यह अन्तिम सत्य ही सब कुछ है और वह सत्य आन्तर अखण्ड बोधस्वरूप ही है । मन एव मनद्वारा ज्ञात विषय एव उनकी विभिन्नताएँ इसके अदर ही हैं । मन उसी पूर्णका अगमात्र है । इसीलिये यह विश्वको भी गल्त-

२८ मार्क्सवाद और रामराज्य रूपमे देख सकता है और अलग वस्तुओ के पुञ्जके रूपमे देखता है । आम तौरपर समझा जाता है कि सत्यता सम्मति या रायका एक गुण है। कोई सम्मति सत्य है यह एक ही वस्तुपर निर्भर है । हेगेल सिवा पूर्णके और किसीको सत्य नहीं मानता । जो कुछ पूर्णसे कम है वह सत्य घटना नहीं, वह दूसरी घटनाओंसे सम्बन्धित है । जिनमें विच्छिन्न करके इसको नहीं समझा जा सकता । इसीलिये विचार एव विचारका विषय मिथ्या है, परम सत्य अधिष्ठानस्वरूप नित्य बोध ही रहता है । हेगेलका 'स्वयंगतिविवर्तनवाद' का विचार बड़े महत्त्वका माना जाता है । अरस्तू एव उसके अनुयायियोंके मतानुसार 'कोई नयी चीज हो ही नहीं सकती, क्योंकि वह एक आनुमानिक प्राथमिक वस्तुसे ही सारे संसारका सूत्र जोड़ लेती है। अरस्तूके अनुसार एक वस्तु एव तदनुरूप विचार एक ही वस्तु है दो नहीं ।' इससे भिन्न हेगेलने कहा कि 'प्रत्येक वस्तुमे एक अन्तर्विरोध है जो उसको गतिदान करता है और इस स्वयं विकासकी क्रियामे वह दूसरी वस्तुके रूपमे परिवर्तित हो जाती है ।' हेगेल वस्तुकी अपेक्षा विचारको ही तात्त्विक मानता है । संसारका क्रमविवर्तन उसके मतानुसार विचारका ही क्रमविवर्तन है । उसके अनुसार प्रथम 'विचारका नाम वाद है, इसके साथ ही विपरीत विचार भी वर्तमान रहता है, उसका नाम प्रतिवाद है । इन दोनोंके संघर्षसे जो नया विचार उत्पन्न होता है, उसका नाम समन्वयवाद है । इस समन्वयवादमें पुनः अन्त- विरोधकी सृष्टि होती है और एक नये संघर्षके परिणामस्वरूप गति उत्पन्न होती है जो एक नये और बृहत्तर समन्वयवादमे लीन होती है । विश्व-लीला इसी विचार- संघर्षकी ही क्रिया है । अन्ततः यह लय होती है पूर्णमे ।' हेगेलके विचार वेदान्तके अद्वैत-दर्शनसे मिलते जुलते हैं । वेदान्तका ब्रह्म अखण्डबोधस्वरूप है, उसीका विवर्त विश्व है, विश्वके पहले भी मन बनता है । स आत्मा सर्वगो राम नित्योदितवपुर्महान् । समनाङ् मननीशक्तिं धत्ते तन्मन उच्यते ॥ (पञ्चदशी १३।२०) वह स्वप्रकाश ब्रह्मात्मा किञ्चित् मननी शक्तिको धारण कर मन हो जाता है । यह भी वेदान्तका ही सिद्धान्त है कि हर एक वस्तु व्यावृत्तरूपसे ही उपलब्ध होती है । अर्थात् अपनेसे भिन्न समस्त वस्तुनिरूपित भेदसे युक्त ही वस्तुका बोध होता है । किसी अल्पज्ञको सम्पूर्ण पदार्थोंका बोध हो नहीं सकता, अतः तन्निरूपित भेदका भी ज्ञान असम्भव है, फिर स्वेतर सर्व वस्तु भिन्नरूपसे किसी भी पदार्थका जानना सम्भव नहीं । इसलिये घटज्ञानमे व्यावृत्तरूपसे घटका भान होता है, परन्तु व्यावृत्ति एवं उसके निरूपक घटातिरिक्त सकल पदार्थोंका बोध है नहीं, अतः अतत्त्वे तद्बुद्धि होनेके कारण व्यावृत्ताकारेण घट-बोध ही भ्रम है, सुतरां उसमे अध्यासित होनेवाला घट भी भ्रम-सिद्ध ही है । विचार या ज्ञानसे भिन्न

पाश्चात्त्य-दर्शन (पृष्ठ २९)

वस्तु नहीं। विचार या ज्ञान अखण्ड बोध ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, इस दृष्टिसे वस्तु एव विचार सबका ही पर्यवसान अखण्ड बोधस्वरूप वस्तुमे ही होता है । हेगेलका अन्तर्विरोध या द्वन्द्वमानका अभिप्राय क्रमिक विवर्तके स्वरूपका ही विवेचन है । मूल वस्तु अखण्डबोध आन्तरिक वस्तु है । मन, विचार आदि उसके अति संनिहित है । अतः उनमे हलचल होनेसे ही विचारान्तर या वस्त्वन्तर उत्पन्न होते हे । विचार-सघर्षसे विरोधी विचारोमे सर्वबाध होनेके अनन्तर बाधाधिष्ठान परमार्थ वस्तुका बोध होता है । वही सब विरोधो, सब सघर्षोका अन्त हो जाता है । सुन्दोपसुन्दन्यायसे सत्कार्यवाद-असत्कार्यवाद दोनोके ही सांख्यो एव नैयायिकोद्वारा खण्डित हो जानेपर अनिर्वचनीयता एव विवर्तकी सिद्धि होती है । इसी तरह जैसे बीजमे अन्तर्विरोधद्वारा उसका विध्वस होता है तब अङ्कुरकी उत्पत्ति होती है, वैसे ही हर एक कारणमें अन्तर्विरोध होनेके बाद विध्वस या विकृति

उपस्थित होता है । अर्थात् कार्य-कारणभाव तो प्रत्यक्ष दृष्ट ही है । दृष्ट व्याघात इस शङ्काकी अवधि है । 'व्याघातावधिरशङ्का शङ्का तर्कावधिर्मतः ।' इस तरह अन्तिम परम सत्य परम संवादको वाद बनाना तथा अन्तिम कार्यरूप संवादको भी वाद बनाकर कार्यानन्तरकी कल्पना करना भी अनवस्था एव दृष्ट व्याघात-दोषसे दुष्ट है । यो तो हेगेलके द्वन्द्ववादको भी वाद बनाकर उसका भी ऐकात्म्यवादमे लय हो जानेकी कल्पना की ही जाती है । जब द्वन्द्ववादके आधारपर अधिनायकवाद, समष्टिवाद, भूतवाद और चेतनवाद-जैसे परस्पर विरुद्ध मत सिद्ध हो सकते हैं तब उसके बलपर तो किसी 'इदमित्थम्' सिद्धान्तका निर्णय असम्भवप्राय ही है । हेगेलके मतानुसार 'राज्य मानवकी सामाजिक प्रगतिकी चरम सीमा है ।' इसका अर्थ है कि 'वह संवाद आगे वाद नही बनेगा ।' परतु मार्क्सने उसे भी वाद बनाया ही । वह मजदूर-नायकत्व या समष्टिवादको चरम सवाद कहता है, परंतु रामराज्यवादी जड-चेतन दोनोको आध्यात्मिक सम्बन्धसे समन्वित करता है तथा राजतन्त्र-प्रजातन्त्र, व्यष्टि-समष्टि वित्तविभाग एव श्रमविभागको समन्वित करता है । इस तरह अध्यात्मवादपर आवृत धर्म-नियन्त्रित धर्मसापेक्ष पक्षपातविहीन शासन-तन्त्र राज्यको ही अन्तिम सवाद एव सामाजिक प्रगतिकी चरम सीमा मानता है । इस पक्षमे निश्चित : प्रत्यक्षानुमान, अपौरुषेय आगम आर्षशास्त्र एव परम्परा सभी अनुकूल है । भारतीय अध्यात्मवादमें समष्टि अनन्तकोटि ब्रह्माण्डात्मा कार्य-कारणातीत ब्रह्मका स्थूल रूप है । उसके भीतर समष्टि लिङ्गात्मा हिरण्यगर्भ सूक्ष्मरूप है । उसमे भी आन्तरसमष्टिकारणात्मा महाकारण ईश्वर है और सर्वान्तर सूक्ष्मतम कार्य- कारणातीत शुद्ध ब्रह्म है । महाविराट्की अपेक्षा भी हेगेलका विश्वात्मा बहुत स्थूल एव सकीर्ण है । मार्क्स दर्शन कार्लमार्क्सने (१८१८-८३) हेगेलके द्वन्द्वमानको भौतिकवादसे जोड लिया, परतु मार्क्स मानस या बोधको स्वयंविकास या विवर्त मानता है । इस प्रक्रियाका प्रथम अंग हे एक अविभाजित इकाई । यह इकाई दो विरोधी अगोमे विभाजित हो जाती है । पुन. इन विरोधोका समन्वय होकर एक नयी सम्बन्धित इकाईका जन्म होता है । इसी प्रकार सृष्टिका विकास होता रहता है । इन बातोंको ब्रह्मवादमें भी जोड़ा जा सकता है । अविभाजित ब्रह्मका भी दृक्-दृश्य, ज्ञान-ज्ञेयरूपमें विभाजन हुआ । पुनः दोनोंके समन्वयसे ही महदादि प्रपञ्चकी सृष्टि होती है । इसी तरह उत्तरोत्तर कारणका विभाजन, विध्वंस या समन्वयसे उत्तरोत्तर सृष्टि होती है । एक बीजमें धरणी, अनिल, जलके सम्पर्कसे उच्छूनावस्था (अङ्कुरोत्पत्तिके पहले बीजकी फूलनेकी अवस्था) होती है । फिर अन्तर्विरोधसे बीजका विध्वंस या विभाजन होता है, पुन' समन्वय होकर अङ्कुर उत्पन्न होता है । मार्क्स इसी

अन्तर्विरोधको द्वन्द्वमान मानकर कहता है 'यह क्रिया भूतकी ही है मनकी नहीं, मन- में तो भूतकी ही क्रिया प्रतिबिम्बित होती है।' परन्तु वेदान्त-मतानुसार विनाश या विध्वंसको अङ्कुरका कारण नहीं माना जाता, किंतु बीजके अवयव ही अङ्कुरके रूपमें परिणत या विवर्तित होते हैं क्योंकि कार्यमें बीजके अवयवोंका ही अन्वय दिखायी देता है। अतः विनाश या विध्वंस विकासका कारण नहीं, इसके अतिरिक्त कारण ब्रह्म कार्यरूपमें परिणत होनेपर भी अविकृत मुक्तोपसृप्य ब्रह्म बना ही रहता है। आकाश, वायु आदि भी उन उन कार्योंके रूपमें परिणत होनेपर भी समाप्त नहीं हो जाते। उनका भी पृथक् अस्तित्व बना ही रहता है। इसके अतिरिक्त हेगेलके यहाँ इस सङ्घर्ष-क्रियाकी सीमा है। हर कार्यमें अन्तर्विरोध या सङ्घर्षसे उत्तम वस्तुका विकास नहीं होता, इसीलिये कोई कार्योंके विनाशसे कोई भी अच्छी चीज उत्पन्न नहीं होती। तभी लोग कार्यध्वंससे उद्विग्न होते हैं। वस्तुतः मार्क्सने हेगेलके द्वन्द्वमानका गलत अभिप्राय समझकर दुरुपयोग किया है। किसी कार्यमें भावरूप उसका उपादान कारण एवं रजके हलचलके साथ तमका अवष्टम्भ तथा सत्त्वका प्रकाश भी अपेक्षित होता है, इस तरह कार्योत्पत्तिमें आंगिक सङ्घर्षसे अधिक प्रकाश एवं अवष्टम्भका महत्त्वपूर्ण हाथ रहता है। हलवाश एवं हुवेलवैशियस अठारहवीं शताब्दीके भौतिकवादियोंके प्रतीक समझे जाते थे। हलवाशकी पुस्तक 'प्रकृति-विन्यास' है। उसका कहना है कि 'यदि सत्ताका अर्थ है सच्चा स्वरूप तो हमें वस्तुकी सत्ताका कोई ज्ञान नहीं। प्रत्यक्षावलो- कनसे तथा तज्जनित स्पन्दन और विचारोंसे हमें भूतका ज्ञान प्राप्त है। इन्द्रियोंके अनुसार विषमेच्छा—अच्छी या बुरी राय कायम करते हैं। उसकी प्रतिक्रियाके अनुसार उसके कुछ गुणोंका परिचय यद्यपि हमें मिलता है, फिर भी भूतकी सत्ता या सच्चे स्वरूपका ज्ञान नहीं होता। मनुष्य भूतोंका ही बना है। अतः भूतोंके अतिरिक्त उसका और कोई विचार नहीं है। अतः भूत ही विचारशक्ति-सम्पन्न है। अथवा भूतका परिणाम ही मनन शक्ति है।' पृथिवीके सम्बन्धमें उसका अनुमान है कि सम्भव है कि यह एक भूतपिण्ड है, जो किसी नक्षत्रसे विच्छिन्न हो गया होगा। अथवा सूर्यस्थित काले बिन्दुओंके विस्तारका ही परिणाम है अथवा बूझी हुई धूमकेतु होगी।' ऐसे ही वह मनुष्य- को भी प्रकृतिकी आकस्मिक उपज होनेकी कल्पना करता है। इस समयके दार्शनिक धर्मके विरोधी थे और बुद्धि एवं अनुभवपर प्रतिष्ठित नीतिके साथ धर्मके सम्बन्धको भयंकर समझते थे, क्योंकि धर्मको वे बुद्धिविरुद्ध एवं नैतिक शिक्षाको कमजोर बनानेवाला मानते थे। हलवाश वासनाको ही वासना-पूर्तिकी औषध समझता था। वह वासनाओंका दमन अनावश्यक समझता था। उसका

३२ मार्क्सवाद और रामराज्य कहता है 'मनुष्यमात्र सुख चाहता है । दुःखसे घबराता है । इसीलिये सुख-साधन भले तथा दुःख-साधन बुरे हैं। कोई सरकार ऐसा कष्ट नहीं उठाती जिससे उसकी प्रजाको न्याय, भलाई और ईमानदारीमे ही सुविधा मालूम हो । इसके विपरीत अन्यायी दोषी बननेके लिये प्रेरित किया जाता है । प्रकृतिने मनुष्यको बुरा नहीं बनाया । सामाजिक व्यवस्था ही इसके लिये जिम्मेदार है।' वाल्टेयरके मतानुसार 'समाज न्याय-अन्यायकी धारणा बिना नहीं रह सकता ।' किंतु हलवाश इसमे ईश्वरकी आवश्यकता नहीं समझता । 'न्याय, संयम, उपकार जीवनके लिये लाभदायक हैं, यह सभी समझ सकते हैं।' रूसो कहता है, 'फिर भी अपने सुखके लिये कोई मौतका सामना क्यो करेगा ? अतः ऐसे स्थलका स्वार्थ सामाजिक स्वार्थ ही समझा जाना चाहिये, व्यक्तिगत नहीं ।' १८ वीं शतीके भौतिकवादी समझते थे कि 'भूलसे ही मनुष्यको दुःख होता है, यदि मनुष्य अपने स्वभावपर कायम रहेगा तो सदा सुखी रहेगा।' सियरबेलके शङ्कावाद लङ्क, कन्डिलाक बर्क आदिके इन्द्रियानुभूतिवादसे भौतिकवादको बडा बल मिला, हल्वेशियसने भी बताया कि 'मनुष्यकी बुद्धिमे प्रकृतिगत समानता, विचारशक्ति तथा उद्योगकी उन्नतिमें एकता तथा पालन-पोषणकी महान् शक्ति स्वाभाविक गुण है।' इन सवसे समाजवादको बल मिला। सेंट साइमन लई तथा राबर्ट एडवर्ड लासाल आदिने समाजवादकी रूपरेखा व्यक्त की। यद्यपि ये सभी ईश्वर एवं धर्ममे विश्वास रखते थे। मार्क्स यद्यपि दार्शनिक विचारोमे हेगेलका शिष्य था तो भी उसका कहना था कि 'हेगेल सिरके बल खडा था । आज मै उसे पैरके बल खडा कर रहा हूँ।' हेगेल एव मार्क्सके बीच फायरबाखका दर्शन है। इसके कई अंशोको मार्क्स- ने ग्रहण किया, कईका खण्डन किया । बीटेने लिखा है-ईश्वर मेरा पहला विचार है, ज्ञान दूसरा तथा मनुष्य तीसरा और अन्तिम ।' इसपर फायरबाखने कहा है, 'आदर्शवाद एव भौतिकवादके झगड़ेका केन्द्र है मनुष्यका मस्तिष्क । मस्तिष्क किस प्रकारकी वस्तुसे बना है, यह मालूम हो जाय तब अन्य वस्तुओके सम्बन्धमे विचार स्पष्ट होते हैं।' उसका यह भी कहना है कि 'अस्तित्व कर्ता है और विचार क्रिया है। विचार अस्तित्वका कार्य है कारण नहीं । अस्तित्व स्वयं मूल है।' वह कहता है, 'आदर्शवादी दर्शनका आरम्भ ही गलत है। सच्चे दर्शनका आरम्भ केवल मैंसे न होकर मै और तुमसे होना चाहिये। यहाँसे विचार एवं पदार्थ तथा कर्ता एवं कर्मके सम्बन्धको ठीक रूपमें समझ सकते हैं। मै स्वयं अपने लिये मै हूँ परन्तु दूसरोंके लिये तुम । मै एक साथ कर्ता हूँ एव कर्म भी, मै अमूर्त्त- सत्ता नहीं। मेरा वास्तविक अस्तित्व है मेरा शरीर ही । अपने समग्ररूपमे मेरी वास्तविक सत्ता है । जो विचार करता है वह अमूर्त्त नही, भौतिक अस्तित्व ही कर्ता

पाश्चात्त्य दर्शन ३३

है, विचार उसकी क्रिया है । विचार एव विरोधके अस्तित्वकी समस्याका यही हल है। प्रकृति या भूतोको दबाकर या मिथ्या कहकर समस्याका हल नहीं हो सकता ।' फायरवाखका कहना है कि 'यदि स्पिनोजाके सिद्धान्तमे धर्म विद्याका जंजाल निकाल दिया जाय तो मूलतः यह बहुत सही है।' कहते हैं, आदर्शवादसे नाता तोडनेके बाद पहले-पहल मार्क्स एवं एंजिल्सने इसी दर्शनको अपनाया था । फायरवाखका कहना था कि 'बाहरी वस्तुकी क्रियाका विषयमात्र बनकर मनुष्य उन वस्तुओंको पहचानता है' परंतु मार्क्सका कहना है कि 'वस्तुके ऊपर अपनी प्रति- क्रियाद्वारा हम उसकी पहचान करते हैं।' उपर्युक्त विद्वानोंके विचार भारतीय दर्शनोकी दृष्टिसे बहुत स्थूल हैं । विषयेन्द्रियमयोगजन्य सुख ही वास्तविक सुख नहीं है। अनश्वर सुख आत्मस्वरूप ही है । या तो दादके खुजलानेमे भी सुखकी प्रतीति होती है, पर क्या उसे कोई बुद्धिमान् सुख मान सकता है ? इसी तरह सूक्ष्म विवेचन बिना अस्तित्वयुक्त पदार्थको ही अस्तित्व मानकर उसके कर्ता एव विचारको कर्म मान लिया गया । अस्तित्व तो वह सूक्ष्म वस्तु है जो विचारमे भी अनुस्यूत है, जिस अस्तित्वके बिना देह एव देहान्तर्गत उसकी समग्रताके पूरक सभी असत् हो जाते हैं। सर्व विशेषणरहित अस्तित्व ही सर्वत्र समानरूपसे अनुस्यूत होनेके कारण सर्वबीज है, विचारकी सूक्ष्मता उससे अधिक सनिकट है। उसमें ही मैं और तुम सबका अन्तर्भाव हो जाता है । अवश्य ही बहिर्मुख प्राणीका 'मैं' की अपेक्षा 'तुम' अधिक स्पष्ट है। इसीलिये तो भाष्यकार शंकराचार्यने 'युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचरयोः' इत्यादि रूपसे तुमसे ही विचार प्रारम्भ किया था । भौतिकवादियोके मै और तुम सभी शंकरके युष्मत्प्रत्ययगोचर ही ठहरते हैं, क्योंकि दृश्य अनात्ममात्र युष्मत्प्रत्ययगोचर होता है । निर्द्वयदृक् आत्मा ही अस्मत्प्रत्ययगोचर भाष्यकारको मान्य है । मार्क्सने फायरवाखके दर्शनपर टिप्पणी करते हुए लिखा है—'उस भौतिक सिद्धान्तमे जिसके अनुसार मनुष्य परिस्थितियों एव शिक्षाकी उपज कहा जाता है, इस बातको भुला दिया जाता है कि मनुष्य परिस्थितियोंमें परिवर्तन कर सकता और करता है और शिक्षकको स्वयं शिक्षित होनेकी आवश्यकता रहती है। ज्यों ही इस समस्याका समाधान होता है, इतिहासकी भौतिक धारणाका रहस्य खुल जाता है।' फायरवाख विचारप्रणालियोंके विकासका आधार मानवसत्ताके विकासको ही कहता है। 'मानवसत्ता क्या है' इसका उत्तर देते हुए वह कहता है कि 'मानवसत्ता मनुष्यके साथ मनुष्यके ऐक्यमें उनके परस्पर संयोगमें मिलती है।' मार्क्स कहता है 'सामाजिक सम्बन्धी समग्रता ही मानवसत्ता है।' पहलेमे इसमे स्पष्टता अधिक है । फायरवाखने पहले घोषणा की कि 'भूत मानस (ज्ञान) की उपज नहीं है, मानस ही भूतकी सर्वोत्कृष्ट उपज है।' उसने हेगेलके द्वन्द्ववादका

मा० श० ३—

३४ मार्क्सवाद और रामराज्य भी खण्डन किया था, पर मार्क्सने उसे ग्रहण कर ही अपना द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद बनाया । वह जगत्का असली रूप भूतको ही मानता है। जगत्के विचित्र एवं विभिन्न रूप एवं व्यापारभूतकी ही गतिके विभिन्न रूप हैं। इन व्यापारोंके आपसी सम्बन्ध गतिशील भूतके विकासके नियम हैं। इन्ही नियमोंके अनुसार जगत्का विकास होता है, इसे किसी विकासकर्ताकी आवश्यकता नही है । भूतप्रकृति जीवका अस्तित्व भी भूतके अंदर है । प्रथम भूत ही है, मन द्वितीय है, क्योकि यह भूतसे ही उत्पन्न होता है। उसके अनुसार मनन या चिन्तन-क्रिया भूतकी ही उपज है और भूत ही मस्तिष्कका रूप प्राप्त कर चुका है । एञ्जिल्सके शब्दोंमें 'भौतिक अस्तित्व, मनन, प्रकृति और जीवात्माके अस्तित्वका प्रश्न ही दर्शनशास्त्रका मुख्य प्रश्न है। आदर्शवादी जीवात्माको पहले मानते हैं, भौतिकवादी प्रकृतिको । मार्क्स कहता है—'जो भूत चिन्तन करता है उस भूतसे चिन्तनको पृथक् नहीं किया जा सकता । जो ज्ञान प्रयोग एवं अनुभवद्वारा व्याप्त है वही वास्तविक ज्ञान है। इसको बाह्य जगत्से मिलाकर जाँचा जा सकता है। जगत्मे कोई अज्ञेय वस्तु नहीं है। जगत् और उसके नियम पूर्णरूपसे जाने जा सकते हैं। यह बात अलग है कि अभी हम पूर्ण- रूपसे नहीं जानते ।' उपर्युक्त बातोपर विचार करनेसे मालूम होता है कि यह भी अनुमान है कि मनुष्य सब संसार एवं उसके नियमोंको जान सकेगा; क्योकि अभीतक सम्पूर्ण जगत्की तो बात ही क्या, एक सूर्यके ही अंदर कितने तत्त्व हैं, इसीका पूरा अन्वेषण नहीं हुआ । एक कोयला या मिट्टीके तेलमें या एक परमाणुमे कितनी शक्तियाँ हैं, इसका भी परिज्ञान पूरा नहीं हुआ । विज्ञानके बलसे आज वैज्ञानिक एक वस्तुको जाननेका दावा करता है, कुछ दिन बाद उसे अपनी भूल भी मालूम पड़ती है। किसी चीजको आज किसी रोगपर लाभदायक समझा जाता है, कालान्तरमे ही उसे ही हानिकारक मान लिया जाता है । फिर स्वेतरसकलवस्तुप्रतियोगी घटको ही आजतक कौन जान सका है ? और आगे भी जाननेकी आशा कौन बुद्धिमान् कर सकता है ? किसी भी प्रयोग या यन्त्रसे कोई भी सम्पूर्ण प्रपञ्च एवं तद्गत विचित्रताको कैसे जान सकता है ? जैसे एक उदुम्बरके भीतर ही रहनेवाला नगण्य कीट बाहरकी वार्त्ताको नहीं जानता, उसी तरह एक क्षुद्र भूखण्ड तथा ब्रह्माण्डगोलकके भीतरका जन्तु सर्वज्ञ होनेका दावा करे, यह साहसमात्र है। एक तीक्ष्ण संखियाके स्वादका वैशिष्ट्य समझ लेनेके लिये लाखों जीवन समाप्त हो जाना भी पर्याप्त नहीं है, फिर उसके अन्य रस, वीर्य, गुण, विपाकादिको समझना चींटीद्वारा आकाश-परिवेष्टनकी कल्पना-जैसी बात है। एञ्जिल्सका यह कहना भी सही नहीं कि 'यदि हम अपनी किसी कल्पनाकी