मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाश्चात्य-दर्शन २१
• अतिरिक्त और कुछ नहीं रह जाने । दर्शन श्रवण आदिके स्वरूपका विचार करने- पर भी यही निश्चय होता है । जैसे—वस्तुओंकी आलोककिरणें स्नायुओंके सूक्ष्म दृष्टिमन्त्रोंपर पडती हैं । उसमे स्नायुओमे गति उत्पन्न होती है । उसस मस्तिष्कगत कणोंमे स्पन्दन उत्पन्न होता ह । उसीमे किसी प्रकार चेतना उत्पन्न हो जाती है । यही वस्तुदर्शन कहलाती है । इसी प्रकार शब्दका, जो वायुमण्डलीय स्पन्दनविशेष है, कर्णशष्कुलियोंसे सम्बन्ध होता है, जिसमे मस्तिष्क प्रभावित होता है । उससे मस्तिष्कस्थित स्नायु-कणोंमें गतिसमूह उत्पन्न होता है, उससे चेतना । इसीको 'श्रवण' कहते हैं । मस्तिष्क गहरे तमसे आच्छन्न कमरे- सरीखा है । उसमें एक सुदीप्त पट है, जिसका दीपन करनेवाली चेतना है । अनुभूयमान बाह्य विषय इन्द्रियोंको उत्तेजित करते हैं और वे मस्तिष्कगत स्नायुओं- को उत्तेजित करती हैं । उससे उत्पन्न चेतनाके द्वारा उद्दीप्त हुए पटपर वस्तुकी प्रतिकृतियाँ अभिव्यक्त हो जाती हैं । 'वस्तुओंका ज्ञान प्राप्त किया जाता है, इसका अर्थ यह है कि वस्तुओंके चित्र—प्रतिकृतियाँ—मस्तिष्कस्थ प्रदीप्त पटपर व्यक्त होती हैं । चेतनाके द्वारा उज्ज्वलित पटपर प्रतिफलित वस्तुकी प्रतिकृति ही ज्ञान है । सांख्य योग तथा वेदान्तके मतानुसार इन्द्रियोंद्वारा प्रत्युपस्थापित शब्दादि-विषयाकाराकारित वृत्तिसे युक्त अन्तःकरणमे प्रतिबिम्बित असङ्ग पुरुषका अपने प्रतिबिम्बके साथ तादात्म्याभिमानके द्वारा विषयोपरागाभिमान उत्पन्न होता है । जैसे जपाकुसुमसे उपरक्त हुआ स्फटिक स्वनिष्ठ प्रतिबिम्बमें अपना आकार समर्पित कर देता है । तथा च वृत्तियुक्त अन्तःकरणमें स्थित विषयाकारताका प्रतिबिम्बमें भान होता है । इसलिये प्रतिबिम्ब भी रक्त हो जाता है ओर उसके तादात्म्याभिमानसे बिम्ब भी अपने आपको रक्त मानता है । दर्पणगत मालिन्यके कारण दर्पणान्तर्गत प्रतिबिम्बमें भी मलिनता प्रतीत होती है । प्रतिबिम्बके साथ तादात्म्याभिमानवान् होनेके कारण 'मेरा मुख मलिन है' यह समझकर बिम्ब भी चिन्तित होता है । उसी प्रकार विषयोपरक्त अन्तःकरणमें पुरुषका प्रतिबिम्ब है, अतः उस प्रतिबिम्बके साथ तादात्म्याध्यास ( अभेदाध्यास ) के कारण बिम्बमें भी विषयोपरागका अभिमान होता है । इस तरह असङ्ग स्वप्रकाश चेतनमे विषयोपरागद्वारा विषयका प्रकाश होता है । ज्ञाताका मन प्रथम पदार्थ है, बाह्य वस्तु द्वितीय तथा चेतनोज्ज्वलितपट- प्रतिबिम्बित चित्र या प्रतिकृति तृतीय । मन प्रतिकृतिको तो जानता है, पर बाह्य वस्तुको नही, क्योंकि प्रथम एव तृतीय द्वितीयके बाधकके रूपमें उपस्थित हैं । ऐसी दशामे प्रश्न उठता है कि फिर द्वितीयका अस्तित्व माना जाय या नहीं । यदि द्वितीय जाना ही नहीं जा सकता तो फिर उसीसे तृतीय उत्पन्न कैसे हो जाता है यह